रवि शंकर की जीवनी | Ravi Shankar Biography in Hindi

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परिचय

रवि शंकर का पूरा नाम ‘पंडित रवीन्द्र शंकर चौधरी’ था। एक सितार वादक के रूप में उन्होंने प्रसिद्धि प्राप्त की। उनके संगीत में एक प्रकार की आध्यात्मिक शान्ति मिलती है। उनका जन्म 7 अप्रॅल, सन् 1920 को हुआ था। उनके पिता का नाम श्याम शंकर चौधरी था, वे एक प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे और राजघराने में उच्च पद पर कार्य करते थे। रवि शंकर जब केवल 10 वर्ष के थे, तभी संगीत के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। एक नर्तक के रूप में रवि शंकर ने कला जगत् में प्रवेश किया। उन्होंने अपने बड़े भाई उदय शंकर के साथ कई नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत किये।

शिक्षा

पं. रवि शंकर की शुरूआती संगीत शिक्षा घर पर हुई। उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन ख़ां से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। वे लंबे समय तक तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ, किशन महाराज और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ान के साथ जुड़े रहे। उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में नृत्य छोड़कर सितार सीखना प्रारंभ किया।

पहली प्रस्तुति

  • उन्होंने पहला कार्यक्रम 10 साल की उम्र में प्रस्तुत किया।
  • उन्होंने भारत में पहला कार्यक्रम 1939 में किया।
  • 1944 में औपचारिक शिक्षा समाप्त करने के बाद वह मुंबई चले गए और उन्होंने फ़िल्मों के लिए संगीत दिया।
  • देश के बाहर उन्होंने पहला कार्यक्रम 1954 में तत्कालीन सोवियत संघ में दिया और यूरोप में पहला कार्यक्रम 1956 में दिया।

निर्देशन

रवि शंकर ने भारत, कनाडा, यूरोप तथा अमेरिका में फ़िल्मों के लिए भी संगीत की रचना की। इन फ़िल्मों में ‘चार्ली’, ‘गांधी’ और ‘अपू त्रिलोगी’ भी शामिल हैं। उन्होंने हिन्दी फ़िल्म ‘अनुराधा’ में भी संगीत दिया। उन्होंने अपने लंबे संगीत जीवन में कई फ़िल्मों के लिए भी संगीत निर्देशन किया जिसमें विख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत राय की फ़िल्में और गुलज़ार द्वारा निर्देशित “मीरा” भी शामिल है।

रवि शंकर ने रिचर्ड एटिनबरा की फ़िल्म ‘गांधी’ में भी संगीत दिया। हिन्दुस्तानी संगीत को रवि शंकर ने रागों के मामले में भी बड़ा समृद्ध बनाया है। शुरूआत में उन्होंने अमेरिका के प्रसिद्ध वायलिन वादक ‘येहुदी मेन्युहिन’ के साथ जुगलबन्दियों में भी दुनिया-भर का दौरा किया। तबला के महान् उस्ताद अल्ला रक्खा भी उनके साथ जुगलबन्दी कर चुके हैं। उन्होंने अपनी लम्बी संगीत-यात्रा में अपने और अपने सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं।

पुरस्कार

  • उन्हें कई विश्वविद्यालयों से डाक्टरेट की 14 मानद उपाधियां मिल चुकी हैं।
  • वे संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत संगीतज्ञों की एक संस्था के सदस्य रहे।
  • उन्हें तीन ग्रेमी पुरस्कार मिले हैं।
  • उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म विभूषण तथा भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्‍न भी मिल चुका है।
  • रवि शंकर को 1968 में उनकी ‘यहूदी मेनुहिन’ के साथ उनकी एल्बम ‘ईस्ट मीट्स वेस्ट’ को पहला ग्रैमी पुरस्कार मिला था। फिर 1972 में ‘जॉर्ज हैरिसन’ के साथ उनके ‘कॉनसर्ट फॉर बांग्लादेश’ को ग्रैमी दिया गया।
  • रवि शंकर 1986 से 1992 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। वे भारत के उन गिने-चुने संगीतज्ञों में से थे, जो पश्चिम देशों में भी लोकप्रिय रहे। उनको देश-विदेश में कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

मृत्यु

रवि शंकर को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद ला जोल्ला के स्किप्स मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 11 दिसंबर 2012 को 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।