शिक्षा (Shiksha) : शिक्षा एक ऐसा धन है जिसे कोई भी आपसे नहीं छीन सकता। मनुष्य के विकास में शिक्षा का बड़ा योगदान है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हमें कई प्रकार की शिक्षा मिलती है, जिनके माध्यम से हमारा जीवन चक्र पूरा होता है। अगर सटीक शब्दों में कहें तो स्कूल या विद्यालय-कॉलेज की शिक्षा ही शिक्षा है या फिर जो परिवार में संस्कार मिलते हैं वो शिक्षा है या जो हम समाज से सीखते हैं वो शिक्षा है, शायद नहीं सब मिलकर हमें शिक्षित करते हैं और हमारे सर्वांगीण विकास मे अहम भूमिका निभाते हैं।

शिक्षा की परिभाषा

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के मुताबिक  “शिक्षा व्यक्ति और समाज के सर्वतोन्मुखी विकास की सशक्त प्रक्रिया है।“

भारत के आधुनिक शिक्षा शास्त्रियों की भांति प्राचीन शिक्षा शास्त्रियों ने भी शिक्षा की परिभाषा अनेक प्रकार से दी है।

वैदिक कालीन शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया थी।  जिसके लिए व्यापक दृष्टिकोण से अवधि की सीमा निश्चित नहीं थी। वैदिक काल में शिक्षा आयु के साथ-साथ समानांतर चलती थी। वैदिक कालीन शिक्षा में कक्षा, वर्ग का महत्व नहीं था।  वैदिक कालीन शिक्षा जीवन, राजनीतिक, सामाजिक, संगीत आदि पर आधारित थी। आधुनिक शिक्षा को कक्षा, वर्ग अथवा आयु के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। जिसके कारण शिक्षा के स्तर में कमी आई है।

वैदिक कालीन शिक्षा जीवन पर्यंत चलती रहती थी। जिससे मनुष्य जीवन भर विद्यार्थी का जीवन जीता था।

डॉ ए एस अलतेकर के अनुसार “वैदिक युग से लेकर आज तक भारत में शिक्षा का मूल तात्पर्य यह रहा है कि शिक्षा प्रकाश का वह स्रोत है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा सच्चा पथ प्रदर्शन करती है।“

शिक्षा का आलोक स्रोत: – वैदिक कालीन शिक्षा गुरुकुल में प्राप्त की जाती थी। शिक्षा प्राप्ति से पूर्व विद्यार्थी का उपनयन संस्कार किया जाता था उसके उपरांत गुरु को विद्यार्थी समर्पित हो जाया करता था। गुरु विद्यार्थी के जीवन को संवारने उसमें ज्ञान की ज्योति जलाने के लिए पूरी निष्ठा से प्रयास करते थे।

गुरुकुल में राजनीति, संगीत, युद्ध, संगीत, जीवन दर्शन,समेत कई विषयों की शिक्षा दी जाती है

विद्यार्थी सभी क्षेत्रों में परांगत हो ऐसा गुरु का विशेष ध्येय रहता था। वैदिक काल में शिक्षा का महत्व ज्ञान की प्राप्ति था। वह ज्ञान जो आत्मा और परमात्मा में भेद कर सके। विद्यार्थी के लिए शिक्षा वह शिक्षा हुआ करती थी जिसको पाकर वह मोक्ष की प्राप्ति स्वयं कर सकता था। ” सा विद्या या विमुक्तये”|

शिक्षा सुधार का अभिकरण –

प्राचीन काल में शिक्षा का अर्थ व्यापक रूप में लिया जाता था। शिक्षा आत्मविकास, आत्ममंथन अथवा सुधार की प्रक्रिया थी जो जीवन पर्यंत चलती थी। इसके माध्यम से एक व्यक्ति जीवन भर विद्यार्थी रहता था। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का निरंतर सुधार तथा संस्कार होता रहता था। कहा जाता है कि एक शिक्षक आजीवन छात्र बना रहता है। शिक्षा ज्ञान का वह भंडार है जो मनुष्य को मानव बनाती है और उसे पशु की तरह स्वार्थ परायण होने से रोकती है। इसलिए विद्या विहीन व्यक्ति को पशुतुल्य कहा गया है।

शिक्षा का संकुचित होना 

वैदिक काल में शिक्षा का जिस प्रकार व्यापक रूप से महत्व था उसी प्रकार शिक्षा का संकुचित रूप भी था। वैदिक कालीन शिक्षा का एक संकुचित अर्थ भी था, जिसके अनुसार शिक्षा का तात्पर्य उस शिक्षा से था जो बालक अपने प्रारंभिक जीवन के कुछ वर्षों तक गुरुकुल में रहकर गुरु का सानिध्य पाकर ब्रह्मचर्य जीवन को व्यतीत करता था और अपने गुरु से शिक्षा प्राप्त करता था। इस दौरान वह केवल उच्च शिक्षा को ही प्राप्त करता था जो उसके जीविकोपार्जन के लिए काफी नहीं था। अर्थात शिक्षा संकुचित रूप में प्राप्त करता था।

इस शिक्षा का अर्थ औपचारिक शिक्षा से है जो अधिकांश पुस्तकों के द्वारा प्राप्त होती थी। मनुष्य ज्ञान के विभिन्न अंगों का अध्ययन करने के उपरांत भी अशिक्षित रह जाता था। वास्तविक शिक्षा जीविकोपार्जन की समस्या को हल नहीं करती थी। किंतु शिक्षा केवल जीविकोपार्जन ही नहीं है इस प्रकार शिक्षा प्रकाश अंतर्दृष्टि तथा संस्कृति को प्रदान करते हुए हमें स्वावलंबी तथा आत्मनिर्भर नागरिक बनाती थी।

वैदिक काल से लेकर आधुनिक शिक्षा शास्त्र में मनुष्य को समाज के योग्य बनाने का ही उद्देश्य रहता है। जो निरंतर जारी है।

हम उम्मीद करते हैं कि शिक्षा की परिभाषा को लेकर आपकी जिज्ञासा शांत हुई होगी। यदि आपके मन में कोई और सवाल है या आप किसी और विषय पर जानकारी चाहते हैं तो आप हमें लिख सकते हैं।