तराइन का दूसरा युद्ध | Tarain Ka Dusra Yuddh | Second Battle of Tarain in Hindi

397
तराइन का दूसरा युद्ध
तिथि सन. 1192
स्थान तराइन, हरयाणा, भारत
परिणाम पृथ्वीराज चौहान की पराजय और मुस्लिम शाशन की स्थापना

तराइन का दूसरा युद्ध सन. 1192 में “पृथ्वीराज” और “मोहम्मद गोरी”के बीच लड़ा गया। यह युद्ध हरयाणा में तराइन नामक स्थान पे लड़ा गया। तराइन के इस दुसरे युद्ध में मोहम्मद गोरी ने कन्नौज के राजा जयचंद की सेना के साथ मिलकर पृथ्वीराज से युद्ध किया। इस दुसरे युद्ध का सबसे बड़ा यह दुर्भाग्य था कि जयचंद के आदेश से राजपूत भाई एक दुसरे का खून बहा रहे थे, क्योंकि पृथ्वीराज जयचंद की बेटी से प्रेम करते थे और उन्हें कन्नौज से भगा लाए थे। जिससे क्रोधित होकर जयचंद ने गोरी का साथ देकर युद्ध में चौहान वंश का सर्वनाश करने का निश्चय कर लिया। अत: गोरी इस युद्ध में विजय हुआ और साथ में उसने देशद्रोही जयचंद को भी मारकर कन्नौज को भी अपने कब्जे में कर लिया।

युद्ध

पृथ्वीराज और कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता एक दूजे से बेहद प्रेम करते थे इसलिए पृथ्वीराज जब संयोगिता को कन्नौज से भगा कर ले गए, तब संयोगिता के पिता जयचंद बेहद क्रोदित हो उठे। उन्हें अपना और अपने राज्य की इज्जत का यूं उछलना अन्दर तक कचोट रहा था। वे किसी भी कीमत पर अपने इस अपमान का बदला लेना चाहते थे, इसलिए जब उन्हें पता चला कि मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज से अपनी पिछली हार का बदला लेना चाहता है, तभी जयचंद ने मोहम्मद गोरी का साथ देकर पृथ्वीराज को समाप्त करने का फैसला कर लिया। जयचंद जानते थे कि मोहम्मद गोरी का साथ देना अपने देश के साथ छल करना होगा, परन्तु उनकी बुद्धि पर अपने अपमान का प्रतिशोध लेने का ऐसा पर्दा पड़ा कि वह अपना विवेक ही खो बेठे। उसके उपरांत जयचंद ने अपने दूत के द्वारा मोहम्मद गोरी को सन्देश दिया कि उनके अपमान का बदला लेने के लिए कन्नौज की सेना तुम्हारे साथ होगी। इस सन्देश को पाकर मोहम्मद गोरी बेहद प्रसन्न हुआ, उसने तत्काल पृथ्वीराज से युद्ध करने की तैयारी करने का आदेश दे दिया। जब यह सूचना पृथ्वीराज को मिली की गोरी दोबारा उनसे युद्ध करने की तैयारी कर रहा है, तो उन्होंने अपने मित्र और राज कवी चंदबरदाई द्वारा दुसरे राज्यों से सैन्यबल लेने के लिए अनुरोध किया, परन्तु पृथ्वीराज का संयोगिता को कन्नौज से भगा ले जाने के कारण दुसरे राज्यों ने पृथ्वीराज की सहायता करने से इनकार कर दिया और जयचंद के कहने पर गोरी का युद्ध में साथ देने के लिए तैयार हो गए। सन. 1192 में तराइन की युद्ध भूमि पर दोबारा पृथ्वीराज और गोरी की सेना युद्ध करने के लिए आमने सामने खड़ी हुईं। इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध में पृथ्वीराज का सैन्यबल तीन लाख सैनिकों का था, जिसमें हाथियों पे सवार सैनिकों की टुकड़ी भी शामिल थी और दूसरी तरफ गोरी की सेना में एक लाख बीस हजार सैनिक थे जिसमें शक्तिशाली घुड़सवारों का दस्ता भी शामिल था। राजपूतों ने बड़े ही साहस के साथ आगे बड़कर युद्ध प्रारंभ किया और सभी राजपूत सैनिकों ने अपना रणकौशल दिखाते हुए गोरी की सेना को काटना शुरू कर दिया। इसी बीच गोरी के घुड़सवारों का दस्ता आगे बढ़ा और उन्होंने राजपूतों के हाथियों को घेरकर उनपर निरंतर बाणों से प्रहार किया, जिससे हाथी बुरी तरह घायल हो गए और घबराकर राजपूतों की सेना को ही रोंदने लगे। ऐसी स्थिति के चलते बहुत से राजपूत सैनिक सहीद हो गए। राजपूत युद्ध के नियमों का पालन करते हुए सूर्य अस्त होने के बाद युद्ध नहीं करते थे, परन्तु इस नियम का फायदा उठाते हुए गोरी अपने सैनिकों के साथ पृथ्वीराज की सेना पर रात्री में भी हमला कर रहा था। तराइन के इस दुसरे युद्ध में सबसे दुखद परिस्थिति ये थी कि देशद्रोही राजा जयचंद के कहने पर राजपूत भाई एक दुसरे को युद्ध में काट रहे थे। अंतत: पृथ्वीराज इस युद्ध में गोरी के हाथों परास्त हो गए (युद्ध के पश्चात पृथ्वीराज और उनके मित्र चंदबरदाई के साथ गोरी ने क्या किया, इसको लेकर भारतीय इतिहास में विवाद बना हुआ है। इस सन्दर्भ से जुड़े भारत में बहुत से तथ्य मिलते हैं और किसी भी तथ्य में इस सन्दर्भ की स्पष्ट सूची नहीं मिलती)। युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात गोरी ने देशद्रोही राजा जयचंद को मारकर कन्नौज पर भी अपना शाशन स्थापित कर लिया। उसके उपरांत भारत के सभी राज्यों पर विजय प्राप्त करके गोरी सम्पूर्ण भारतवर्ष का सम्राट बन गया।

देशद्रोही जयचंद का साथ पाकर गोरी तराइन के इस दुसरे युद्ध में विजय हुआ, जिससे पूरे भरतवर्ष में मुस्लिम शाशन का दौर शुरू हो गया।