परिचय

विट्ठलभाई पटेल स्वाधीनता आन्दोलन के एक जरुरी और महत्वपूर्ण नेता, संविधानवेत्ता और लौहपुरुष थे। विट्ठलभाई पटेल, सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई थे। विट्ठल भाई पटेल केन्द्रीय असेंबली के सदस्य और आगे चलकर अध्यक्ष भी बने थे। विट्ठलभाई पटेल ने स्वराज पार्टी का गठन किया। उन्होंने इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री हासिल की और वकालत के पेशे में अपनी काफी अच्छी पहचान बना ली।

इसके कुछ समय बाद विट्ठलभाई पटेल राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हो गये। विट्ठलभाई पटेल एक बहुत अच्छे वक्ता के तौर पर भी जाने जाते हैं। वे कांग्रेस पार्टी के एक उग्र नेता थे। विट्ठलभाई पटेल गाँधीजी के विचारों से बिलकुल अलग सोचते थे, इस वजह से कई बातों पर गांधी जी और विट्ठलभाई पटेल के बीच में मतभेद भी रहे।

शुरूआती जीवन

विट्ठलभाई झावेरभाई पटेल का जन्म 27 सितम्बर, 1871 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। विट्ठलभाई पटेल, 5 पटेल भाइयों में तीसरे नंबर के थे। विट्ठलभाई पटेल, वल्लभभाई पटेल से 4 साल बड़े थे। विट्ठलभाई पटेल की शुरूआती शिक्षा ‘करमसद’ और ‘नड़ियाद’ में हुई थी और उसके बाद उन्होंने मुंबई में भी शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद विट्ठलभाई पटेल ने ‘गोधरा’ और ‘बोरसद’ के न्यायालय में एक कनिष्ठ अधिवक्ता ( junior advocate) के रूप में काम करना शुरू किया। इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बनना विट्ठलभाई पटेल का सपना था। विट्ठलभाई पटेल की शादी कम उम्र में ही कर दी गई थी।

विट्ठलभाई पटेल के छोटे भाई ‘वल्लभभाई पटेल’ भी बड़ी मेहनत से पढ़-लिखकर कनिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर काम कर रहे थे और इंग्लैंड से बैरिस्टर की पढाई करना चाहते थे, मगर बड़े भाई का सम्मान करते हुए उन्होंने अपनी पढाई के लिए इकट्ठा किए हुए धन को अपने बड़े भाई को दे दिया और विट्ठलभाई पटेल के इंग्लैंड में रहने का खर्च भी वल्लभभाई पटेल ने उठाया। इसी  वजह से विट्ठलभाई पटेल इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बन सके।

करियर

इंग्लैंड जाने के बाद विट्ठलभाई पटेल ने कानून की पढाई शुरू कर दी और उन्होंने 36 महीने का पाठ्यक्रम 30 महीने में ही ख़त्म कर दिया और अपनी कक्षा में पहले स्थान पर आये। सन् 1913 में विट्ठलभाई पटेल फिर से भारत आ गये और बॉम्बे और अहमदाबाद के न्यायालयों में एक वकील के तौर पर काम करने लगे। कुछ समय बाद ही विट्ठलभाई पटेल का नाम काफी नामी बैरिस्टरस की सूची में आ गया और उनके पास काफी पैसा भी हो गया। वे बहुत कम समय में बहुत मशहूर हो गये। सन् 1915 में विट्ठलभाई पटेल की पत्नी का देहांत हो गया और इससे विट्ठलभाई पटेल को गहरा सदमा लगा।

राजनीतिक जीवन

1915 में पत्नी के देहांत के बाद विट्ठलभाई पटेल की रूचि राजनीतिक विषयों में बढने लगी। विट्ठलभाई पटेल पूरी तरह कभी भी गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं थे, मगर उसके बावजूद उन्होंने देश की आजादी में योगदान देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सदस्यता हासिल की।

असहयोग आन्दोलन में बाकी सब की तरह विट्ठलभाई पटेल ने भी जोर-शोर से हिस्सा लिया, मगर चौरी-चौरा कांड के बाद जब गांधी जी ने बिना किसी से परामर्श किए असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया, तब विट्ठलभाई पटेल को गाँधी जी का यह फैसला अच्छा नहीं लगा और उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया।

उसके बाद विट्ठलभाई पटेल ने चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरु के साथ मिलकर ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया। स्वराज पार्टी का मकसद था कि वे विधान परिषदों में प्रवेश करें और सरकार के काम-काज में बांधा पैदा करें। स्वराज पार्टी की वजह से कांग्रेस में दरार पड़ने लगी थी।

विट्ठल भाई पटेल को बॉम्बे विधान परिषद् के लिए चुना गया, जहाँ विट्ठल भाई पटेल को देश को आजादी दिलाने के लिए कोई काम करने का मौका नहीं मिला, मगर उन्होंने अपने भाषणों से अंग्रेजी अधिकारियों और और अंग्रेजी सरकार की नीतियों का खुलकर विरोध किया।

सन् 1923 में उन्हें ‘केन्द्रीय विधान परिषद्’ के लिए चुना गया और सन् 1925 में विट्ठलभाई पटेल इसके अध्यक्ष बन गये। विट्ठलभाई पटेल का व्यक्तित्व काफी निष्पक्ष और निर्भीक था, जिसकी वजह से ही लोगों के दिलों में से उनकी छाप मिटाना मुमकिन नहीं था। केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष के पद पर काम करते हुए केवल भारत में ही नहीं, बल्कि बाकी देशों में भी अपना नाम फैलाया। विधि से जुड़े हुए अपने सूक्ष्म ज्ञान की मदद से उन्होंने तत्कालीन सरकार को भी कई बार मुश्किल में डाल दिया था।

सन् 1930 में विट्ठलभाई पटेल ने केन्द्रीय विधान सभा से अध्यक्षता छोड़ते हुए इस्तीफा दे दिया और कहा ‘आजादी की इस लड़ाई में मेरी असली जगह विधान सभा की कुर्सी पर नहीं, बल्कि रणभूमि में है’।

कांग्रेस के ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा देने के बाद विट्ठल भाई पटेल दोबारा कांग्रेस में शामिल हो गये। मगर सन् 1930 में ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के साथ विट्ठलभाई पटेल को भी गिरफ्तार कर लिया और उसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया था। जेल में उनकी तबीयत खराब होने की वजह से उन्हें उनकी सजा पूरी होने से पहले ही सन् 1931 में रिहा कर दिया गया। इसके बाद वे अपनी हालत ठीक करने के लिए यूरोप चले गये।

मृत्यु

जेल से बहार आने के बाद विट्ठलभाई पटेल अपने इलाज के लिए वियना, ऑस्ट्रिया चले गये। वहाँ पर वे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से मिले, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी वहाँ अपने इलाज के लिए आये हुए थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तो ठीक होने लगे थे, मगर विट्ठलभाई पटेल की हालत बिगडती जा रही थी। सेहत ज्यादा बिगड़ने की वजह से 22 अक्टूबर 1933 को जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में विट्ठलभाई पटेल का देहांत हो गया। 10 नवम्बर 1933 को बॉम्बे में उनका अंतिम संस्कार किया गया।