व्यायाम श्लोक

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व्यायाम वह गतिविधि है, जो शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ व्यक्ति के संपूर्ण स्वास्थ्य को भी बढ़ाती है। लगातार और नियमित व्यायाम करने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत हेाती है। यहां व्यायाम श्लोक के माध्यम से व्यायाम के महत्व को बताया गया है।

कुछ लोकप्रिय व्यायाम के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।


श्लोक 1

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।।
आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम् ॥

अर्थ- व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

श्लोक 2

व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् ।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥

अर्थ- व्यायाम करने वाला मनुष्य गरिष्ठ, जला हुआ अथवा कच्चा किसी प्रकार का भी खराब भोजन क्यों न हो, चाहे उसकी प्रकृति के भी विरुद्ध हो, भली-भांति पचा जाता है और भोजन उसे कुछ भी हानि नहीं पहुंचाता।

श्लोक 3

शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता ।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा ॥

अर्थ- व्यायाम से शरीर बढ़ता है। शरीर की कान्ति वा सुन्दरता बढ़ती है। शरीर के सब अंग सुड़ौल होते हैं। पाचनशक्ति बढ़ती है। आलस्य दूर भागता है। शरीर दृढ़ और हल्का होकर स्फूर्ति आती है। तीनों दोषों की (मृजा) शुद्धि होती है।

श्लोक 4

श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता ।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामदुपजायते ॥

अर्थ- श्रम थकावट ग्लानि (दुःख) प्यास शीत (जाड़ा) उष्णता (गर्मी) आदि सहने की शक्ति व्यायाम से ही आती है और परम आरोग्य अर्थात् स्वास्थ्य की प्राप्ति भी व्यायाम से ही होती है।

श्लोक 5

न चास्ति सदृशं तेन किंचित्स्थौल्यापकर्षणम् ।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो भयात् ॥

अर्थ- अधिक स्थूलता को दूर करने के लिए व्यायाम से बढ़कर कोई और औषधि नहीं है, व्यायामी मनुष्य से उसके शत्रु सर्वदा डरते हैं और उसे दुःख नहीं देते।

श्लोक 6

समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥

अर्थ- जिस मनुष्य के दोष वात, पित्त और कफ, अग्नि (जठराग्नि), रसादि सात धातु, सम अवस्था में तथा स्थिर रहते हैं, मल मूत्रादि की क्रिया ठीक होती है और शरीर की सब क्रियायें समान और उचित हैं, और जिसका मन, इन्द्रिय और आत्मा प्रसन्न रहें, वह मनुष्य स्वस्थ है ।

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