शिक्षा, सीख, नसीहत, दीक्षा या गुरूमंत्र आदि उपदेश कहलाते हैं।

कुछ लोकप्रिय उपदेश के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।

श्लोक 1

आस्ते भग आसीनस्योर्ध्वस्तिष्ठति तिष्ठतः ।
शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति ॥

अर्थ- जो मनुष्य बैठा रहता है, उसका सौभाग्य (भाग्य) भी रुका रहता है। जो उठ खड़ा होता है, उसका सौभाग्य भी उसी प्रकार उठता है। जो पड़ा या लेटा रहता है, उसका सौभाग्य भी सो जाता है और जो विचरण में लगता है, उसका सौभाग्य भी चलने लगता है। इसलिए तुम हमेशा विचरण ही करते रहो।

श्लोक 2

न दैवमपि सञ्चित्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।
अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ॥

अर्थ- दैव यानी भाग्य का विचार करके व्यक्ति को कार्य-संपादन का अपना प्रयास नहीं त्यागना
चाहिए। भला समुचित प्रयास के बिना कौन तिलों से तेल प्राप्त कर सकता है ?

श्लोक 3

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचन्ति रात्र्यहानि ।
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत परेषु ॥

अर्थ- कठोर वचन रूपी बाण दुर्जन (बुरे) लोगों के मुख से निकलते ही हैं और उनसे आहत होकर अन्य जन (लोग) रात-दिन शोक एवं चिंता के घिर जाते हैं। स्मरण रहे कि ये वाग्वाण (वचन रूपी बाण) दूसरे के अमर्म यानी संवेदनाशून्य अंग पर नहीं गिरते, अतः समझदार व्यक्ति ऐसे वचन दूसरों के प्रति न बोले।

श्लोक 4

नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत ।
ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम् ॥

अर्थ- दूसरे के मर्म को चोट न पहुंचाए, चुभने वाली बातें न बोलें, घटिया तरीके से दूसरे को वश में न करें, दूसरे को उद्विग्न करने एवं ताप पहुंचाने वाली, पापी जनों के आचरण वाली बोली न बोलें ।

श्लोक 5

अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् ।
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ॥

अर्थ- अनजाने में जिन्होंने अपराध किया हो उनका अपराध क्षमा किया जाना चाहिए, क्योंकि हर मौके या स्थान पर समझदारी मनुष्य का साथ दे जाए ऐसा हो नहीं पाता है। भूल हो जाना असामान्य नहीं, अतः भूलवश हो गये अनुचित कार्य को क्षम्य माना जाना चाहिए ।

श्लोक 6

सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात् सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् ।
सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः ॥

अर्थ- व्यक्ति के कर्म ऐसे हों कि सज्जन लोग उसके समक्ष सम्मान ही व्यक्त करें और परोक्ष में भी उनकी धारणाएं सुरक्षित रहें। दुष्ट प्रकृति के लोगों की ऊलजलूल (फालतू) बातें सह ले और सदैव श्रेष्ठ लोगों के सदाचारण में स्वयं संलग्न रहे।

श्लोक 7

दन्तकाष्ठस्य खेटस्य विसर्जनमपावृतम् ।
नेष्टं जले स्थले भोग्ये मूत्रादेश्चापि गर्हितम् ॥

अर्थ- दातौन एवं कफ थूकने के पश्चात् उसे ढक देना चाहिए। इतना ही नहीं पानी, सार्वजनिक भूमि एवं आवासीय स्थल पर मूत्र आदि का त्याग निंदनीय कर्म है, अतः ऐसा नहीं करना चाहिए ।

श्लोक 8

मुखपूरं न भुञ्जीत सशब्दं प्रसृताननम् ।
प्रलम्बपादं नासीत न बाहू मर्दयेत् समम् ॥

अर्थ- मुंह में ठूंसकर, चप-चप जैसी आवाज के साथ एवं मुख पूरा फैलाकर भोजन नहीं करना चाहिए। पैर फैलाकर बैठने से भी बचे और दोनों बांहों को साथ-साथ न मरोड़े।

श्लोक 9

नाङ्गुल्या कारयेत् किञ्चिद् दक्षिणेन तु सादरम् ।
समस्तेनैव हस्तेन मार्गमप्येवमादिशेत् ॥

अर्थ- रास्ते के बारे में पूछने वाले पथिक को उंगली के इशारे से संकेत नहीं देना चाहिए, बल्कि समूचे दाहिने हाथ को धीरे-से समुचित दिशा की ओर उठाते हुए आदर के साथ रास्ता दिखाना चाहिए।

श्लोक 10

अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् ।
पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ॥

अर्थ- अब यदि बुद्धि प्रयोग से यानी सोच-समझकर अपराध करने के बाद वे तुमसे कहें कि अनजाने में ऐसा हो गया है, तो ऐसे मृथ्याचारियों को थोड़े-से अपराध के लिए भी दण्डित किया जाना चाहिए।