विदुर नीति श्लोक | Vidur Niti Shlok in Hindi

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“विदुर नीति” मुख्य रूप से राजनीतिक विज्ञान के विषय में, महान महाकाव्य महाभारत में विदुर और राजा धृतराष्ट्र के बीच वार्ता के रूप में सुनाई गई है। विदुर अपने ज्ञान, ईमानदारी और प्राचीन आर्यन राज्य हस्तिनापुर के प्रति अटूट वफादारी के लिए जाने जाते थे।

कुछ लोकप्रिय विदुर नीति के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।

श्लोक 1

क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥

अर्थ- जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।

श्लोक 2

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥

अर्थ- विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्ठा करते हैं कि वे यथाशक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।

श्लोक 3

आत्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता ।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥

अर्थ- जो अपने योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुःख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।

श्लोक 4

निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः ।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥

अर्थ- जो व्यक्ति किसी भी कार्य-व्यवहार को निश्चयपूर्वक आरंभ करता है, उसे बीच में नहीं रोकता, समय को बरबाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है।

श्लोक 5

न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गाङ्गो ह्रद ईवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥

अर्थ- जो व्यक्ति न तो सम्मान पाकर अहंकार करता है और न अपमान से पीड़ित होता है। जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभरहित और शांत रहता है, वही ज्ञानी है।

श्लोक 6

प्रवृत्तवाक् विचित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।
आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥

अर्थ- जो व्यक्ति बोलने की कला में निपुण हो, जिसकी वाणी लोगों को आकर्षित करे, जो किसी भी ग्रंथ की मूल बातों को शीघ्र ग्रहण करके बता सकता हो, जो तर्क-वितर्क में निपुण होवही ज्ञानी है।

श्लोक 7

अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥

अर्थ- जो व्यक्ति अपने हितैषियों को त्याग देता है तथा अपने शत्रुओं को गले लगाता है और जो अपने से शक्तिशाली लोगों से शत्रुता रखता है, उसे महामूर्ख कहते हैं।

श्लोक 8

अश्रुतश्च समुत्रद्धो दरिद्रश्य महामनाः।
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥

अर्थ-बिना पढ़े ही स्वयं को ज्ञानी समझकर अहंकार करने वाला, दरिद्र होकर भी बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने वाला तथा बैठे-बिठाए धन पाने की कामना करने वाला व्यक्ति मूर्ख कहलाता है।

श्लोक 9

संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥

अर्थ- जो व्यक्ति अनावश्यक कर्म करता है, सभी को संदेह की दृष्टि से देखता है, आवश्यक और शीघ्र करने वाले कार्यो को विलंब से करता है, वह मूर्ख कहलाता है।

श्लोक 10

अनाहूत: प्रविशति अपृष्टो बहु भाषेते ।
अविश्चस्ते विश्चसिति मूढचेता नराधम: ॥

अर्थ- मूर्ख व्यक्ति बिना आज्ञा लिए किसी के भी कक्ष में प्रवेश करता है, सलाह माँगे बिना अपनी बात थोपता है तथा अविश्वसनीय व्यक्ति पर भरोसा करता है।

श्लोक 11

एकः क्षमावतां दोषो द्वतीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥

अर्थ- क्षमाशील व्यक्तियों में क्षमा करने का गुण होता है, लेकिन कुछ लोग इसे उसके अवगुण की तरह देखते हैं। यह अनुचित है।

श्लोक 12

एको धर्म: परम श्रेय: क्षमैका शान्तिरुक्तमा।
विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ॥

अर्थ- केवल धर्ममार्ग ही परम कल्याणकारी है, केवल क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है, केवल ज्ञान ही परम संतोषकारी है तथा केवल अहिंसा ही सुख प्रदान करने वाली है।

श्लोक 13

द्वाविमौ पुरुषौ राजन स्वर्गस्योपरि तिष्ठत: ।
प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥

अर्थ- जो व्यक्ति शक्तिशाली होने पर क्षमाशील हो तथा निर्धन होने पर भी दानशील हो, इन दो व्यक्तियों को स्वर्ग से भी ऊपर स्थान प्राप्त होता है ।

श्लोक 14

न्यायार्जितस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ ।
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ॥

अर्थ- न्याय और मेहनत से कमाए धन के ये दो दुरूपयोग कहे गए हैं- एककुपात्र को दान देना और दूसरासुपात्र को जरूरत पड़ने पर भी दान न देना।

श्लोक 15

चत्वारि राज्ञा तु महाबलेना वर्ज्यान्याहु: पण्डितस्तानि विद्यात् ।
अल्पप्रज्ञै: सह मन्त्रं न कुर्यात दीर्घसुत्रै रभसैश्चारणैश्च ॥

अर्थ- अल्प बुद्धि वाले, देरी से कार्य करने वाले, जल्दबाजी करने वाले और चाटुकार लोगों के साथ गुप्त विचार-विमर्श नहीं करना चाहिए। राजा को ऐसे लोगों को पहचानकर उनका परित्याग कर देना चाहिए।

श्लोक 16

चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे ।
वृद्धो ज्ञातिरवसत्रः कुलीनः सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ॥

अर्थ- परिवार में सुख-शांति और धन-संपत्ति बनाए रखने के लिए बड़े-बूढ़ों, मुसीबत का मारा कुलीन व्यक्ति, गरीब मित्र तथा निस्संतान बहन को आदर सहित स्थान देना चाहिए। इन चारों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 17

पंचैव पूजयन् लोके यश: प्राप्नोति केवलं ।
देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च भिक्षून् अतिथि पंचमान् ॥

अर्थ- देवता, पितर, मनुष्य, भिक्षुक तथा अतिथि-इन पाँचों की सदैव सच्चे मन से पूजा-स्तुति करनी चाहिए। इससे यश और सम्मान प्राप्त होता है।

श्लोक 18

पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत:।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ॥

अर्थ- माता, पिता, अग्नि, आत्मा और गुरु इन्हें पंचाग्नी कहा गया है। मनुष्य को इन पाँच प्रकार की अग्नि की सजगता से सेवा-सुश्रुषा करनी चाहिए। इनकी उपेक्षा करके हानि होती है।

श्लोक 19

पंच त्वाऽनुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि ।
मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः ॥

अर्थ- पाँच लोग छाया की तरह सदा आपके पीछे लगे रहते हैं। ये पाँच लोग हैं- मित्र, शत्रु, उदासीन, शरण देने वाले और शरणार्थी।

श्लोक 20

दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान्। मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ॥
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश। तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः ॥

अर्थ- दस प्रकार के लोग धर्म-विषयक बातों को महत्त्वहीन समझते हैं।ये लोग हैं- नशे में धुत्त व्यक्ति, लापरवाह, पागल, थका-हारा व्यक्ति, क्रोध, भूख से पीड़ित, जल्दबाज, लालची, डरा हुआ तथा काम पीड़ित व्यक्ति। विवेकशील व्यक्तियों को ऐसे लोगों की संगति से बचना चाहिए। ये सभी विनाश की और ले जाते हैं।

श्लोक 21

ईर्ष्यी घृणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुःखिताः ॥

अर्थ- ईर्ष्यालु, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला तथा दूसरों के भाग्य पर जीवन बिताने वाला- ये छह तरह के लोग संसार में सदा दुःखी रहते हैं ।

श्लोक 22

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥

अर्थ- बुद्धि, उच्च कुल, इंद्रियों पर काबू, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, यथाशक्ति दान देना तथा कृतज्ञता- ये आठ गुण मनुष्य की ख्याति बढ़ाते हैं ।

श्लोक 23

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चित् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम् ।
न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः ॥

अर्थ- जो किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, हमेशा सावधान रहकर बुद्धि-विवेक द्वारा शत्रुओं से निबटता है, बलवानों के साथ जबरन नहीं भिड़ता तथा उचित समय पर शौर्य दिखाता है, वही सच्चा वीर है।

श्लोक 24

न संरम्भेणारभते त्रिवर्गमाकारितः शंसति तत्त्वमेव ।
न मित्रार्थरोचयते विवादं नापुजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥

अर्थ- जो जल्दबाजी में धर्म,अर्थ तथा काम का प्रारंभ नहीं करता,पूछने पर सत्य ही उद् घाटित (बोलता) करता है, मित्र के कहने पर विवाद से बचता है,अनादर होने पर भी दुःखी नहीं होता। वही सच्चा ज्ञानवान व्यक्ति है।

श्लोक 25

न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति ।
न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥

अर्थ- जो ठंडी पड़ी दुश्मनी को फिर से नहीं भड़काता, अहंकाररहित रहता है, तुच्छ आचरण नहीं करता,स्वयं को मुसीबत में जानकर अनुचित कार्य नहीं करता,ऐसे व्यक्ति को संसार में श्रेष्ठ कहकर विभूषित किया जाता है।

श्लोक 26

समैर्विवाहः कुरुते न हीनैः समैः सख्यं व्यवहारं कथां च ।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः॥

अर्थ- जो व्यक्ति अपनी बराबरी के लोगों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बोलचाल रखता है, गुणगान लोगों को सदा आगे रखता है, वह श्रेष्ठ नीतिवान कहलाता है।

श्लोक 27

य आत्मनाऽपत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुभर्वत्युत ।
अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः स तेजसा सूर्य इवावभासते ॥

अर्थ- जो व्यक्ति अपनी मर्यादा की सीमा को नहीं लाँघता,वह पुरुषोत्तम समझा जाता है। वह अपने सात्विक प्रभाव, निर्मल मन और एकाग्रता के कारण संसार में सूर्य के समान तेजवान होकर ख्याति पाता है।

श्लोक 28

किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः ।
इति कर्माणि सञ्चिन्त्य कुरयड् कुर्याद् वा पुरुषो न वा॥

अर्थ- काम को करने से पहले विचार करें कि उसे करने से क्या लाभ होगा तथा न करने से क्या हानि होगी? कार्य के परिणाम के बारे में विचार करके कार्य करें या न करें। लेकिन बिना विचारे कोई कार्य न करें।

श्लोक 29

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः।
न तं भर्तारमिच्छनित षण्ढं पतिमिव स्त्रियः ॥

अर्थ- जो थोथी (झूठी)बातों पर खुश होता हो तथा अकारण ही क्रोध करता हो, ऐसे व्यक्ति को प्रजा राजा नहीं बनाना चाहती, जैसे स्त्रियाँ नपुंसक व्यक्ति को पति नहीं बनाना चाहती।

श्लोक 30

पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान् स्वेन कर्मणा।
वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः ॥

अर्थ- अन्याय के मार्ग पर चलने वाला राजा विरासत में मिले राज्य को उसी प्रकार से नष्ट कर देता है, जैसे तेज हवा बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।

श्लोक 31

गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥

अर्थ- गायें गंध से देखती हैं,ज्ञानी लोग वेदों से,राजा गुप्तचरों से तथा जनसामान्य नेत्रों से देखते है।

श्लोक 32

एतयोपमया धीरः सत्रमेत बलीयसे ।
इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥

अर्थ- बुद्धिमान वही है जो अपने से अधिक बलवान के सामने झुक जाए और बलवान को देवराज इंद्र की पदवी दी जाती है। अतः इंद्र के सामने झुकना देवता को प्रणाम करने के समान है।

श्लोक 33

पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः ।
पतयो बान्धवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा वेदबान्धवाः ॥

अर्थ- पशुओं के रक्षक बादल होते है,राजा के रक्षक उसके मंत्री,पत्नियों के रक्षक उनके पति तथा वेदों के रक्षक ब्राह्मण (ज्ञानी पुरुष) होते हैं।

श्लोक 34

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते ।
मृजया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥

अर्थ- धर्म की रक्षा सत्य से होती है,विद्या की रक्षा अभ्यास से,सौंदर्य की रक्षा स्वच्छता से तथा कुल की रक्षा सदाचार से होती है।

श्लोक 35

मानेन रक्ष्यते धान्यमश्चान् रक्षत्यनुक्रमः ।
अभीक्ष्णदर्शनं ग्राश्च स्त्रियो रक्ष्याः कुचैलतः ॥

अर्थ- अनाज की रक्षा तौल से होती है,घोड़े की रक्षा उसे लोट-पोट कराते रहने से होती है, सतत् देख-रेख से गायों की रक्षा होती है और सादा वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है।

श्लोक 36

न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति में मतिः ।
अन्तेष्वपि हि जातानां वृतमेव विशिष्यते ॥

अर्थ- ऊँचे या नीचे कुल से मनुष्य की पहचान नहीं हो सकती। मनुष्य की पहचान उसके सदाचार से होती है,भले ही वह नीचे कुल में ही क्यों न पैदा हुआ हो।

श्लोक 37

शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥

अर्थ- शील ही मनुष्य का प्रमुख गुण है। जिस व्यक्ति का शील नष्ट हो जाता है-धन,जीवन और रिश्तेदार उसके किसी काम के नहीं रहते; अर्थात उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 38

एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम्।
अविधेया इवादान्ता हयाः पथि कुसारथिम् ॥

अर्थ- जैसे बेकाबू और अप्रशिक्षित घोड़े मूर्ख सारथी को मार्ग में ही गिराकर मार डालते हैं;वैसे ही यदि इंद्रियों को वश में न किया जाए तो ये मनुष्य की जान की दुश्मन बन जाती हैं।

श्लोक 39

रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम्।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥

अर्थ- बाणों से छलनी और फरसे से कटा गया जंगल पुनः हरा -भरा हो जाता है लेकिन कटु-वचन से बना घाव कभी नहीं भरता।

श्लोक 40

हिंसाबबलमसाधूनां राज्ञा दण्डविधिर्बलम्।
शुश्रुषा तु बलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम्॥

अर्थ- हिंसा दुष्ट लोगों का बल है,दंडित करना राजा का बल है,सेवा करना स्त्रियों का बल है और क्षमाशीलता गुणवानों का बल है।

श्लोक 41

यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय प्रराभवम्।
बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ॥

अर्थ- जिसके भाग्य में पराजय लिखी हो, ईश्वर उसकी बुद्धि पहले ही हर लेते हैं, इससे उस व्यक्ति को अच्छी बातें नहीं दिखाई देती, वह केवल बुरा-ही-बुरा देख पाता है।

श्लोक 42

बुद्धो कलूषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते।
अनयो नयसङ्कशो हृदयात्रावसर्पति ॥

अर्थ- विनाशकाल के समय बुद्धि विपरीत हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के मन में न्याय के स्थान पर अन्याय घर कर लेता है। वह अन्याय के आसरे (सहारे) ही सब निर्णय लेता है।

श्लोक 43

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा घृणा।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृत ॥

अर्थ- यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और लोभ विमुखता-धर्म के ये आठ मार्ग बताए गए हैं। इन पर चलने वाला धर्मत्मा कहलाता है।

श्लोक 44

जरा रुपं हरति हि धैर्यमाशा मृत्युः प्राणान् धर्मचर्यामसूया।
क्रोधः श्रियं शिलमनार्यसेवा हृियं कामः सर्वमेवाभिमानः॥

अर्थ- वृद्धावस्था खूबसूरती को नष्ट कर देती है, उम्मीद धैर्य को, मृत्यु प्राणों को, निंदा धर्मपूर्ण व्यवहार को, क्रोध आर्थिक उन्नति को, दुर्जनों की सेवा सज्जनता को, काम-भाव लाज-शर्म को तथा अहंकार सबकुछ नष्ट कर देता है।

श्लोक 45

असूयको दन्दशूको निष्ठुरो वैरकृच्छठः।
स कृच्छं महदाप्नोति नचिरात् पापमाचरन् ॥

अर्थ- अच्छाई में बुराई देखनेवाले, उपहास उड़ाने वाला, कड़वा बोलने वाला, अत्याचारी, अन्यायी तथा कुटिल पुरुष पाप कर्मो में लिप्त रहता है और शीघ्र ही मुसीबतों से घिर जाता है।

श्लोक 46

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।
वासो यथा रङ्गवशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥

अर्थ- कपड़े को जिस रंग में रँगा जाए, उस पर वैसा ही रंग चढ़ जाता है, इसी प्रकार सज्जन के साथ रहने पर सज्जनता, चोर के साथ रहने पर चोरी तथा तपस्वी के साथ रहने पर तपश्चर्या का रंग चढ़ जाता है।

श्लोक 47

प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन नित्योत्त्थानात् प्रज्ञया पौरुषेण।
न त्वेव सम्यग् लभते प्रशंसां न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ॥

अर्थ- बेईमानी से, बराबर कोशिश से, चतुराई से कोई व्यक्ति धन तो प्राप्त कर सकता है, लेकिन सदाचार और उत्तम पुरुष को प्राप्त होने वाले आदर-सम्मान को प्राप्त नहीं कर सकता।

श्लोक 48

वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

अर्थ- चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए। धन तो आता-जाता रहता है। धन के नष्ट होने पर भी चरित्र सुरक्षित रहता है, लेकिन चरित्र नष्ट होने पर सबकुछ नष्ट हो जाता है।

श्लोक 49

सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च।
पर्यायशः सर्वमेते स्पृशन्ति तस्माद् धीरो न हृष्येत्र शोचेत् ॥

अर्थ- सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, उत्पति-विनाश-ये सब स्वाभविक कर्म समय-समय पर सबको प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञानी पुरुष को इनके बारे में सोचकर शोक नहीं करना चाहिए। ये सब शाशवत कर्म हैं।

श्लोक 50

अर्चयेदेव मित्राणि सति वाऽसति वा धने।
नानर्थयन् प्रजानति मित्राणं सारफल्गुताम् ॥

अर्थ- मित्रों का हर स्थिति में आदर करना चाहिए-चाहे उनके पास धन हो अथवा न हो तथा उससे कोई स्वार्थ न होने पर भी वक़्त-जरूरत उनकी सहायता करनी चाहिए।

श्लोक 51

बुद्धयो भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति ॥

अर्थ- ज्ञान द्वारा मनुष्य का डर दूर होता है,तप द्वारा उसे ऊँचा पद मिलता है,गुरु की सेवा द्वारा विद्या प्राप्त होती है तथा योग द्वारा शांति प्राप्त होती है।

श्लोक 52

यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः।
मायाचारो मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः॥

अर्थ- जैसे के साथ तैसा ही व्यवहार करना चाहिए। कहा भी गया है- जैसे को तैसा। यही लौकिक नीति है। बुरे के साथ बुरा ही व्यवहार करना चाहिए और अच्छों के साथ अच्छा।

श्लोक 53

स्त्रीषु राजसु सर्पेषु स्वाध्यायप्रभुशत्रुषु।
भोगेष्वायुषि विश्चासं कः प्राज्ञः कर्तुर्महति ॥

अर्थ- बुद्धिमान लोगों को चाहिए क़ि वे स्त्री, राजा, सर्प, शत्रु, भोग, धातु तथा लिखी बात पर आँख मूँदकर भरोसा न करें।

श्लोक 54

सहायबन्धना ह्यर्थाः सहायाश्चर्थबन्धनाः।
अन्योऽन्यबन्धनावेतौ विनान्योऽन्यं न सिध्यतः॥

अर्थ- सहायक की सहयता से धन कमाया जा सकता है और धन देकर सहायक को अपने साथ जोड़े रखा जा सकता है। ये दोनों परस्पर पूरक हैं;दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

श्लोक 55

न विश्चसेदविश्चस्ते विश्चस्ते नातिविश्चसेत्।
विश्चासाद् भयमुत्पन्न मुलान्यपि निकृन्तति ॥

अर्थ- जो व्यक्ति भरोसे के लायक नहीं है,उस पर तो भरोसा न ही करें,लेकिन जो बहुत भरोसेमंद है, उस पर भी अंधे होकर भरोसा न करें, क्योंकि जब ऐसे लोग भरोसा तोड़ते हैं तो बड़ा अनर्थ होता है।

श्लोक 56

ब्राह्मणं ब्राह्मणो वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा।
अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च॥

अर्थ- समतुल्य लोग ही एक दूसरे को ठीक प्रकार से जान समझ पाते हैं, जैसे ज्ञानी को ज्ञानी, पति को पत्नी, मंत्री को राजा तथा राजा को प्रजा। अतः अपनी बराबरी वाले के साथ ही संबध रखना चाहिए।

श्लोक 57

येऽर्थाः स्त्रीषु समायुक्ताः प्रमत्तपतितेषु च।
ये चानार्ये समासक्ताः सर्वे ते संशयं गताः ॥

अर्थ- आलसी,अधम,दुर्जन तथा स्त्री के हाथों सौंपी संपत्ति बरबाद हो जाती है। इनसे सावधान रहना चाहिए।

श्लोक 58

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्षणं निषेवते।
तदेवापहरत्येनं तस्मात् कल्याणमाचरेत् ॥

अर्थ- मन, वचन, और कर्म से हम लगातार जिस वस्तु के बारे में सोचते हैं, वही हमें अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। अतः हमे सदा शुभ चीजों का चिंतन करना चाहिए।

श्लोक 59

न चातिगुणवत्स्वेषा नान्यन्तं निर्गुणेषु च।
नेषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यात्रानुरज़्यते।
उन्मत्ता गौरिवान्धा श्री क्वचिदेवावतिष्ठते॥

अर्थ- लक्ष्मी न तो प्रचंड ज्ञानियों के पास रहती है, न नितांत मूर्खो के पास। इन्हें न तो ज्ञानियों से लगाव है न मूर्खो से। जैसे बिगड़ैल गाय को कोई-कोई ही वश में कर पाता है, वैसे ही लक्ष्मी भी कहीं-कहीं ही ठहरती हैं।