वीर सावरकर

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जन्म तिथि 28 मई सन. 1883
जन्म स्थान भागुर, महाराष्ट्र, भारत
पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर
पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर
माता का नाम राधाबाई
पत्नी का नाम यमुनाबाई
मृत्यु 31 जुलाई सन. 1940
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी, कवि और लेखक

परिचय

वीर सावरकर एक स्वतन्त्र्ता सेनानी और राजनैतिक चिंतक के साथ-साथ कवि और लेखक भी थे। वीर सावरकर का जन्म 28 मई सन. 1883 को महाराष्ट्र में नासिक जिले के भागुर नामक ग्राम में हुआ था। सावरकर के पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर व माता का नाम राधाबाई था। सावरकर भारत में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू धर्म चाहते थे। सावरकर का ऐसा मानना था कि भारत हिन्दू प्रधान देश हो। देश में सभी लोग भले ही अलग-अलग जाति के रहते हों, लेकिन विश्व में भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में ही जाना जाये। इसके लिए सावरकर ने अपने जीवन में अनेकों प्रयास भी किये। सावरकर एक देशभक्त क्रांतिकारी थे। सावरकर हिंदुत्व के पक्षधर होने के साथ-साथ एक महान विद्वान भी थे। सावरकर ने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी कपड़ों की होली जलाई थी।

जन्म व बचपन

सावरकर का जन्म 28 मई सन. 1883 को महाराष्ट्र में नासिक जिले के भागुर गॉंव में मराठी चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वीर सावरकर का पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकरथा। सावरकर के पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर व माता का नाम राधाबाई था। बचपन से ही सावरकर पढ़ने-लिखने में तेज थे। सावरकर बचपन से ही विद्रोही स्वाभाव के थे।

प्रारंभिक जीवन

वीर सावरकर के पिता दामोदर पन्त सावरकर गॉंव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में जाने जाते थे। सावरकर के दो भाई और एक बहन थी। सावरकर के एक भाई का नाम गणेश (बाबाराव) सावरकर और दूसरे भाई का नाम नारायण सावरकर तथा बहन का नाम नैनाबाई था। महज 9 वर्ष की आयु में ही हैजा की बीमारी से सावरकर की माता की मृत्यु हो गयी। 7 साल के बाद प्लेग से ग्रस्त होने के कारण सावरकर के पिता दामोदर पन्त का भी देहांत हो गया। इसके बाद सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। सावरकर ने बच्चों के एक गिरोह का आयोजन किया, जिसका नाम “वानर सेना” था। उस समय सावरकर महज 11 साल के थे। सावरकर ने सन. 1901 में नासिक के शिवजी हाई स्कूल से मेट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। सावरकर हाईस्कूल के दौरान बाल गंगाधार तिलक द्वारा शुरू किये गए “शिवजी उत्सव” और “गणेश उत्सव” को आयोजित किया करते थे। सावरकर बाल गंगाधर तिलक को अपना गुरु मानते थे। सन. 1901 में सावरकर का विवाह रामचंद्र त्रयम्बक चिपलूणकर की बेटी यमुनाबाई के साथ हुआ। सन. 1902 में सावरकर ने स्नातक की पढाई के लिए पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में दाखिला लिया। आर्थिक हालत सही न होने के कारण सावरकर की स्नातक की शिक्षा का खर्च यमुनाबाई के पिता ने उठाया।

जीवन कार्य

पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में पढाई के समय भी सावरकर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण देते थे। सन. 1910 में सावरकर जब इंग्लैंड में कानून की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, तब एक हत्याकांड में सहयोग देने के कारण उनको एक जहाज के द्वारा भारत रवाना कर दिया गया, परन्तु फ़्रांस के मार्सलीज बंदरगाह के निकट जहाज में से सावरकर समुद्र में कूदकर भाग निकले, किन्तु पुनः पकडे गये और भारत लाये गए। भारत की स्वतंत्र्ता के लिए किये गए संघर्षों में वीर सावरकर का नाम बेहद खास रहा है। श्रेष्ठ देशभक्त और क्रांतिकारी सावरकर ने अपना सारा जीवन देश के लिए समर्पण कर दिया। क्रांतिकारी समुदाय इंडिया हाउस के साथ सावरकर के सहयोग होने के कारण सावरकर को कैद कर लिया गया था।

एक विशिष्ठ न्यायलय द्वारा सावरकर के आरोप की सुनवाई हुई और सावरकर को आजीवन कालापानी की दो बार सजा मिली। सावरकर ने पूना में सन. 1940में “अभिनव भारती” नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की, जिसका लक्ष्य आवश्यकता पड़ने पर बल-प्रयोग द्वारा स्वतंत्र्ता प्राप्त करना था। आजादी हेतु काम करने के लिए सावरकर ने एक गुप्त सोसाइटी बनाई गई, जोकि “मित्र मेला” के नाम से जानी गयी।

सन. 1942 में सावरकर ने भारत छोडो आंदोलन में अपने साथियों का साथ दिया और सावरकर भी इसी आंदोलन में शामिल हो गये। सावरकर ने सन. 1947 में भारत को अलग-अलग करने का भी विरोध किया था। महात्मा रामचंद्र वीर ने सावरकर का समर्थन किया। सावरकर ने कांग्रेस द्वारा भारत विभाजन के विषय में लिए गये निर्णय की अत्यधिक आलोचना की थी। सावरकर को भारतीय नेता मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या का अपराधी भी ठहराया गया था, लेकिन बाद में कोर्ट ने सावरकर को निर्दोष पाया। सन. 1924 से सन. 1937 का समय सावरकर के जीवन का समाज सुधार को समर्पण काल रहा।

मृत्यु

सावरकर की पत्नी यमुनाबाई का देहांत 8 नवम्बर सन. 1963 को हुआ था। सन. 1966 में सावरकर को तेज बुखार ने जकड लिया, जिसके बाद सावरकर का स्वास्थ गिरने लगा था। 1 फरवरी सन. 1966 को सावरकर ने मृत्युपर्यन्त व्रत रखने का निर्णय लिया। 26 फरवरी सन. 1966 को बम्बई में सुबह 10 बजे सावरकर ने पार्थिव शरीर छोड़कर परमधाम को प्रस्थान किया। सावरकर की अंतिम यात्रा पर 2000 आरएसएस के सदस्यों ने सावरकर को अंतिम विदाई दी और सावरकर के सम्मान में “गार्ड ऑफ़ हॉनर” भी दिया था।

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