सत्य श्लोक | Satya Shlok in Hindi

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‘सत्य’ शब्द ‘सच’ के लिए एक संस्कृत शब्द के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह भारतीय धर्मों में एक सदगुण है, जो किसी के विचार, भाषण और क्रिया को सच्चाई के रूप में संदर्भित करता है। सत्य से ज्यादा कुछ नहीं है, सब कुछ सत्य पर ही निर्भर है।

कुछ लोकप्रिय ‘सत्य’ के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।

श्लोक 1

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्याऽभ्यासेन रक्ष्यते ।
मृज्यया रक्ष्यते रुपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥

अर्थ- धर्म का रक्षण सत्य से, विद्या का अभ्यास से, रुप का सफाई से और कुल का रक्षण आचरण करने से होता है।

श्लोक 2

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः ।
सत्येन वायवो वान्ति सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥

अर्थ- सत्य से पृथ्वी का धारण होता है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से पवन चलती है। सब सत्य पर आधारित है।

श्लोक 3

सत्यमेव व्रतं यस्य दया दीनेषु सर्वदा ।
कामक्रोधौ वशे यस्य स साधुः – कथ्यते बुधैः ॥

अर्थ- ‘केवल सत्य’ ऐसा जिसका व्रत है, जो सदा दीन की सेवा करता है, ‘काम-क्रोध’ जिसके वश में है, उसी को ज्ञानी लोग ‘साधु’ कहते हैं ।

श्लोक 4

सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाक्रमत् मनुष्यो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परं निधानं ॥

अर्थ- जय सत्य का होता है, असत्य का नहीं। दैवी मार्ग सत्य से फैला हुआ है। जिस मार्ग पर जाने से मनुष्य आत्मकाम बनता है, वही सत्य का परम् धाम है।

श्लोक 5

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
नासत्यं च प्रियं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥

अर्थ- सत्य और प्रिय बोलना चाहिए; पर अप्रिय सत्य नहीं बोलना और प्रिय असत्य भी नहीं बोलना यह सनातन धर्म है।

श्लोक 6

अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात् ।
तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित् ॥

अर्थ- अग्नि से सींचे हुए वृक्ष की वृद्धि नहीं होती, जैसे सत्य के बिना धर्म पुष्ट नहीं होता।

श्लोक 7

सत्यहीना वृथा पूजा सत्यहीनो वृथा जपः ।
सत्यहीनं तपो व्यर्थमूषरे वपनं यथा ॥

अर्थ- उज्जड (बंजर) जमीन में बीज बोना जैसे व्यर्थ है, वैसे बिना सत्य की पूजा, जप और तप भी व्यर्थ है।

श्लोक 8

भूमिः कीर्तिः यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि ।
सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः ॥

अर्थ- भूमि, कीर्ति, यश और लक्ष्मी, सत्य का अनुसरण करने वाले पुरुष की प्रार्थना करते हैं। इसलिए सत्य को ही भजना (भजन करना) चाहिए।

श्लोक 9

तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थलमरिर्मित्रं सुराः किंकराः कान्तारं नगरं गिरि र्गृहमहिर्माल्यं मृगारि र्मृगः ।
पातालं बिलमस्त्र मुत्पलदलं व्यालः श्रृगालो विषं पीयुषं विषमं समं च वचनं सत्याञ्चितं वक्ति यः ॥

अर्थ- जो सत्य वचन बोलता है, उसके लिए अग्नि जल बन जाता है, समंदर जमीन, शत्रु मित्र, देव सेवक, जंगल नगर, पर्वत घर, साँप फूलों की माला, सिंह हिरन, पाताल दर, अस्त्र कमल, शेर लोमडी, जहर अमृत, और विषम सम बन जाते हैं।

श्लोक 10

सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावरस्य नौरिव ।
न पावनतमं किञ्चित् सत्यादभ्यधिकं क्वचित् ॥

अर्थ- समंदर के जहाज की तरह, सत्य स्वर्ग का सोपान है। सत्य से ज्यादा पावनकारी और कुछ नहीं।

श्लोक 11

सत्येन पूयते साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते ।
तस्मात् सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णेषु साक्षिभिः ॥

अर्थ- सत्य वचन से साक्षी पावन बनता है, सत्य से धर्म बढता है। इसलिए सभी वर्णों में, साक्षी को सत्य ही बोलना चाहिए।