मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज व सामाजिक जीवन मनुष्य का स्वभाव है। समाज मनुष्य के साथ-साथ चलता है, मनुष्य से ही समाज है। समाज मनुष्य में ही निहित है उसने समाज को कहीं बाहर से नहीं बुलाया वो उसमें खुद ही समाहित है। 

वर्तमान संस्कृति में मानव का समाज के साथ वही घनिष्ठ संबंध है जोकि शरीर में शरीर के किसी अंग का होता है। रेमण्ट के मुताबिक – एकांकी जीवन कल्पना मात्र है। 

समाज की परिभाषा:

ग्रीन के मुताबिक समाज एक बहुत बड़ा समूह है, जिसका कोई भी व्यक्ति सदस्य हो सकता है। समाज जनसंख्या, संगठन, समय, स्थान, और स्वार्थों से बना होता है।

  1. एडम स्मिथ-  मनुष्य ने पारस्परिक लाभ के निमित्त जो कृत्रिम उपाय किया है वह समाज है।
  2. डॉ0 जेम्स-  मनुष्य के शान्तिपूर्ण सम्बन्धों की अवस्था का नाम समाज है।
  3. प्रो0 गिडिंग्स-  समाज स्वयं एक संघ है, यह एक संगठन है और व्यवहारों का योग है, जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति एक-दूसरे से संबंधित है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज एक उद्देश्य पूर्ण समूह हेाता है, जो किसी एक क्षेत्र में बनता है। उसके सदस्य एकत्व एवं अपनत्व में बंधे होते हैं।

समाज की विशेषताएँ 

समाज के साथ जुड़ी हुई कुछ विशेषताएँ हैं और ये विशेषताएँ ही समाज के अर्थ को स्पष्ट करती है। हालांकि समाजशास्त्रियों में जॉनसन ने समाजशास्त्र के लक्षणों को वृहत् अर्थों में रखा है। 

एक से अधिक सदस्य : कोई भी समाज हो, उसके लिये एक से अधिक सदस्यों की आवश्यकता होती है। अकेला व्यक्ति जीवनयापन नहीं कर सकता है और यदि वह किसी तरह जीवन निर्वाह कर भी ले, तब भी वह समाज नहीं कहा जा सकता। समाज के लिये यह अनिवार्य है कि उसमें दो या अधिक व्यक्ति हों। साधु, सन्यासी, योगी आदि जो कन्दराओं और जंगलों में निवास करते हैं, तपस्या या साधना का जीवन बिताते है, समाज नहीं कहे जा सकते।

वृहद संस्कृति:  समाज में अनगिनत समूह होते हैं, इन समूहों को एथनिक समूह कहते हैं। इन एथनिक समूहों की अपनी एक संस्कृति होती है, एक सामान्य भाषा होती है, खान-पान होता है, जीवन पद्धति होती है, और तिथि त्यौहार होते हैं। इस तरह की बहुत उप-संस्कृतियाँ जब देश के क्षेत्र में मिल जाती है तब वे एक वृहद संस्कृति का निर्माण करती हैं। दूसरे शब्दों में, समाज की संस्कृति अपने आकार-प्रकार में वृहद होती है जिसमें अनगिनत उप-संस्कृतियाँ होती है। उदाहरण के लिये जब हम भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हैं तो इससे हमारा तात्पर्य यह है कि यह संस्कृति वृहद है जिसमें कई  संस्कृतियाँ पायी जाती हैं। एक ओर इस देश में गुजराती, पंजाबी यानी भांगड़ा और डांडिया संस्कृति है वही बंगला संस्कृति भी है। उप-संस्कृतियों में विभिन्नता होते हुए भी कुछ ऐसे मूलभूत तत्व है जो इन संस्कृतियों को जोड़कर भारतीय संस्कृति बनाते हैं। हमारे संविधान ने भी इन उप-संस्कृतियों के विकास को पूरी स्वतंत्रता दी है। जब हम अमरीकी और यूरोपीय समाजों की बात करते हैं तो इन समाजों में भी कई उप-संस्कृतियों से बनी हुई वृहद संस्कृति होती है। अमरीका में कई प्रजातियाँ – काकेशियन, मंगोलियन, नीग्रो, इत्यादि हैं। 

क्षेत्रीयता:  जॉनसन के कथन के अनुसार किसी भी संस्कृति का कोई न कोई उद्गम का क्षेत्र अवश्य होता है। प्रत्येक देश की अन्तरराष्ट्रीय सीमाएँ होती है। इसी को देश की क्षेत्रीयता कहते हैं। इस क्षेत्रीयता की भूमि से ही संस्कृति का जुड़ाव होता है। यदि हम उत्तराखण्ड की संस्कृति की बात करते हैं तो इसका मतलब हुआ कि इस संस्कृति का जुड़ाव हिमाचल या देव भूमि के साथ है। मराठी संस्कृति या इस अर्थ में मलयालम संस्कृति भी अपने देश के भू-भाग से जुड़ी होती है।

सामाजिक संबंधों का दायरा : समाज के सदस्यों के सम्बन्ध विभिन्न प्रकार के होते हैं। समाज जितना जटिल होगा, सम्बन्ध भी उतने ही भिन्न और जटिल होंगे। सम्बन्ध कई तरह के होते हैं:- पति-पत्नी, मालिक-मजदूर, व्यापारी-उपभोक्ता आदि। इन विभिन्न सम्बन्धों में कुछ सम्बन्ध संघर्षात्मक होते हैं और कुछ सहयोगात्मक। समाज का चेहरा हमेशा प्रेम, सहयोग और ममता से दैदीप्यमान नहीं होता, इसके चेहरे पर एक पहलू बदसूरत भी होता है। समाज में संघर्ष, झगड़े, मार-पीट और दंगे भी होते हैं। जिस भांति समाज का उजला पक्ष समाज का लक्षण है, वैसे ही बदसूरत पक्ष भी समाज का ही अंग है। अत: समाज जहाँ मतैक्य का प्रतीक है, वहीं वह संघर्ष का स्वरूप भी है।

श्रम विभाजन : समाज की गतिविधियाँ कभी भी समान नहीं होती। यह इसलिये कि समाज की आवश्यकताएँ भी विविध होती है। कुछ लोग खेतों में काम करते हैं और बहुत थोड़े लोग उद्योगों में जुटे होते हैं। इस शक्ति का बँटवारा कभी भी समान रूप से नहीं हो सकता। शक्ति प्राय: न्यून मात्रा में होती है और इसके पाने के दावेदार बहुत अधिक होते हैं। इसी कारण समाज कहीं का भी हो, उसमें शक्ति बँटवारे की कोई न कोई व्यवस्था जरुर होती है। शक्ति के बँटवारे का यह सिद्धांत ही समाज में गैर-बराबरी पैदा करता है। यह अवश्य है कि किसी समाज में गैर-बराबरी कम होती है और किसी में अधिक। हमारे देश में गरीबी का जो स्वरूप है वह यूरोप या अमेरिका की गरीबी की तुलना में बहुत अधिक वीभत्स है। जब कभी समाज की व्याख्या की जाती है तो इसमें श्रम विभाजन की व्यवस्था एक अनिवार्य बिंदु होता है। 

काम प्रजनन : समाज की वृद्धि और विकास के लिये बराबर नये सदस्यों की भर्ती की आवश्यकता रहती है। ऐसा होना समाज की निरन्तरता के लिये आवश्यक है। यदि समाज की सदस्यता में निरन्तरता नहीं रहती तो लगता है कि समाज का अस्तित्व खतरे में है। सदस्यों की यह भर्ती कई तरीकों से हो सकती है – सामा्रज्य विस्तार, उपनिवेश और आप्रवासन। पर सामान्यतया समाज की सदस्यता की सतता को बनाये रखने का तरीका काम प्रजनन है। इसका मतलब है, समाज के सदस्यों की सन्तान समाज के भावी उत्तरदायित्व को निभाती है।

समाज के प्रमुख तत्व 

समाज के निर्माण के लिए कई तत्वों की आवश्यकता होती है। इन्हें पूरी तरह जानने के बाद ही समाज का अर्थ स्पष्ट होता है—

  1. समाज की आत्मा से मनुष्य का अमूर्त संबंध है। समाज एक प्रकार से भावना का आधार लेकर बनता है। व्यक्ति समाज के अवयव के रूप में है। व्यक्तियों के बीच की विविधता समाज में समन्वय के रूप में परिलक्षित होती है। कोहरे राबर्टस के अनुसार- “तनिक सोचने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि समाज के अभाव में व्यक्ति एक खोखली संज्ञा मात्र है।”  
  2. समाज से हम की भावना प्रकट होती है। इस भावना के अंतर्गत व्यक्तिगत मैं निहित होता है, और यही सामाजिक बंधन को जन्म देता है। पर समाज के सम्पूर्ण बंधन स्वार्थ पूर्ण होते हैं। 
  3. समाज में समूह मन व समूह आत्मा होती है। यह संबंध पारस्परिक चेतना से युक्त होती है। समूह मन में यह चेतना होती है और उनके यह व्यवहार में प्रकट होती है। 
  4. समाज में अपनी सुरक्षा की भावना पायी जाती है। इसके लिये वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये सदैव प्रयत्नशील रहता है, और समाज अपनी निजता को बनाये रखने के लिये नियम कानून रीति रिवाज संस्कृति व सभ्यता को विकसित व निर्मित करता है। 
  5. समाज की आर्थिक स्थिति उसके सदस्यों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है, तो उनसे आर्थिक स्थिति की विविधता पायी जाती है। परन्तु इन सबके बाद भी उनमें एक समाज अधिकार भावना पायी जाती है, कि हम समाज के सदस्य है। 
  6. समाज के जीवन एवं संस्कृति सभ्यता के कारण व्यक्तियों के आचार-विचार व्यवहार मान्यताओं में एकता पायी जाती है। जिसे हम जीवन के सामान्य तरीका के रूप में देख सकते हैं। 
  7. समाज निश्चित उद्देश्यों को रखकर निर्मित होते है, जिन्हें पारस्परिक लाभ, मैत्रीपूर्ण व शाँतिपूर्ण जीवन आदर्शों एवं कार्यों की पूर्ति आदि के रूप में देखा जा सकता है। 
  8. समाज में स्थायित्व की भावना होती है, क्येांकि सभी सदस्य कई पीढ़ियों से उसी समाज के आजीवन सदस्य रहते हैं। इससे समाज बना रहता है। 
  9. समाज कई समूहों के संगठन होते है, जिनमें अन्योन्याश्रितता होती है।

उपरोक्त लेख में समाज के बारे में आपको महत्वपूर्ण जानकारी मिली होगी। यदि आप किसी और विषय पर भी जानकारी चाहते हैं तो हमें लिख सकते हैं।