तुलसीदास के दोहे

0
97
‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोड़।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोड़।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं जो दूसरों की बुराई कर खुद प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं वो खुद अपनी प्रतिष्ठा खो देते हैं। ऐसे व्यक्ति के मुँह पर ऐसी कालिख पुतेगी जो कितना भी कोशिश करे कभी नहीं मिटेगी।

तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत विडम्बना, परिनामहु गत जान।।

अर्थ- तन की सुन्दरता, सदगुण, धन, सम्मान और धर्म आदि के बिना भी जिनको अभिमान है ऐसे लोगों का जीवन ही दुविधाओं से भरा हुआ है, जिसका परिणाम बुरा ही होता है।

वचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

अर्थ- वाणी की मधुरता और वस्त्रों की सुन्दरता से किसी भी पुरूष अथवा नारी के मन के विचारों को जाना नहीं जा सकता, क्योंकि मन से मैले सुपनखा, मरीचि, पूतना और दस सर वाले रावण के वस्त्र सुन्दर थे।

राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति मन के अन्दर और बाहर दोनों और उजाला चाहते हैं तब उन्हें अपने द्वार अर्थात मुख पर और देहलीज अर्थात जिव्हा पर प्रभु राम के नाम का दीपक जलाना होगा।

नामु राम को कलपतरू कलि कल्यान निवासु।
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।।

अर्थ- राम का नाम कल्पवृक्ष की तरह अमर कर देने वाला मुक्ति का मार्ग है जिसके स्मरण मात्र से तुलसीदास सा तुच्छ तुलसी के समान पवित्र हो गया।

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि सुंदर वेष देखकर न केवल मूर्ख अपितु बुद्धिमान मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुंदर मोर को ही देख लो, उसकी वाणी कितनी मधुर होती है लेकिन उसका आहार साँप है।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
विद्वान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।

अर्थ- शूरवीर युद्ध में अपना परिचय कर्मों के द्वारा देते हैं, उन्हें खुद का बखान करने की आवश्यक्ता नहीं होती और जो अपने कौशल का बखान शब्दों से करते हैं, वे कायर होते हैं।

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि।।

अर्थ- जो मनुष्य शरण में आये मनुष्य को अपने निजी स्वार्थ के लिए छोड़ देते हैं वे क्षुद्र पाप के भागी होते हैं। उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता।

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं धर्म का मूल भाव ही दया है, इसलिए दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए। इसके विपरित अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है।

सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।

अर्थ- जो मनुष्य सच्चे गुरू के आदेश अथवा सीख का पालन नहीं करता। वह अंत में अपने नुकसान को लेकर बहुत पछताता है।

मुखिया मुखु सो चाहिए खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि मुखिया शरीर के मुख के समान होता है। जिस तरह एक मुख भोजन करके पूरे शरीर का ध्यान रखता है, उसी प्रकार परिवार का मुखिया सभी सदस्यों का ध्यान रखता है।

सचिव बैद्य गुरू तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि मंत्री, बैद्य और गुरू ये तीनों यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों का शीघ्र की नाश हो जाता है।

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं। किसी को भी वश में करने का यह सबसे अच्छा मंत्र है। इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करें।

आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।

अर्थ- जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो, वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो।

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि किसी विपत्ति यानि किसी बड़ी परेशानी के समय आपको ये सात गुण बचाएंगे- आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।

तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। वो समय ही है जो व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता है। जैसे एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय खराब हुआ तो वह भीलों के हमले से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए।

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि ईश्वर पर भरोसा रखिए और बिना किसी भय के चैन की नींद सोइए। कोई अनहोनी नहीं होने वाली और यदि कुछ अनिष्ट होना ही है तो वो होकर ही रहेगा। इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपना काम कीजिए।

तुलसी इस संसार में भांति-भांति के लोग।
सबसे हँस मिल बोलिए, नदी नाव संयोग।।

अर्थ- तुलसी दास जी कहते हैं कि इस दुनियाँ में हर तरह के स्वभाव और व्यवहार वाले लोग रहते हैं। आप हर किसी से प्रेमपूर्वक मिलिए और बात कीजिए। जिस प्रकार नाव नदी से मित्रता कर आसानी से उसे पार कर लेती है, वैसे ही अच्छे व्यवहार से आप भी इस भव सागर को पार कर सकते हैं।

लसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौन।।

अर्थ- बारिश के मौसम में मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी अधिक हो जाती है कि कोयल की मीठी बोली उस कोलाहल में दब जाती है| इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है| यानि जब मेंढक रुपी धूर्त व कपटपूर्ण लोगों का बोलबाला हो जाता है तब समझदार व्यक्ति चुप ही रहता है और व्यर्थ ही अपनी उर्जा नष्ट नहीं करता|

काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान|
तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान||

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रहता, दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं|

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here