सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी | Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

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जन्म तिथि 5 सितम्बर सन. 1888
जन्म स्थान तिरुत्तनि, तमिलनाडु, भारत
पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी
माता का नाम सीताम्मा
पत्नी का नाम सिवाकामू
मृत्यु 17 अप्रैल सन. 1975
प्रसिद्धि उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति

परिचय

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक, उत्कृष्ट वक्ता, भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। वे स्वतंत्र भारत देश के सन. 1952 सेसन. 1962 तक उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति रहे। राजनीति में आने से पहले सर्वपल्ली राधाकृष्णन 40 साल तक शिक्षक रहे थे। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने सन. 1954में उन्हें महान दार्शनिक और शैक्षिक उपलब्धियों के लिए “भारत रत्न” से सम्मानित किया था। इनका जन्मदिन भारत में 5 सितम्बर को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

जन्म व बचपन

राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर सन. 1888 को तमिलनाडु में तिरुत्तनि ग्राम के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी था, जो राजस्व विभाग में कार्य करते थे और माता का नाम सीताम्मा था। उनके माता-पिता की छह संतान थी, जिसमें उनके पाँच पुत्र और एक पुत्री थी। राधाकृष्णन का परिवार गरीब था, गरीबी के चलते राधाकृष्ण को अपने बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं हुए। राधाकृष्णन के पूर्वजों के कारण उनके पूरे परिवार को अपने नाम के आगे “सर्वपल्ली” लगाना पड़ा।

शिक्षा

सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचपन से ही एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के लिए उनके पिता ने उन्हें तिरूपति के क्रिश्चियन मिशनरी संस्था “लुथर्न मिशन स्कूल” में भेजा। सन. 1896 से सन. 1900 तक क्रिश्चियन मिशनरी संस्था “लुथर्न मिशन स्कूल” से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उनकी आगे की शिक्षा सन. 1900 से सन. 1904 तक वेल्लूर से हुई। जहाँ उन्हें सन. 1902 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर छात्रवृत्ति प्राप्त हुई और सन. 1904 में उन्होंने कला संकाय की परीक्षा को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। उसके पश्चात उन्होंने मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज “मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज” से शिक्षा प्राप्त की। इस शिक्षा काल में राधाकृष्णन ने बाइबिल (इसाई धर्मग्रन्थ) के महत्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये, जिसके लिए उन्हें स्कूल के द्वारा विशिष्ट योग्यता का सम्मान दिया गया। इससे उनको शास्त्रों के प्रति ज्ञान की जिज्ञासा बढ़ी और इन्होंने वेदों, उपनिषदों, हिंदी और संस्कृत भाषा का अध्यन भी किया। राधाकृष्णन ने दर्शनशास्त्र में एम. ए किया और सन. 1916 में मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक बने । अपने लेखों और भाषणों से विश्व को भारतीय दर्शनशास्त्र से अवगत कराया।

विवाह

सर्वपल्ली राधाकृष्ण का विवाह सन. 1904 में 16 वर्ष की आयु में उनके दूर के रिश्ते की बहन सिवाकामू के साथ करवा दिया था, जिनकी उम्र उस वक्त 10 साल थी। सिवाकामू शिक्षित नहीं थी, फिर भी उनकी तेलुगू पर अच्छी पकड़ थी और अंग्रेजी भी पढ़-लिख सकती थी। सन. 1908 में सर्वपल्ली राधाकृष्ण की पत्नी सिवाकामू ने पुत्री को जन्म दिया। सन. 1908 में ही सर्वपल्ली राधाकृष्ण ने कला स्नातक को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया और दर्शनशास्त्र में विशेषज्ञता प्राप्त की। अपनी उच्च शिक्षा के दौरान अपनी निजी जिन्दगी की आमदनी के लिए वे बच्चों को पढ़ाने का काम भी करते रहे।

प्रारंभिक जीवन

क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते-करते सर्वपल्ली राधाकृष्ण को उच्च गुण प्राप्त हुए, परन्तु ईसाईयों द्वारा हिंदुत्व विचारों की आलोचनाओं के चलते उन्होंनेहिन्दू शास्त्रों का गहन अध्ययन शुरू किया और भारतीय संस्कृति को समझा। ज्ञान प्राप्त करने के बाद उन्होंने समझ लिया कि भारतीय संस्कृति सत्य, धर्म और ज्ञान पर आधारित है, जो मनुष्यों को सच्चा जीवन जीने का सन्देश देती है। उन्होंने ये पूर्णता समझ लिया कि मृत्यु एक अटल सच है। भारतीय संस्कृति सभी धर्मों के मनुष्यों को प्रेम और समानता का भाव सिखाती है और एक दूसरे के धर्मों का आदर करके जीवन जीने की शिक्षा देती है।

सन. 1909 में 21 वर्ष की आयु में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने मद्रास प्रेसिडेंसी काँलेज में दर्शनशास्त्र पढ़ाना आरंभ किया और स्वयं भी दर्शनशास्त्र का अध्ययन करते रहे। इसी दौरान सर्वपल्ली राधाकृष्णन दर्शनशास्त्र पर पुस्तकें भी लिखते रहते थे। सन. 1912 में इन्होंने अपनी पुस्तक “मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व”शीर्षक से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवाई। सन. 1916 वह मद्रास प्रेसिडेंसी काँलेज के सहायक प्राध्यापक बने। मद्रास प्रेसिडेंसी काँलेज में सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उपकुलपति (vice chancellor) बना दिया गया, लेकिन इन्होंने एक वर्ष के बाद इस कालेज को छोड़कर बनारस विश्वविधालय में उपकुलपति (vise chancellor) बन गए। सन. 1918 में मैसूर विश्वविधालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बनाये गये। उसके बाद इनको ऑक्सफोर्ड विश्वविधालय में भारतीय दर्शनशास्त्र का अध्यापक बनाया गया। इस तरह सर्वपल्ली राधाकृष्णन 40 साल तक अध्यापन करते रहे।

जीवन कार्य

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपने ज्ञान और प्रतिभा के कारण ही स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण सभा के सदस्य चुने गए और उन्हीं दिनों वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी बने। अखिल भारतीय कांग्रेसजन डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को संविधान सभा के सदस्य बनाये जाने के पक्ष में थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा करने के लिए विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों को पूरा करें। इस प्रकार इनको नया उत्तराधिकारी चुना गया।

सन. 1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत देश के उपराष्ट्रपति निर्वाचित किये गये। नेहरु के इस चयन से उन्होंने लोगों को हैरान कर दिया कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी ने किसी राजनीतिज्ञ को क्यों नहीं चुना गया। उपराष्ट्रपति के रूप में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पद भी संभाला। 13 मई सन. 1952 से 13 मई सन. 1962 तक भारत देश के उपराष्ट्रपति रहे। भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बाद 13 मई सन. 1962 > में उनको भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित किया गया।

मृत्यु

17 अप्रैल सन. 1975 को डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का स्वर्गवास हुआ था। उनके जन्मदिन को भारत सरकार ने शिक्षक दिवस के रूप में आयोजित किया, जो हर वर्ष मनाया जाता है। इस दिन सभी विद्यालयों में विद्यार्थी शिक्षक की भूमिका को निभाते हैं और जो विद्यार्थी सबसे श्रेष्ठ शिक्षक की भूमिका को निभाता है, उसे अंत में विद्यालय के शिक्षक पुरस्कार देकर सम्मानित करते हैं।

सन. 1931 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अंग्रेजों द्वारा “सर” की उपाधि दी गई। भारत देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिए उन्हें “भारत रत्न” देकर सम्मानित किया था।