परिचय

श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म 20 सितम्बर, 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के ‘आंवलखेड़ा’ गांव में हुआ। उनके पिता का नाम ‘रूपकिशोर शर्मा’ तथा माता का नाम ‘दंकुनवारी देवी’ था। उनके पिता रूपकिशोर शर्मा जमींदार घराने के थे और दूर-दराज के राजघरानों के राजपुरोहित और भगवत् कथावाचक थे।

Shriram Sharma Biography in Hindi

श्रीराम शर्मा आचार्य का बचपन गांव में ही बीता था। उनका झुकाव बचपन में साधना के प्रति दिखाई देने लगा था। उन्हें काशी में ‘गायत्री मंत्र’ की दीक्षा महामना मदनमोहन मालवीय ने दी थी। सन् 1926 में मात्र 15 वर्ष की आयु में लोगों ने उनके अंदर अवतारी रूप को पहचान लिया था।

विवाह

सन् 1943 में श्रीराम शर्मा आचार्य  का विवाह ‘भगवती देवी शर्मा’ के साथ हुआ था।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन

सन् 1927 से 1933 तक श्रीराम शर्मा आचार्य एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी रहे, जिसमें परिवार के विरोध के बावजूद वे आगरा के शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, वे कई लोगों के साथ भूमिगत होकर कार्य करते रहे और बाद में जेल भी गये।

श्रीराम शर्मा आचार्य ने जेल में रहकर जेल के अनपढ़ लोगों को शिक्षा दी। वे जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय, देवदास गाँधी जैसी महान हस्तियों के साथ आसनसोल (पश्चिम बंगाल) जेल में भी रहे।

श्रीराम शर्मा आचार्य ने वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा, जो महामना मदनमोहन मालवीय ने दिया था कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना। यही मंत्र आगे चलकर ‘गायत्री परिवार’ बनता चला गया, जिसका आधार प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश करना था।

राजनीतिक कार्य

‘गणेशशंकर विद्यार्थी’ के प्रभाव से श्रीराम शर्मा आचार्य राजनीति में प्रवेश करने के बाद धीरे-धीरे महात्मा गांधी के करीबी हो गए। 1942 से पहले के 8-10 वर्षों तक श्रीराम शर्मा आचार्य हर साल 2 मास सेवाग्राम में महात्मा गांधी के पास रहा करते थे। महात्मा गांधी का उन पर अटूट विश्वास था। जे.बी. कृपलानी,  पुरुषोत्तमदास टंडन, पं. गोविंदवल्लभ पंत, डॉ. कैलासनाथ काटजू आदि नेताओं के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे।

श्रीराम शर्मा आचार्य को 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन के समय उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश का कार्यभारी नेता नियुक्त किया गया। इसके पहले मैनपुरी षड्यंत्र केस में उनका योगदान रहा था। वे 1942 के आगरा षड्यंत्र केस के मुख्य अभियुक्त थे।

श्रीराम शर्मा आचार्य जेल से छूटने के बाद महात्मा गांधी के पास गए थे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद वे लेखन कार्य में व्यस्त रहते थे। जीवन के अंतिम 8-10 वर्षों में उन्होंने नेत्रहीन अवस्था में 5 पुस्तकें बोलकर लिखीं। ‘ग्लोकोमा’ के कारण उनकी दोनों आंखों की ज्योति जाती रही थी।

अनमोल विचार

  • अवसर तो सभी को जिन्‍दगी में मिलते हैं, किंतु उनका सही वक्‍त पर सही तरीके से इस्‍तेमाल कुछ ही कर पाते हैं।
  • इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं- एक दु:ख और दूसरा श्रम। दु:ख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता।
  • जब हम ऐसा सोचते हैं कि अपने स्वार्थ की पूर्ती में कोई आंच न आने दी जाय और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें, तो वैसी ही आकांक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे।
  • जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं- एक वे जो सोचते हैं पर करते नहीं, दूसरे जो करते हैं पर सोचते नहीं।
  • विचारों के अन्दर बहुत बड़ी शक्ति होती है। विचार आदमी को गिरा सकतें है और विचार ही आदमी को उठा सकतें है। आदमी कुछ नहीं हैं।
  • लक्ष्य के अनुरूप भाव उदय होता है तथा उसी स्तर का प्रभाव क्रिया में पैदा होता है।
  • लोभी मनुष्य की कामना कभी पूर्ण नहीं होती।
  • मानव के कार्य ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है।
  • अव्यवस्थित मस्तिष्क वाला कोई भी व्यक्ति संसार में सफल नहीं हो सकता।
  • जीवन में सफलता पाने के लिए आत्मा विश्वास उतना ही ज़रूरी है, जितना जीने के लिए भोजन। कोई भी सफलता बिना आत्मा विश्वास के मिलना असंभव है।

निधन

2 जून 1990 को हरिद्वार में श्रीराम शर्मा आचार्य का निधन हो गया।