स्वामी दयानंद सरस्वती

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परिचय

स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक के रूप में पूज्यनीय थे। उन्हें एक महान देशभक्त व मार्गदर्शक के रूप में भी जाना जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज को अपने कार्यों से एक नई दिशा व उर्जा प्रदान की। महात्मा गाँधी जैसे अनेक महापुरुष स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारो से प्रभावित थे। दयानंद सरस्वती वैदिक धर्म में विश्वास रखते थे और उन्होंने देश में व्याप्त कुरीतियों व अन्धविश्वासों का सदैव विरोध किया। स्वामी जी ने कर्म एवं कर्मो के फल को ही जीवन का मूल सिद्धांत बताया। वह एक महान विचारक भी थे। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारो से समाज को धार्मिक आडम्बर से अलग करने का प्रयास किया, उन्होंने स्वराज्य का संदेश दिया और जिसको बाद में बाल गंगाधर तिलक ने अपनाया। उसके उपरांत बाल गंगाधर तिलक के द्वारा “स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है” का नारा दिया गया। देश के कई महान सपूत दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रेरित थे और उनके सिखाये गए मार्ग पर चलकर ही उन सपूतों ने देश को आजादी दिलाई।

जन्म व बचपन

स्वामी दयानंद सरस्वती के बचपन का नाम मूलशंकर तिवारी था। इनका जन्म 12 फरवरी सन. 1824 को गुजरात के टंकारा नामक गाँव में हुआ था। ये एक ब्राहम्ण परिवार से थे, इनके पिता जी का नाम अंबाशंकर तिवारी था तथा उनकी माता का नाम अमृतबाई था। स्वामी दयानंद सरस्वती के पिता एक समृद्ध नौकरी वाले व्यक्ति थे, इसलिए इनके परिवार में धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। स्वामी दयानंद सरस्वती ने वैदिक शिक्षा का ज्ञान प्राप्त किया और ज्ञान की तलाश में ये स्वामी विरजानंद से मिले, उन्हें अपना गुरु बनाया। स्वामी विरजानंद ने दयानंद सरस्वती को योग शास्त्र का ज्ञान दिया।

आर्य समाज स्थापना

स्वामी दयानंद सरस्वती ने सन. 1875 में गुडी पडवा के दिन मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज का मुख्य धर्म मानव धर्म ही था। उन्होंने मानव सेवा, परोपकार, कर्म व ज्ञान को मुख्य आधार बताया, जिनका उद्देश्य मानसिक, शारीरिक एवम् सामाजिक उन्नति था। इस प्रकार के विचारों के साथ स्वामी जी ने आर्य समाज की नींव रखी, जिससे कई महान विद्वान प्रेरित हुये। स्वामी जी का विरोध भी हुआ, लेकिन उनके तार्किक ज्ञान के सामने कोई रूक न सका। बड़े-बड़े विद्वानों, पंडितों को स्वामी जी के आगे सर झुकाना पड़ा। इस तरह के अंधविश्वास के अंधकार में वैदिक प्रकाश की अनुभूति सभी को होने लगी थी।

सन. 1857 की क्रांति में योगदान

स्वामी दयानंद सरस्वती ने सबसे पहले अग्रेजों के खिलाफ बोलना प्रारम्भ किया। उन्होंने देश घूमने के बाद देखा कि लोगों में भी अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश है, बस उन्हें सही मार्गदर्शन की जरूरत है, इसलिए उन्होंने लोगो को एकत्रित करने का कार्य किया। उस समय के महान वीर भी स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रभावित थे। उनमें तात्या टोपे, नाना साहिब, पेशबा, हाजी मुल्ला खाँ आदि थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार इन लोगों ने कार्य किया।

कुरीतियों का विरोध

स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज के प्रति स्वयं को उत्तरदायी माना है, उसमें व्याप्त कुरीतियों एवं अंधविश्वास के खिलाफ आवाज बुलंद की, जैसे- बाल विवाह विरोध, सत्ती प्रथा विरोध, विधवा पुनर्विवाह, एकता का संदेश, वर्ण भेद का विरोध, नारी शिक्षा एवं समानता आदि कुरीतियों का विरोध किया गया।

मृत्यु

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने 59 वर्ष के जीवन में राष्ट्र में व्याप्त बुराईयों के खिलाफ लोगों को जगाया, अपने वैदिक ज्ञान से नवीन प्रकाश को देश में फैलाया। सन. 1883 में स्वामी जी जोधपुर के महाराज राजा यशवंत सिंह के बुलावे पर उनसे मिलने जोधपुर गये। महाराज ने स्वामी जी के कई व्याख्यान सुने। एक दिन महाराज एक नर्तकी के साथ व्यस्त थे, तभी स्वामी जी ने यह सब देखकर इसका विरोध किया और महाराज को समझाया। इस कारण नर्तकी स्वामी जी से नाराज हो गई और एक षड़यंत्र के तहत उसने रसौईया के साथ मिलकर स्वामी जी के भोजन में संखिया (शीशे का चूरा) मिलवा दिया, जिससे स्वामी जी की तबीयत खराब हो गई। उनकी तबीयत खराब होने कारण उन्हें अजमेर भेजा गया, लेकिन हालत में सुधार नही हुआ। उन्होंने 30 अक्टूबर सन. 1883 को दीपावली के दिन संध्या के समय दुनिया से विदा ले ली।

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