सूरदास के दोहे | Surdas Ke Dohe in Hindi

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चरन कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय बार.बार बंदौं तेहि पाई॥

अर्थ- श्रीकृष्ण की कृपा होने पर लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को लाँघ लेता हैए अन्धे को सबकुछ दिखाई देने लगता हैए बहरा व्यक्ति सुनने लगता हैए गूंगा बोलने लगता हैए और गरीब व्यक्ति भी अमीर हो जाता है। ऐसे दयालु श्रीकृष्ण की चरण वन्दना कौन नहीं करेगा।

अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

अर्थ- यहाँ अव्यक्त उपासना को मनुष्य के लिए कठिन बताया है। निराकार ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है। वह मन और वाणी का विषय नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गूंगे को मिठाई खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाएए तो वह मिठाई का स्वाद नहीं बता सकता है। उस मिठाई के रस का आनंद तो उसका अंतर्मन हीं जानता है। निराकार ब्रह्म का न रूप हैए न गुण। इसलिए मन वहाँ स्थिर नहीं हो सकता हैए सभी तरह से वह अगम्य है। इसलिए सूरदास सगुण ब्रह्म अर्थात श्रीकृष्ण की लीला का ही गायन करना उचित समझते हैं।

अब कै माधव मोहिं उधारि।
मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥
नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग।
लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥
मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार।
पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥
काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर।
नाहिं चितवत देत तियसुत नाम.नौका ओर॥
थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल।
स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥

अर्थ- संसार रूपी सागर में माया रूपी जल भरा हुआ हैए लालच की लहरें हैंए काम वासना रूपी मगरमच्छ हैए इन्द्रियाँ मछलियाँ हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है। इस समुद्र में मोह सवार है। काम.क्रोध आदि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नाव हीं पार लगा सकती है। स्त्री और बेटों का माया.मोह इधर.उधर देखने हीं नहीं देता। भगवान हीं हाथ पकड़कर हमारा बेड़ा पार कर सकते हैं।

मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी।
ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥
पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।
मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥
एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी।
भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥
मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी।
स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥
सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी।
अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥

अर्थ- हे प्रभुए मैंने तुमसे एक होड़ लगा ली है। तुम्हारा नाम पापियों का उद्धार करने वाला हैए लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं है। आज मैं यह देखने आया हूँ कि तुम कहाँ तक पापियों का उद्धार करते हो। तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह कर रखा है। इस बाजी में देखना है कौन जीतता है। मैं तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों से बचकरए पाप.पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूँ।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ||
कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात||
गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।|
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।|
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥

अर्थ- बालक श्रीकृष्ण मैया यशोदा से कहते हैंए कि बलराम भैया मुझे बहुत चिढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि तुमने मुझे दाम देकर खरीदा हैए तुमने मुझे जन्म नहीं दिया है। इसलिए मैं उनके साथ खेलने नहीं जाता हूँए वे बार.बार मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारे माता.पिता कौन हैं। नन्द बाबा और मैया यशोदा दोनों गोरे हैंए तो तुम काले कैसे हो गए। ऐसा बोल.बोल कर वे नाचते हैंए और उनके साथ सभी ग्वाल.बाल भी हँसते हैं। तुम केवल मुझे हीं मारती होए दाऊ को कभी नहीं मारती हो। तुम शपथ पूर्वक बताओ कि मैं तेरा ही पुत्र हूँ। कृष्ण कि ये बातें सुनकर यशोदा मोहित हो जाती है।

मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥

अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चलते हैं। उनके छोटे से हाथ में ताजा मक्खन है और वे उस मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं। उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई है। मुँह पर दही लिपटा हैए उनके गाल सुंदर हैं और आँखें चपल हैं। ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है। बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं। जब वे घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती हैए जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भौंरा मधुर रस पीकर मतवाले हो गए हैं। उनका सौंदर्य उनके गले में पड़े कंठहार और सिंह नख से और बढ़ जाती है। सूरदास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए। अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक ही है।

बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
काहे को हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।
सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥

अर्थ- श्रीकृष्ण जब पहली बार राधा से मिलेए तो उन्होंने राधा से पूछा कि हे गोरी! तुम कौन होघ् कहाँ रहती होघ् किसकी पुत्री होघ् मैंने तुम्हें पहले कभी ब्रज की गलियों में नहीं देखा है। तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आईघ् अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती। इतना सुनकर राधा बोलीए मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है। तब कृष्ण बात बदलते हुए बोलेए लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे। अच्छा चलोए हम दोनों मिलजुलकर खेलते हैं। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली.भाली राधा को भरमा दिया।

मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु।
नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥
मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।
चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥
इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥

अर्थ- यह ब्रज की मिट्टी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं। उस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत शांति मिलती है। सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तुम क्यों इधर.उधर भटकते हो। ब्रज में हीं रहोए यहाँ न किसी से कुछ लेना हैए और न किसी को कुछ देना है। ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ मिले उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है। सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु गाय भी नहीं कर सकती है।

चोरि माखन खात चली ब्रज घर घरनि यह बात।
नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥
कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥
कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥
कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥
सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥

अर्थ- ब्रज के घर-घर में यह बात फ़ैल गई है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें आपस में चर्चा कर रही थी। उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पहले ही वो मेरे घर आए थे। कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वे भाग गए। एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं। मैं तो उन्हें इतना ज्यादा और बढ़िया माखन दूँ जितना वे खा सकें] लेकिन किसी तरह वे मेरे घर तो आएँ। तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिख जाएँ तो मैं उन्हें गोद में भर लूँ। एक और ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वे मिल जाएँ तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही न सके। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु से मिलने की जुगत बिठा रही थी। कुछ ग्वालिनें यह भी कह कर रही थी कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएँ तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें।

कबहुं बोलत तात खीझत जात माखन खात|
अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात||
कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धुरि धूसर गात|
कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात||
कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात|
सुर हरी की निरखि सोभा निमिष तजत न मात||

अर्थ- एक बार कृष्ण माखन खाते खाते रूठ गए और रूठे भी ऐसे की रोते.रोते नेत्र लाल हो गये| भौंहें वक्र हो गई और बार बार जंभाई लेने लगे| कभी वह घुटनों के बल चलते थे जिससे उनके पैरों में पड़ी पैंजनिया में से रुनझुन स्वर निकालते थे| घुटनों के बल चलकर ही उन्होंने सारे शरीर को धुलदृधूसरित कर लिया| कभी श्रीकृष्ण अपने ही बालों को खींचते और नैनों में आंसू भर लाते| कभी तोतली बोली बोलते तो कभी तात ही बोलते| सूरदास कहते हैं की श्रीकृष्ण की ऐसी शोभा को देखकर यशोदा उन्हें एक एक पाल भी छोड़ने को न हुई अर्थात् श्रीकृष्ण की इन छोटी छोटी लीलाओं में उन्हें अद्भुत रस आने लगा| |

जसोदा हरि पालनै झुलावै|
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोई कछु गावै||
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै|
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै||
कबहुं पलक हरि मुंदी लेत हैं कबहुं अधर फरकावै|
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै||
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरी जसुमति मधुरै गावै|
जो सुख सुर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै||

अर्थ- मैया यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं| कभी तो वह पालने को हल्का सा हिला देती हैंए कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी चूमने लगती हैं| ऐसा करते हुए वह जो मन में आता हैं वही गुनगुनाने भी लगती हैं| लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती हैं| इसीलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं की आरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहींघ् तू शीघ्रता से क्यों नहीं आतीघ् देखए तुझे कान्हा बुलाता हैं| जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी पलकें मूंद लेते हैं और कभी होठों को फडकाते हैं| जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया हैं| तभी कुछ गोपियां वहां आई| गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं| इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुनरू कुनमुनाकर जाग गए| तब उन्हें सुलाने के उद्देश से पुनरू मधुर मधर लोरियां गाने लगीं| अंत में सूरदास नंद पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते है की सचमुच ही यशोदा बडभागिनी हैं क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि.मुनियों को भी दुर्लभ है|

हरष आनंद बढ़ावत हरि अपनैं आंगन कछु गावत|
तनक तनक चरनन सों नाच मन हीं मनहिं रिझावत||
बांह उठाई कारी धौरी गैयनि टेरी बुलावत|
कबहुंक बाबा नंद पुकारत कबहुंक घर आवत||
माखन तनक आपनैं कर लै तनक बदन में नावत|
कबहुं चितै प्रतिबिंब खंभ मैं लोनी लिए खवावत||
दूरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत|
सुर स्याम के बाल चरित नित नितही देखत भावत||

अर्थ- श्रीकृष्ण अपने ही घर के आंगन में जो मन में आता है, वो गाते हैं| वह छोटे.छोटे पैरो से थिरकते हैं तथा मन ही मन स्वयं को रिझाते भी हैं| कभी वह भुजाओं को उठाकर कली श्वेत गायों को बुलाते हैए तो कभी नंद बाबा को पुकारते हैं और घर में आ जाते हैं| अपने हाथों में थोडा सा माखन लेकर कभी अपने ही शरीर पर लगाने लगते हैंए तो कभी खंभे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसे माखन खिलाने लगते हैं| श्रीकृष्ण की इन सभी लीलाओं को माता यशोदा छुप.छुपकर देखती हैं और मन ही मन में प्रसन्न होती हैं| सूरदासजी कहते हैं की इस प्रकार यशोदा श्रीकृष्ण की बाल.लीलाओं को देखकर नित्य हर्षाती हैं|

जो तुम सुनहु जसोदा गोरी|
नंदनंदन मेरे मंदीर में आजू करन गए चोरी||
हों भइ जाइ अचानक ठाढ़ी कह्यो भवन में कोरी|
रहे छपाइ सकुचि रंचक ह्वै भई सहज मति भोरी||
मोहि भयो माखन पछितावो रीती देखि कमोरी|
जब गहि बांह कुलाहल किनी तब गहि चरन निहोरी||
लागे लें नैन जल भरि भरि तब मैं कानि न तोरी|
सूरदास प्रभु देत दिनहिं दिन ऐसियै लरिक सलोरी||

अर्थ- इस पद में भगवान् की बाल लीला का रोचक वर्णन हैं| एक ग्वालिन यशोदा के पास कन्हैया की शिकायत लेकर आयी| वो बोली की हे नंदभामिनी यशोदा! सुनो तोए नंदनंदन कन्हैया आज मेरे घर में चोरी करने गएद| पीछे से मैं भी अपने भवन के निकट ही छुपकर खड़ी हो गई| मैंने अपने शरीर को सिकोड़ लिया और भोलेपन से उन्हें देखती रही| जब मैंने देखा की माखन भरी वह मटकी बिल्कुल ही खाली हो गई हैं तो मुझे बहुत पछतावा हुआ| जब मैंने आगे बढ़कर कन्हैया की बांह पकड़ ली और शोर मचाने लगी, तब कन्हैया मेरे चरणों को पकड़कर मेरी मनुहार करने लगे| इतना ही नहीं उनके नयनोँ में अश्रु भी भर आए| ऐसे में मुझे दया आ गई और मैंने उन्हें छोड़ दिया| सूरदास कहते हैं की इस प्रकार रोज ही विभिन्न लीलाएं कर कन्हैया ने ग्वालिनों को सुख पहुँचाया|

अरु हलधर सों भैया कहन लागे मोहन मैया मैया|
नंद महर सों बाबा अरु हलधर सों भैया||
ऊंचा चढी चढी कहती जशोदा लै लै नाम कन्हैया|
दुरी खेलन जनि जाहू लाला रे ! मारैगी काहू की गैया||
गोपी ग्वाल करत कौतुहल घर घर बजति बधैया|
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कों चरननि की बलि जैया||

अर्थ- सूरदास कहते हैं की अब श्रीकृष्ण मुख से यशोदा को मैयादृमैया, नंदबाबा को बाबादृबाबा व बलराम को भैया कहकर पुकारने लगे हैं| इतना ही नहीं अब वह नटखट भी हो गए हैंए तभी तो यशोदा ऊंची होकर अर्थात कन्हैया जब दूर चले जाते हैं तब उचकदृउचककर कन्हैया को नाम लेकर पुकारती हैं और कहती हैं की लल्ला गाय तुझे मारेंगी| सूरदास कहते हैं की गोपियों व ग्वालों को श्रीकृष्ण की लीलाएं देखकर अचरज होता हैं| श्रीकृष्ण अभी छोटे ही हैं और लीलाएं भी अनोखी हैं| इन लीलाओं को देखकर ही सब लोग बधाइयाँ दे रहे हैं| सूरदासजी कहते हैं की हे प्रभु! आपके इस रूप के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ |

मैं नहीं माखन खायो मैया| मैं नहीं माखन खायो|
ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरै मुख लपटायो||
देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो|
हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो||
मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो|
डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो||
बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो|
सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो||

अर्थ- श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिद्ध| वैसे तो कान्हा ग्वालिनों के घरो में जाकर माखन चुराकर खाया करते थे| लेकिन आज उन्होंने अपने ही घर में माखन चोरी की और यशोदा मैया ने उन्हें देख लिया| सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के वाक्चातुर्य का जिस प्रकार वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता| यशोदा मैया ने देखा कि कान्हा ने माखन खाया हैं तो उन्होंने कान्हा से पूछा की क्योरे कान्हा! तूने माखन खाया है क्याघ् तब बालकृष्ण ने अपना पक्ष किस तरह मैया के सामने प्रस्तुत करते हैंए यही इस दोहे की विशेषता हैं| कन्हैया बोले३ मैया! मैंने माखन नहीं खाया हैं| मुझे तो ऐसा लगता हैं की ग्वालदृबालों ने ही जबरदस्ती मेरे मुख पर माखन लगा दिया है| फिर बोले की मैया तू ही सोचए तूने यह छींका किना ऊंचा लटका रखा हैं मेरे हाथ भी नहीं पहुँच सकते हैं| कन्हैया ने मुख से लिपटा माखन पोंछा और एक कटोरा जिसमें माखन बचा था उसे छिपा लिया| कन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगी और कन्हैया को गले से लगा लिया| सूरदासजी कहते हैं यशोदा मैया को जिस सुख की प्राप्ति हुई वह सुख शिव व ब्रम्हा को भी दुर्लभ हैं| भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया हैं कि भक्ति का प्रभाव कितना महत्वपूर्ण हैं|