परिचय

भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, समाज सुधारिका एवं मराठी कवयित्री सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे प्रथम महिला शिक्षिका थीं। 1852 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की।

Savitribai Phule Biography in Hindi

प्रारंभिक जीवन

3 जनवरी 1831 को भारत की महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र में एक किसान परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम ‘खन्दोजी नेवसे’ तथा माता का नाम ‘लक्ष्मीबाई’ था। उनका विवाह सन् 1840 में मात्र 9 वर्ष की आयु में 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। ज्योतिराव फुले महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे।

करियर

वर्ष 1848 में सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले ने सिर्फ 9 विद्यार्थियों को लेकर एक स्कूल की स्थापना की। उन दोनों की अपनी कोई संतान नहीं थी, उन्होंने एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र ‘यशवंतराव’ को गोद ले लिया, जिसका ‘फुले परिवार’ में खूब विरोध हुआ। सावित्रीबाई फुले ने विधवाओं के लिए एक केंद्र की स्थापना कर उनको पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने अछूतों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

विद्यालय की स्थापना

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रधानाचार्य और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य- विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था। वे एक कवियत्री भी थीं, उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।

सामाजिक मुश्किलें

सावित्रीबाई फुले पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब वे कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं, तो रास्ते में लोग उन पर कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। वे एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर साड़ी बदल लेती थीं।

पुरस्कार एवं सम्मान

सावित्रीबाई फुले ने कवयित्री के रूप में 2 काव्य पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘काव्य फुले’ और ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ शामिल हैं। केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने सावित्रीबाई फुले की याद में कई पुरस्कारों की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। वे आधुनिक शिक्षा प्रणाली में पहली महिला अध्यापिका थीं।

निधन

प्लेग फैलने के दौरान सावित्रीबाई फुले ने पुणे में अपने पुत्र के साथ मिलकर एक अस्पताल खोला और अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों का इलाज किया। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई फुले प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग के छूत से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण उनको भी छूत लग गया और इसी वजह से 10 मार्च 1897 में उनका निधन हो गया।