8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग | Trimbakeshwar Jyotirlinga in Hindi

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त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले से 25 किलोमीटर दूर गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक नजदीक ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है, जहाँ से गोदावरी नदी उद्गम होती है। भगवान शिव को त्र्यंबकेश्वर नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में रहना पड़ा।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा

शिव पुराण में वर्णित कथानुसार महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ तपोवन में निवास करते थे। उनके साथ ही अन्य ब्राहमण भी अपनी-अपनी पत्नियों से साथ वहीं निवास करते थे। किसी कारणवश ब्राहमणों की पत्नियाँ महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन सभी ने महर्षि गौतम और उनकी पत्नि अहिल्या को उस आश्रम से हटाना चाहा।

उन सभी ब्राहमणों ने भगवान गणेश जी की आराधना की, उनकी आराधना से खुश होकर गणेश जी ने दर्शन दिए और उनसे वर मांगने को कहा। सभी ब्राहमणों ने कहा-‘हे प्रभु, यदि आप हम से प्रसन्न हैं, तो कुछ ऐसा करें कि महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या सहित यहां से दूर चले जाएं।’ ब्राहमणों की इस बात को सुनकर गणेश जी ने उन्हें ऐसा वर न माँगने के लिए कहा, परन्तु उनके हठ के कारण गणेश जी ने यह बात स्वीकार कर ली।

अपने भक्तों का मन रखने के लिए गणेश जी एक कमजोर गाय का रूप धारण करके महर्षि गौतम के खेत में जाकर फसल चरने लगे। जब महर्षि गौतम ने उस गाय को देखा तो घास के एक छोटे से तिनके से उसे हाँकने लगे। तभी छोटा सा तिनका लगते ही वह गाय उसी खेत में गिरकर मर गयी। अब गौहत्या का पाप महर्षि गौतम के सर पर आ गया। सभी ब्राहमणों ने उन्हें गौ-हत्यारा बताकर घेर लिया और उनकी निंदा करने लगे।

महर्षि गौतम इस घटना से बहुत ही आश्चर्यचकित और दुःखी हुए। महर्षि गौतम ने अपने कल्याण और इस पाप से मुक्ति के लिए उन ब्राहमणों से प्रायश्चित और उद्धार का मार्ग बताने का आग्रह किया।

तब सभी ब्राहमणों ने कहा- ‘महर्षि गौतम तुम अपने द्वारा किए गए पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करो, फिर यहाँ वापस आकर एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद ब्रहमगिरी की 101 परिक्रमा करने के बाद ही तुम्हारी शुद्धि होगी या यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करने के पश्चात एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से भगवान शिव की आराधना करो। इसके बाद दोबारा गंगाजी में स्नान करके ब्रहमगिरी की 101 परिक्रमा करो, फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हें पापों से मुक्ति मिलेगी।’

इस तरह ब्राहमणों की बात मानकर महर्षि गौतम भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बताये अनुसार भगवान शिव की आराधना करने लगे। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने भगवान शिव से कहा- ‘प्रभु, मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गौ-हत्या के पाप से मुक्ति प्रदान करें।’ भगवान शिव ने कहा- ‘महर्षि गौतम! तुम सर्वथा निष्पाप हो, गौ-हत्या का आरोप तुम पर छल के द्वारा लगाया गया था। ब्राहमणों ने तुम्हारे साथ इस तरह का छल किया, अतः मैं उन्हें दंडित करना चाहता हूँ।’ भगवान शिव के मुख से यह बात सुनकर महर्षि गौतम ने उन्हें ऐसा ना करने को कहा। महर्षि गौतम बोले- ‘प्रभु उनके द्वारा ही मुझे आपके दर्शन का फल मिला है। उन्होंने तो मेरे जीवन को सफल ही किया है। आप उन्हें क्षमा कर दें और आप इस शिवलिंग में हमेशा के लिए वास कर लें, जिससे संपूर्ण जगत आपके दर्शनों का सुख भोग सके।’

भगवान शिव उनकी बात मानकर वहाँ त्रयंब ज्योतिर्लिंग के नाम से विराजमान हो गए। महर्षि गौतम द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहाँ पास में गोदवारी नाम से प्रवाहित होने लगीं। त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग सभी पुण्यों को प्रदान करने वाला है।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हे। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार हर रोज प्रातःकाल और संध्या के समय इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम जपने से या दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप या कष्ट दूर हो जाते हैं।

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के संबंध में श्लोक निम्नलिखित है-

श्लोक-
सह्याद्रीशीर्षे विमले वसंतम्, गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्यर्शनात् पातकपाशु नाशम्, प्रयाति त्र्यंबकमीशमीडे।।

ज्योतिर्लिंगों की तालिका

क्रम. संख्या ज्योतिर्लिंग का नाम ज्योतिर्लिंग का स्थान ज्योतिर्लिंग का संक्षिप्त वर्णन
1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे 17 बार नष्ट किया। सबसे अधिक नुकसान महमूद गजनवी के हमले से हुआ था। हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर, कुर्नूल, आन्ध्र प्रदेश मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है।
3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग क्षिप्रा नदी के तट पर, महाकाल, उज्जैन, मध्य प्रदेश महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आकार औंकार अर्थात ऊं जैसा है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है।
5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर, केदारनाथ, उत्तराखंड केदारनाथ ज्योतिर्लिंग समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है।
6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मुंबई से पूर्व दिशा में और पुणे से उत्तर दिशा में भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर, भीमाशंकर, महाराष्ट्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को ‘मोटेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान शिव ने भीमासुर राक्षस का वध किया था।
7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा तट पर, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश काशी विश्वनाथ में भगवान शिव का वास है, जो व्‍यक्ति इस पवित्र स्‍थान पर मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है, वह इस संसार के क्लेश से मुक्त हो जाता है।
8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे, नासिक, महाराष्ट्र ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में रहना पड़ा।
9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर, झारखंड लंकापति रावण ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर एक शिवलिंग प्राप्त किया, जिसे वह लंका में स्थापित करना चाहता था, परंतु ईश्वर की लीला से वह शिवलिंग वैद्यनाथ धाम में ‍ही स्थापित हो गया।
10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दारुकावन, द्वारका, गुजरात भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। धार्मिक शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता माने गए हैं, नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है।
11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम, रामनाड, तमिलनाडु इस ज्योतिर्लिंग के विषय में मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। यहां पर श्रीराम ने बालू का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की और रावण पर विजय हेतु भगवान शिव से वरदान मांगा।
12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग एल्लोरा के पास, औरंगाबाद, महाराष्ट्र ऐसी मान्यता है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से वंशवृद्धि होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका निर्माण अहिल्‍याबाई होल्‍कर के द्वारा करवाया गया था।