पानीपत का तीसरा युद्ध | Panipat Ka Tisra Yuddh | Third Battle of Panipat in Hindi

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पानीपत का तीसरा युद्ध
तिथि 14 जनवरी 1761
स्थान पानीपत, हरियाणा, भारत
परिणाम मराठा सदाशिवराव की पराजय और ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना

पानीपत का तीसरा युद्ध सदाशिवराव भाऊ (मराठा सेनापति) और अहमदशाह अब्दाली (अफगानिस्तान का सेनानायक) के बीच 14 जनवरी सन. 1761 को भारत में पानीपत के ऐतिहासिक मैदान पर लड़ा गया। यह युद्ध पंजाब पर मराठा शाशन स्थापित करने हेतु मराठा के सरदार पेशवा के आदेश से लड़ा गया, परन्तु मराठा सैनिक इस युद्ध को अपने निर्णय में नहीं कर सके। अत: सदाशिवराव और प्रधान सेनापति दोनों इस युद्ध में परास्त हुए, जिसके साथ ही मराठों का दौर भी समाप्त हो गया।

युद्ध

सन. 1748 से अहमदशाह अब्दाली भारत पर अपना शाशन स्थापित करने के लिए आक्रमण कर रहा था। उसने 23 जनवरी सन. 1756 तक भारत के सिंध, सरहिन्द, पंजाब और कश्मीर पर अपना शाशन स्थापित कर लिया। सन. 1757 को अब्दाली ने अपनी संतान तैमुरशाह को पंजाब का सूबेदार बनाया और स्वयं वापस अफगानिस्तान लौट गया। तैमुरशाह ने अपने सूबेदार के पद का रौब जमाते हुए, एक सम्मानित सिख का उपहास कर दिया, जिससे क्रोदित होकर सिखों ने मराठों के साथ मिलकर तैमूरशाह को देश से बाहर कर दिया। इस बात का अब्दाली को पता चलने पर उसने पुन: भारी संख्या में सैन्यबल के साथ पंजाब पर आक्रमण किया और दोबारा पंजाब पर अपना शाशन स्थापित कर दिया। उसके उपरांत अब्दाली ने निरंतर भारत पर आक्रमण करते हुए दिल्ली सहित कई प्रदेशों पर अपना राज्य स्थापित किया। अब्दाली को इस तरह निरंतर अपना राज्य अलग-अलग के राज्यों पर स्थापित करते हुए देखकर मराठा के सरदार पेशवा ने पुन: उत्तरी भारत पर मराठा शाशन स्थापित करने के लिए, अपने वीर सेनापति सदाशिवराव को यह कार्य दिया और अपनी संतान विश्वास राव को प्रधान सेनापति बनाया। 14 जनवरी सन. 1761 को पानीपत के युद्ध स्थल पर सदाशिवराव और अब्दाली की सेनाएँ युद्ध करने के लिए पहुंच गईं। इतिहासकारों के अनुसार मराठा की सैन्य शक्ति में 15,000 पैदल सैनिक और 55,000 अश्वारोही सैनिक थे, जिसमें अलग से 200 तोपें भी शामिल थीं। इसके अलावा मराठा सहयोगी इब्राहिम गर्दी की ओर से 40 हल्की तोपें और 9,000 पैदल सैनिक और 2,000 कुशल अश्वरोही सेना शामिल थी। दूसरी तरफ अहमदशाह अब्दाली की ओर से इस युद्ध में 80 बड़ी तोपें और 38,000 पैदल सैनिक, 42,000 अश्वरोही सैनिक और अलग से आरक्षित सैन्य टूकड़ी में 10,000 पैदल बंदूकधारी सैनिक, 2,000 ऊँट पर सवार सैनिक और 24 सैनिक दस्ते जिसमें प्रत्येक दस्ते में 1200 सैनिक शामिल थे। दोनों तरफ के सैनिक वा योद्धाओं में भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ, मराठा और मुगलों की तोपों की भयंकर गर्जन से पूरा युद्ध स्थल गूंजने लगा। लगभग तीन घंटों में दोनों तरफ के वीर सैनिकों की लाशें युद्ध भूमि को ढकने लगीं। उसके उपरांत मराठा के वीर सैनिकों ने अफगानी के सैनिकों को बुरी तरह युद्ध भूमि कर खदेड़ना शुरू किया और अब्दाली के 3,000 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया, जिससे अफगानी के सैनिकों में आंतक का साया बढ़ने लगा। अपनी सेना को यूं मरता हुआ देखकर अब्दाली वा उसके सहयोगियों ने युद्ध करने के तरीके को बदल दिया और अपने आरक्षित सैन्य बल के साथ मराठा सेना पर भीषण हमले शुरू कर दिए। जिससे सदाशिवराव को भारी संख्या में सैन्यबल की हानि हुई। युद्ध के दौरान कई बार सदाशिवराव की सेना अब्दाली की सेना पर भारी पड़ती तो कई बार अब्दाली की सेना, लेकिन अंतत: युद्ध निति को बदलकर अब्दाली ने युद्ध के निर्णय को अपने पक्ष में कर लिया और मराठा के वीर सैनिकों सहित सदाशिवराव युद्ध में परास्त हुए।

मराठों की इस युद्ध में पराजय से मराठों का दौर समाप्त हो गया और साथ में दुसरे युग का दौर शुरू हुआ, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी का शाशन स्थापित हुआ।

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