यह भारतीय संविधान का एक नियम है । यह नियम आपराधिक कानून  के तहत  आता है । इसकी प्रक्रिया अपराध के बाद कमीशन से शुरू होती है । जब अपराध करने वाले व्यक्ति का पता चल जाता है , या किसी पर संदेह हो तभी कार्यवाही की जा सकती है , सी आर पी सी  धारा 151 के तहत पुलिस अपना काम शुरू कर देती हैं,  परन्तु कार्यवाही का मतलब यह नहीं होता है कि किसी को बिना वजह परेशान किया जाए । अगर पुलिस के पास उस व्यक्ति के खिलाफ उचित कारण और सबूत हो तभी कार्यवाही की जा सकती हैं । इसे भारतीय दंड संहिता को एक निवारणात्मक उपहार के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है । इससे समाज की विधि व्यवस्था को व्यवस्थित बनाया जा सकता है । 

पुलिस की भूमिका – Role of police

दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य और अन्य 1991 AIR 2176 के मामले में कहा गया था कि पुलिस प्रशासन का मुख्य कर्तव्य होता है अपराधियों को पकड़ना , अपराधियों का पता लगाना , और अदालतों में अपराधियों पर मुकदमा चलाना और इन सबके साथ साथ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करना भी पुलिस की जिम्मेदारी होती है ।

कानून पुलिस से उम्मीद करती है कि वह निष्पक्ष होकर अपराधियों के साथ बर्ताव करें । मौजूदा कानून के तहत दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 151 के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है तो यह जरूरी नहीं है कि उस व्यक्ति पर किसी प्रकार का गैर जमानती अपराध या कोई संज्ञेय अपराध बनता हो इसलिए उस व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में तबतक नहीं भेजा जाएगा जबतक पूरी छानबीन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती । 

151 के तहत पुलिस की शक्तियां – Powers of Police Under 151

यदि पुलिस को किसी अपराध के कमीशन को रोकने में गिरफ्तारी महसूस नहीं होती है तो पुलिस इस पर छानबीन कर सकती हैं । क्योंकि दंड संहिता के अंतर्गत किसी अपराध के हो जाने के बाद उचित कदम उठाए जा सकते हैं क्योंकि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए बहुत से प्रावधान मौजूद हैं । 

धारा 151 – Section 151

151 की धारा के (1) के मुताबिक यदि किसी पुलिस  अधिकारी को किसी अपराध का पता हो तो पुलिस अधिकारी को यह अधिकार है कि वह मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट  के बिना अपराधी को गिरफ्तार कर सकता हैं । 

धारा 151 (2) उपधारा (1) के तहत गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के 24 घंटे से ज्यादा गिरफ्तार करके नहीं रखा जा सकता है यदि उसके कोई सबूत ना हो तो । 

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 , यह स्पष्ट करती है कि ऐसी क्या शर्तें हैं जिसमें किसी भी व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट  के आदेश पर बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है । इस धारा के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी तभी की जा सकती है जब पुलिस को उस व्यक्ति के खिलाफ उचित सबूत मिले हो । 

दंड प्रक्रिया संहिता 151 की धारा के तहत यदि  गिरफ्तारी गई हो तो गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन करने के लिए कानून की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है । 

दंड प्रक्रिया संहिता ,  1973 की धारा 151 (2) , और संविधान की धारा 22 (1) के तहत कुछ प्रावधान कायम करती है। इस धारा का कहना है कि 151 धारा (1) के तहत गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है । 

शक्ति का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए – 

दंड प्रक्रिया संहिता धारा  151  के मुताबिक का इस धारा के तहत गिरफ्तार किये गए व्यक्ति की समय अवधि निश्चित होती है प्रावधान में यह निर्देश पहले ही दिए गए हैं  । जोगिंदर कुमार के मामले में और डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 1997 (1) SCC 416 के मामले में यह साफ कहा गया था कि यदि कोई भी धारा 151 के अंतर्गत आने वाली शक्तियों  का उल्लंघन करता है तो प्राधिकारी को उचित दंड दिया जाएगा । 

151 की धारा कब लगती है – 

यदि कोई पांच व्यक्ति या अधिक व्यक्तियों का जनसमूह किसी भी तरह की यदि सार्वजनिक अशांति फैलाते हैं  तो उन लोगों पर यह धारा लागू होगी और उन व्यक्तियों पर उचित कार्यवाही होगी । यदि जनसमूहों के द्वारा पहले से प्रशासन से अनुमति ले ली होगी तो कोई कार्यवाही नहीं होगी । 

यदि कोई भी व्यक्ति किसी सभा में विवाद उत्पन्न करता है तो भी उस व्यक्ति पर उचित कार्यवाही होगी । धारा 151 का उल्लंघन करने पर  उचित सजा –

यदि कोई भी व्यक्ति धारा 151 का उल्लंघन करता है तो उस व्यक्ति को 6 माह का कारावास और अर्थ दंड भी दिया जा सकता है ‌ । 

जमानत – धारा 151 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की यदि गिरफ्तारी हुई हो तो उसकी जमानत न्यायालय में होगी । पर अब नियमों में संशोधन किया गया है अब जमानत थाने में ही हो जाती है ।