परिचय

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक मशहूर भारतीय स्वाधीनता सेनानी रह चुके थे। भारत में जब ब्रिटिशों का राज्य था, तब सुरेन्द्रनाथ बनर्जी कुछ शुरूआती नेताओं में से एक थे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने ही ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ को स्थापित किया था, जिसकी गिनती भारत के शुरूआती राजनैतिक संगठनों में की जाती है।

आगे चलकर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बने। कई लोग सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को ‘राष्ट्रगुरु’ के उपनाम से भी जानते हैं। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी उन नेताओ में से एक थे, जिन्होंने हमेशा ब्रिटिश शासन का विरोध किया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने देशवासियों के हित के लिए भी कई कार्य किए।

कांग्रेस के बनने के कुछ शुरूआती दशकों में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और ‘गोपालकृष्ण गोखले’ जैसे नरमपंथी नेताओं की ही चलती थी। इन नेताओं के हिसाब से अंग्रजों के साथ मिलकर और उनकी मदद से देशवासियों के हक में बदलाव लाया जा सकता था। धीरे-धीरे कांग्रेस के अंदर ही इनके विचारों का विरोध होना शुरू हो गया। कई लोगों को इनके विचार और आजादी पाने के तरीके अच्छे नहीं लगते थे, मगर इस बात से बिलकुल भी मना नहीं किया जा सकता कि इन नेताओं ने भारत की आजादी के लिए बहुत काम किए। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कभी भी हार नहीं मानी और अपने देशवासियों के हितों के लिए अंग्रेजों पर दबाव डाला, ताकि वे अपने कानून में बदलाव लाये।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक नरमपंथी नेता थे। नरमपंथी नेताओं का गरमपंथी दल के नेताओं के साथ मतभेद था, क्योंकि गरमपंथी दल के नेता राजनैतिक व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते थे और भारतीयों को शासन का अधिकार दिलाना चाहते थे। उसके लिए वे हिंसात्मक तरीका भी इस्तेमाल करने के लिए तयार थे, मगर नरमपंथी नेताओं को यह बात सही नहीं लगती थी।

शुरूआती जीवन

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का जन्म 10 अगस्त 1848 को कलकत्ता में हुआ था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एक ब्राह्मण परिवार से है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के पिता का नाम ‘दुर्गा चरण बनर्जी’ था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी अपने पिता के उदार व प्रगतिशील विचारों से बहुत प्रभावित थे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की शुरूआती शिक्षा उनके परिवार के पैतृक शिक्षा संस्थान में हुई, जिसका नाम ‘हिन्दू कॉलेज’ था।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने स्नातक की उपाधि कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की और फिर उसके बाद सन् 1868 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी इंग्लैंड चले गये, ताकि वे भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में बैठ सके। सन् 1869 में उन्होंने परीक्षा पास कर ली, मगर उनकी उम्र से जुड़े कुछ विवादों की वजह से उनका चयन नहीं हो सका, मगर न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने एक बार फिर से परीक्षा दी और सन् 1871 में वे दोबारा चयनित हुए। चयन के बाद उन्हें सिलहट में सहायक मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त किया गया।

कुछ समय बाद ब्रिटिश प्रशासन ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी पर नस्ली भेदभाव करने का आरोप लगा दिया और उन्हें उनकी सरकारी नौकरी से बर्खास्त कर दिया। सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए वे इंग्लैंड गये, मगर उन्हें निराशा ही हाथ आई।  जब वे इंग्लैंड जा रहे थे उस दौरान उन्होंने ‘एडमंड बुर्के’ और कई उदारवादी दार्शनिकों की रचनाएं पढ़ी। इससे उन्हें ब्रिटिश सरकार का विरोध करने में बहुत मदद मिली।

राजनीतिक जीवन

सन् 1875 में भारत वापस आने के बाद उन्होंने ‘मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्युशन’, ‘फ्री चर्च इंस्टीट्युशन’ और ‘रिपन कॉलेज’ में अंग्रेजी के प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय, उदारवादी, राजनितिक और भारतीय इतिहास जैसे विषयों पर पब्लिक लेक्चर देना शुरू कर दिया।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और ‘आनंद मोहन बोस’ ने मिलकर 26 जुलाई 1876 को ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ की स्थापना की। यह संगठन भारत के सबसे पहले कुछ राजनैतिक संगठनों में से एक था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इस संगठन के जरिए ‘भारतीय सिविल सेवा’ में भारतीय उम्मीदवारों की आयु के मुद्दे को उठाया, ताकि भारतीय उम्मीदवारों को भी मौका मिल सके। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने पूरे देश में अपने भाषण दिए और भाषणों के जरिए ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा नस्ल-भेद की नीति का विरोध किया और इसी वजह से वे पूरे भारत में बहुत मशहूर हो गये।

सन् 1879 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने ‘द बंगाली’ नामक समाचार पत्र की स्थापना की थी। सन् 1883 में उन्हें एक लेख के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था, जो उनके समाचार पत्र में छपा था। तब बंगाल, आगरा, अमृतसर, फैजाबाद, लाहौर और पुणे जैसे शहरों ने इस गिरफ़्तारी का विरोध किया। समय के साथ धीरे-धीरे ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ में लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी और सन् 1885 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने ‘इंडियन नेशनल एसोसिएशन’ और ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ को जोड़ दिया, क्योंकि दोनों संगठनों का मकसद एक ही था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को सन् 1895 में पुणे से और सन् 1902 में अहमदाबाद से कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुना गया।

सन् 1905 में जब बंगाल विभाजन हो रहा था, तब सुरेन्द्रनाथ बनर्जी उसका विरोध करने वाले अग्रणी नेताओं में से एक थे। उन्होंने आगे बढ़कर कई आन्दोलनों में भाग लिया और उन्होंने कई याचिकाओं और विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी किया और इसकी वजह से अंग्रेज़ी हुकुमत द्वारा बंगाल विभाजन के फैसले को सन 1912 में वापस ले लिया गया था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले और सरोजिनी नायडू जैसे उभरते नेताओं के संरक्षक भी बन चुके थे।

मृत्यु

सन् 1923 में जो चुनाव हुए, उसमें स्वराज पार्टी के ‘बिधान चन्द्र रॉय’ से हारने के बाद सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सार्वजनिक जीवन से प्राय: अलग रहे और 6 अगस्त, 1925 को बैरकपुर में उनका देहांत हो गया था।