यह एक ऐसी धार्मिक प्रथा है, जो भारत में बहुत सालों से चलती आरही है। सती प्रथा के हिसाब से अगर किसी महिला के पति का देहांत हो जाए, तो उसकी पत्नी अपने पति के अंतिम संस्कार के समय उसकी चिता में आत्मत्याग (आत्महत्या) कर लेती है।

1987 में ‘रूप कंवर’ नाम की महिला 18 साल की उम्र में सती हो गई थी। इस घटना के बाद राज्य और केंद्र सरकार ने सती प्रथा को समाप्त करने के लिए कार्य करना आरंभ किया।

इस प्रथा को यह नाम ‘देवी सती’ की वजह से मिला, जिन्हें ‘दक्षायनी’ के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा अपने पति महादेव शिव के तिरस्कार से व्यथित होकर हवन कुण्ड़ (यज्ञ) की अग्नि में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। ‘सती’ शब्द को अक्सर अकेले या फिर ‘सावित्री’ शब्द के साथ जोड़कर किसी “पवित्र महिला” की व्याख्या करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

सती प्रथा का अन्त

ब्रह्म समाज के संस्थापक ‘राजा राममोहन राय’ ने सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया। इसके फलस्वरूप ‘सती प्रथा’ के आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार को ‘सती प्रथा’ रोकने के लिये कानून बनाने पर विवश होना पड़ा था। अन्तत: अंग्रेजी सरकार ने सन् 1829 में ‘सती प्रथा’ को रोकने का कानून पारित किया। इस प्रकार भारत से ‘सती प्रथा’ का अन्त हो गया। मगर आज भी यह कुछ जगहों पर ‘सती प्रथा’ का चलन है।

नुकसान

  • सती प्रथा अपने आप में ही एक अमानवीय काम है।
  • सती प्रथा की वजह से महिलाओं का अपने उपर से आत्मविश्वास कम होता है और समाज में उनका दर्जा कम हो रहा है।

कारण

  • उस जमाने में उँची जाति वाले लोगों को नीची जाति वालों से शादी करने की अनुमति नहीं थी। इसी वजह से यदि कोई उँची जाति वाला व्यक्ति मर जाता था, तो उसकी पत्नी को सती कर (जिन्दा जला) दिया जाता था, ताकि वो किसी नीची जाति वाले व्यक्ति से शादी न कर सके।
  • ‘सती प्रथा’ को महिलाओं द्वारा उनके पति के प्रति प्यार और भक्ति दिखाने के लिए भी किया जाता था।
  • उन जगहों पर जहां विधवा औरतों को गलत माना जाता है, वहां पर विधवा औरत को लोगों से जबरदस्ती ‘सती’ कराया जाता है।

 हल

  • जन संचार के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना चाहिए।
  • लोगों की सोच में बदलाव लाया जाये, ताकि एक विधवा औरत किसी व्यक्ति के साथ शादी कर सके।

सरकार ने पहले से ही ‘सती प्रथा’को रोकने के लिए कानून लागू कर दिया है। भारत में ‘सती प्रथा’ ग़ैर-क़ानूनी है। भारतीय समाज से यह बुराई तेजी से कम हो रही है। हालांकि, ‘सती प्रथा’ को पूरी तरह से रोकने के लिए जागरूकता पैदा की जानी चाहिए।