सुभाष चन्द्र बोस कोट्स

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नेता जी सुभाष चन्द्र बोस गुलाम भारत देश के स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने मात्र पंद्रह साल की उम्र में ही विवेकानंद साहित्य का अध्ययन कर लिया था। उनका “जय हिन्द” का नारा पूरे भारत देश का राष्ट्रीय नारा बना। 21 अक्टूबर सन. 1943 को उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति होने के माध्यम से स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार की स्थापना की और सन. 1944 को अंग्रेजों पर आज़ाद हिन्द फौज के द्वारा आक्रमण कर कई भारतीय प्रदेशों को आज़ाद भी कराया।

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी सन. 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में एक कुलीन परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम प्रभावती और उनके पिता जानकीनाथ बोस था, जो कटक शहर के मशहूर वकील थे। सुभाष चन्द्र अपने 8 भाई और 6 बहनों में अपने माता-पिता के पाँचवें बेटे थे।

सुभाष चन्द्र बोस के प्रमुख कोट्स:

“भूलो नहीं, अन्याय और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा जुर्म है। याद रखो अनन्त नियम यही है, आपको कुछ प्राप्त करना है तो कुछ देना भी होगा।”
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”
“आजादी दी नहीं जाती, हासिल करनी पड़ती है।”
“इतिहास में कोई भी वास्तविक परिवर्तन विचार-विमर्श से हासिल नहीं हुआ है।”
“राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्शों सत्यम, शिवम्, सुन्दरम से प्रेरित है।”
“भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी शक्ति का संचार किया है, जो लोगों के अन्दर सदियों से निष्क्रिय पड़ी थी।”
“एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है।”
“मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्याएं गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, कुशल उत्पादन एवं वितरण सिर्फ समाजवादी तरीके से ही की जा सकती है।”
“ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं। हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिले, हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए।”
“आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए- मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा, ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके।”
“मुझमें जन्मजात प्रतिभा तो नहीं थी, परन्तु कठोर परिश्रम से बचने की प्रवृति मुझमें कभी नहीं रही।”
“असफलताएं कभी-कभी सफलता की स्तम्भ होती हैं।”
“कष्टों का नि:संदेह एक आंतरिक नैतिक मूल्य होता है।”
“श्रद्धा की कमी ही सारे कष्टों और दु;खों की जड़ है।”
“कर्म के बंधन को तोडना बहुत कठिन कार्य है।”
“हमें केवल कार्य करने का अधिकार है, कर्म ही हमारा कर्तव्य है। कर्म के फल का स्वामी वह (भगवान) है, हम नहीं।”
“स्वामी विवेकानंद का यह कथन बिलकुल सत्य है, यदि तुम्हारे पास लौह शिराएं हैं और कुशाग्र बुद्धि है, तो तुम सारे विश्व को अपने चरणों में झुक सकते हो।”
“हम संघर्षों और उनके समाधानों द्वारा ही आगे बढ़ते हैं।”
“चरित्र निर्माण ही छात्रों का मुख्य कर्तव्य है।”
“निसंदेह बचपन और युवावस्था में, पवित्रता और संयम अति आवश्यक है।”

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