विनोबा भावे की जीवनी | Vinoba Bhave Biography in Hindi

0
153

परिचय

आचार्य विनोबा भावे भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानीसामाजिक कार्यकर्ता तथा प्रसिद्ध गाँधीवादी नेताथे। आजादी की लड़ाई में अहिंसात्मक रूप से इनका बहुत बड़ा सहयोग रहा। ये मानवाधिकार की रक्षाऔर अहिंसा के लिए सदैव कार्यरत रहे। विनोबा भावे ने राष्ट्र निर्माण के लिए भूदान आन्दोलन में योगदान दिया और देश के लिए यह योगदान बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। विनोबा भावे महात्मा गाँधी के मुख्य शिष्यों में से एक थे, जिन्होंने सदैव महात्मा गाँधी के मार्ग का अनुसरण करते हुए अपना जीवन राष्ट्र निर्माण में लगाया। आचार्य विनोबा भावे को “विनोबा” नाम गाँधी जी ने दिया था।

जन्म व बचपन

विनोवा भावे का पूरा नाम विनायक नरहरि भावे था। उनका जन्म 18 सितम्बर सन. 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में गगोदा नामक ग्राम में हुआ था। विनोबा भावे के पिता का नाम नरहरि शम्भू राव था तथा उनकी माता का नाम रुक्मणी बाई था। विनोबा भावे के पिता चितपावन ब्राह्मण होने के साथ-साथ एक बहुत ही अच्छे बुनकर भी थे। उनकी माता एक धार्मिक महिला थी और विनोबा भावे को प्यार से “विन्या” कहकर बुलाती थी। रुक्मणी बाई के विनोबा भावे के आलावा दो पुत्र और थे।

शिक्षा

विनोबा भावे ने बहुत ही कम आयु में श्रीमद भगवद गीता जैसे ग्रंथो को पढ़ लिया था। श्रीमद भगवद गीता के ज्ञान से विनोबा भावे बहुत प्रभावित हुए। कुछ समय उपरान्त विनोबा भावे कक्षा 12वीं की परीक्षा देने के लिये मुंबई जा रहे थे, उसी दौरान महात्मा गाँधी ने बनारस में स्थित हिन्दू विश्व विद्यालय में एक बहुत प्रभावशाली भाषण दिया था, जिसके कुछ अंश अखबारों में छपे। विनोबा भावे ने उस अख़बार में छपे अंशों को पढ़कर और महात्मा गाँधी के विचारों से बहुत प्रभावित होकर आगे की पढ़ाई से मुंह मोड़ लिया। कुछ समय बाद विनोबा भावे ने गाँधी जी को एक पत्र लिखा, जबाबी पत्र में महात्मा गाँधी ने उन्हें अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में मिलने के लिए बुलाया। विनोबा भावे की महात्मा गाँधी से पहली मुलाकात 7 जून सन. 1916 में हुई और इस मुलाकात से विनोबा भावे और भी प्रभावित हुए, तभी से उनका पढ़ना-लिखना बंद हो गया और उन्होंने अपना सारा जीवन गाँधी जी के रास्तों पर चलते हुए देश की सेवा में लगा दिया।

सामाजिक और धार्मिक कार्य

विनोबा भावे बचपन में अपनी माता का अनुसरण करते हुए आचार्य जीवन में धर्म का महत्व समझ गये थे। बाद में महात्मा गाँधी के समीप रहने से उनमें सामाजिक चेतना जाग्रत होती गई। विनोबा भावे का धार्मिक दृष्टिकोण बहुत ही बड़ा था, जिसमें अनेक धर्म के विचारों का समावेश था। विनोभा भावे के धर्मिक दृष्टिकोण में बहुधर्मी विचारों का समावेश उनकी एक युक्ति ‘ओम तत सत’ से समझा जा सकता है। इस ‘ओम तत सत’ से समस्त धर्मो के प्रति आदर और सद्भावना देखने को मिलती है। इनका एक नारा “जय जगत” था और उनके विचारों को इस युक्ति के आधार पर आसानी से समझा जा सकता है।

भूदान आन्दोलन

सन. 1951 में भूदान आन्दोलन संत विनोबा भावे द्वारा आरम्भ किया गया। उनकी कोशिश थी कि भूमि एक निजी इच्छा से बांटी जाए, सरकारी कानूनों के द्बारा नही बल्कि एक आंदोलन के माध्यम से इसकी सफल कोशिश की जाए। 20 वीं सदी के पचासवें दशक में भूदान आंदोलन को सफल बनाने के लिए विनोबा ने गांधीवादी विचारों पर चलते हुए रचनात्मक कार्यों और ट्रस्टीशिप जैसे विचारों को प्रयोग में लाया। उन्होंने “सर्वोदय समाज” की स्थापना की। यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था।

मृत्यु

विनोबा भावे ने अपने जीवन के आखिरी दिन ब्रम्ह विद्या मंदिर में गुजारे। अन्तिम समय में उन्होंने जैन धर्म की मान्यता के अनुसार समाधि मरण / संथारा का रास्ता अपनाया और इसके बाद उन्होंने दवा और खाना-पीना भी छोड़ दिया। विनोबा भावे की मृत्यु 15 नवम्बर सन. 1982 में हुई। उस समय भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी थी। उसी दिन श्रीमति इंदिरा गाँधी एक सोवियत नेता लियोनिद के अन्तिम संस्कार के लिए मास्को जाने वाली थी, परन्तु विनोबा भावे की मृत्यु की खबर सुनकर उन्होंने वहां जाना रद्द कर दिया और वे विनोबा भावे के अन्तिम संस्कार में शामिल हुई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here