सलीम अली की जीवनी | Salim Ali Biography in Hindi

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परिचय

सलीम अली एक भारतीय पक्षी रिसर्चर और प्रकृतिवादी थे। वे ‘भारत के बर्डमैन’ के नाम से भी जाने जाते थे। सलीम अली भारत के पहले ऐसे व्यक्ति बने, जिन्होंने पूरे भारत में व्यवस्थित रूप से पक्षी सर्वेक्षण करवाया और उन्होंने पक्षियों पर किताबें भी लिखी, जिन किताबों ने भारत की पक्षी-विज्ञान के विकास में बहुत मदद की है। 1976 में उन्हें भारत सरकार द्वारा  पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

शुरुआती जीवन

सलीम अली का पूरा नाम ‘सालिम मुईनुद्दीन अब्दुल अली’ था। सलीम अली का जन्म 12 नवम्बर 1896 को बॉम्बे में हुआ था। वे सुलेमानी बोहरा मुस्लिम  परिवार से थे। वे अपने परिवार में सबसे छोटे थे। उनके पिता का नाम ‘मोइज़ुद्दीन’ और माता का नाम ‘ज़ीनत-उन-निस्सा’ था। सलीम अली जब एक साल के थे, तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन का देहांत हो गया और जब वे 3 वर्ष के थे, तब उनकी माँ ज़ीनत-उन-निस्सा का भी देहांत हो गया था। माँ-बाप के बिना सलीम अली का बचपन मामा ‘अमिरुद्दीन तैयाबजी’ और बेऔलाद चाची, ‘हमिदा बेगम’ की देख-रेख में मुंबई के खेतवाड़ी नामक इलाके में एक मध्यम वर्ग परिवार में हुआ। उनके एक चाचा का नाम ‘अब्बास तैयाब जी’ था, जो भारत के एक मशहूर स्वतंत्रता सेनानी थे।

‘मुंबई प्राकृतिक इतिहास सोसायटी’ (B.N.H.S) के सचिव  डबल्यू. एस. मिलार्ड के साथ मिलकर और उनकी देख-रेख में सलीम अली ने पक्षियों पर रिसर्च करना शुरू कर दिया।  डबल्यू. एस. मिलार्ड वे व्यक्ति थे, जिन्होंने असामान्य रंग की गौरैया की पहचान की थी। उस गौरैया का शिकार युवा सलीम अली ने खेल-खेल में किया था। इसके बाद ही डबल्यू. एस. मिलार्ड ने सलीम अली को पक्षियों पर रिसर्च करने के लिए प्रोत्साहित किया और  डबल्यू. एस. मिलार्ड ने सलीम को पक्षियों की कुछ किताबें भी दी।

सलीम अली की शुरूआती शिक्षा गिरगौम में स्थापित ‘ज़नाना बाइबिल मेडिकल मिशन गर्ल्स हाई स्कूल’ से प्राप्त की और बाद में उन्होंने मुंबई के सेंट जेविएर में दाखिला लिया। जब वे 13 साल के थे, तब वे सिरदर्द से पीड़ित हो गए, जिसकी वजह से उन्हें कई बार कक्षा से बाहर रहना पड़ता था। उसके बाद सलीम अली अपने एक चाचा के साथ रहने के लिए सिंध चले गए। वापस आने के बाद बड़ी मुश्किल से 1913 में उन्होंने ‘बॉम्बे विश्वविद्यालय’ से 10वीं की परीक्षा पास की थी।

बर्मा और जर्मनी

सलीम अली ने अपनी शुरूआती शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेज से प्राप्त की, जो मुंबई स्थित है। कॉलेज में उनका पहला साल बहुत मुश्किलों से भरा हुआ था और फिर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और तवॉय (बर्मा) आ गए, ताकि वे अपने परिवार के ‘वोलफ्रेम टंग्सटेन माइनिंग’ के काम को दख सके। वह इलाका हर तरफ से जंगल से घिरा हुआ था। इसी वजह से सलीम अली को अपने  प्रकृतिवादी और शिकारी की कला को अच्छा करने का मौका मिला।

सलीम अली ने बर्मा में फोरेस्ट सर्विस के जे. सी. होपवुड और बर्थोल्ड रिबेनट्रोप के साथ अपनी जान-पहचान बढ़ाई। सात साल बाद 1917 में वे भारत वापस लौट आए और तब उन्होंने अपनी औपचारिक पढाई चालू रखने का फैसला लिया। सलीम अली ने ‘डावर कॉमर्स कॉलेज’ में दाखिला लिया और वहाँ उन्होंने वाणिज्यिक कानून और लेखा का अध्ययन शुरू कर दिया।

जब सलीम अली ‘सेंट जेवियर कॉलेज’ में थे तब फादर ‘एथलबेर्ट ब्लेटर’ ने उनकी रूचि को पहचाना था। इसलिए उन्होंने सलीम अली को समझाया कि डावर्स कॉलेज में सुबह की कक्षा के बाद उन्हें सेंट जेवियर्स में प्राणी शास्त्र की कक्षा में भी भाग लेना चाहिए। बॉम्बे में लम्बी छुट्टी के दौरान दिसंबर  1918 में उन्होंने अपने दूर की रिश्तेदार ‘तहमीना’ से शादी कर ली।

सम्मान और पुरस्कार

  • अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने सलीम अली को डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी।
  • भारत सरकार ने भी सलीम अली को सन 1958 में पद्म भूषण व 1976 में पद्म विभूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सम्मानों से नवाजा।

मृत्यु

लम्बे समय से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे 91 वर्षीय सलीम अली का निधन 27 जुलाई 1987 में मुंबई में हुआ।