लोकोक्तियाँ | Lokoktiyan | Proverb in Hindi

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लोकोक्ति लोक अनुभव पर आधारित उपवाक्य होते हैं। यह श्रोता के हृदय पर गहरा और तीखा प्रभाव डालते हैं। इनका प्रयोग बोलचाल की भाषा में किए जाने के कारण, इन्हें कहावत भी कहा जाता है।

प्रमुख लोकोक्तियाँ: अर्थ और प्रयोग

अर्थ प्रयोग
अन्त भले का भला (अच्छे काम का परिणाम अच्छा होता है) रमेश कष्ट सहकर भी ईमानदारी से परिश्रम करता रहा, इसी कारण आज वह ऊँचे पद पर पहुँच गया है। सच ही कहा है- अन्त भले का भला।
अधजल गगरी छलकत जाए (अयोग्य व्यक्ति अधिक इतराता है) मोहन केवल पाँचवी पास है, अंग्रेजी के दो-चार वाक्य बोलकर दूसरों पर रौब जमाता है। सच ही कहा है- अधजल गगरी छलकत जाए।
अशर्फियाँ लुटें कोयले पर मोहर (बड़े-बड़े खर्चों पर ध्यान न देना, छोटे खर्चों में कंजूसी दिखाना) लालाजी रोज लाॅटरी में 100 रूपये खो आते हैं परन्तु रिक्शा के दो रूपया देने में इनकी नानी मरती है। सच है- अशर्फियाँ लुटें कोयले पर मोहर।
आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास (आवश्यक कार्य छोड़कर अनावश्यक कार्य में उलझ जाना) प्रकृति का भरपूर आनन्द लेने के लिए तुम नैनीताल घूमने आए थे। यहाँ आकर तुम शाॅपिंग करने लग पड़े। आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास।
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता (अकेला आदमी बड़े काम नहीं कर सकता) अकेले हिम्मत सिंह ने गुण्ड़ों का विरोध किया, परन्तु उसका किसी ने साथ नहीं दिया। परिणामस्वरूप गुण्ड़ों का कुछ नहीं बिगड़ा। सच ही तो कहा है- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत (अवसर चूकने के बाद पछताने का कोई लाभ नहीं) जब बीमारी शुरू हुई थी, तब तो तुम जागे नहीं, अब जब रोगी मौत के करीब आ पहुँचा है, तो डाॅक्टर को बुलाने वाले हो। रहने दो, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
आगे कुआँ पीछे खाई (सब ओर विपत्ति का होना) अब क्या करें? इसकी रीढ़ का आॅपरेशन कराएँ तो मौत का डर है, न कराएँ तो उठना मुश्किल। आगे कुआँ पीछे खाई।
आप भला तो जग भला (अच्छे को सभी अच्छे लगते हैं) मुरारीलाल जी, बात यह है कि आप सज्जन हैं, इसलिए आपको उस दुष्ट में दुष्टता नजर नहीं आती। सच ही तो कहा है- आप भला तो जग भला।
ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर (चुनौती स्वीकार करने के बाद कष्टों से नहीं घबराना चाहिए) जब राजनीति में आए हो तो तीखी आलोचनाएँ और गालियाँ सुननी ही पड़ेंगी। ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर।
आम के आम गुठली के दाम (दोहरा लाभ) अंग्रेजी का हिन्दुस्तान टाइम्स बहुत सस्ता अखबार है। पढ़ने में बढ़िया और रद्दी की कीमत भी सबसे ज्यादा। सही है- आम के आम गुठली के दाम।
एक अनार सौ बीमार (वस्तु एक-प्रयोग करने वाले अनेक) मेरे पास निबंध की एक पुस्तक थी, जिसे पाने के लिए सभी बच्चे प्रयास कर रहे थे। यह तो वही बात हुई- एक अनार सौ बीमार।
एक पंथ दो काज (एक कार्य से दो लाभ) साक्षात्कार के लिए चेन्नई तक तो जा ही रहे हो, तिरूपति भी हो आना- इस प्रकार एक पंथ दो काज हो जाएँगे।
एक तंदुरूस्ती हजार नियामत (स्वास्थ्य बहुत बड़ी चीज है) मेरे पास करोड़ों रूपया हुआ तो क्या हुआ! बीमारी के कारण चल-फिर भी नहीं सकता। सच ही कहा है- एक तंदुरूस्ती हजार नियामत।
एक पंथ दो काज (एक काम से दोहरा लाभ) बैंक में पैसे जमा कराने के साथ-साथ मैनेजर महोदय से तुम्हारे रिश्ते की बात भी करता आऊँगा। एक पंथ दो काज हो जाएँगे।
एक तो करेला कड़वा, दूसरे नीम चढ़ा (स्वाभाविक दोषों का किसी अन्य कारण से और अधिक बढ़ जाना) एक तो यह पहले ही जुआरी था, ऊपर से शराब की लत लग गई। इसे कहते हैं- एक तो करेला कड़वा, दूसरे नीम चढ़ा।
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे (अपराधी का निर्दोष पर हावी होना) एक तो कार को गलत दिशा से लाकर मेरे स्कूटर पर टक्कर मारी, फिर मुझी को दोषी बताता है। वाह! उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
ऊँट के मुँह में जीरा (जरूरत से बहुत कम) किसी भी पहलवान के लिए भोजन में दो रोटी ऊँट के मुँह में जीरे के समान ही हैं।
ऊँची दुकान फीके पकवान (दिखावा अधिक वास्तविकता कम) सुना है मथुरा में पेड़े बहुत अच्छे मिलते हैं, लेकिन वहाँ जाकर खाने पर पता चला वे बिल्कुल स्वादिष्ट नहीं हैं। यह तो वही बात हुई- ऊँची दुकान फीके पकवान।
कबहुँ निरामिष होय न कागा (दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता) तुम कहते थे कि रामलाल इस सहायता के बदले कुछ नहीं लेगा। अब दस हजार माँग रहा है। मैंने कहा था- कबहुँ निरामिष होय न कागा। ऐसे दुष्ट कभी कोई काम निस्वार्थ होकर नहीं करते।
कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर (परस्पर सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है) एक समय था, जब उसने मेरी रोजी-रोटी का प्रबन्ध किया था। अब वह अपने बच्चों की नौकरी के लिए मुझे ढूँढ़ रहा है। भाई ऐसा ही है, कभी नाव गाड़ी पर कभी गाड़ी नाव पर।
कंगाली में आटा गीला (मुसीबत में और मुसीबत आना) पहले ही अमित के घर में गरीबी का साम्राज्य था और ऊपर से उसकी नौकरी छूट गई। यह तो कंगाली में आटा गीला होने वाली बात हुई।
कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली (दो असमान व्यक्तियों की तुलना) तुम भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अपने गाँव के सरपंच की तुलना कर रहे हो। इनका क्या मुकाबला! कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।
का बरखा जब कृषि सुखाने (काम बिगड़ने पर सहायता व्यर्थ होती है) अरे, जब कीड़े फसल खा चुके, तब दवाई छिड़कने का क्या लाभ! का बरखा जब कृषि सुखाने।
काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती (बेईमानी बार-बार नहीं चलती) यह दुकानदार रोज कम तोलता था। एक दिन मैंने इसका सामान बाहर से तुलवाया तो पकड़ा गया। अब गिड़गिड़ा रहा है। मैंने कहा था न- काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती।
काला अक्षर भैंस बराबर (बिल्कुल अनपढ़) केला देवी ने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा। उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है।
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है (संगति का प्रभाव अवश्य पड़ता है) काॅलेज में जाते ही मेरा भोला-भाला भाई न जाने क्या अफलातून हो गया है। जब देखो, फिल्म, वीडियो की बातें करते हुए उसका मन नहीं भरता। सच ही है, खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया (परिश्रम अधिक, फल कम) सीमेंट के व्यवसाय में लाखों रूपया लगाया, दिन रात मेहनत की। फिर भी तीन हजार महीना बचा। बस क्या बताऊँ, खोदा पहाड़ निकली चुहिया।
बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद (अयोग्य व्यक्ति ज्ञान की बातें नहीं जानता) जब कवि-सम्मेलन पूरे जोर पर था तो मेरा दोस्त वहाँ से चलने लगा। जब मैंने उससे रूकने को कहा तो वह कहने लगा कि यह तो बेकार का कार्यक्रम है। सच है- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।
नाच न जाने आँगन टेढ़ा (अपनी अयोग्यता को छिपाने के लिए दूसरों पर दोष लगाना) प्रश्न का उत्तर तो आता नहीं, और कहने लगे कि प्रश्न ही गलत है। सच है- नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
गंगा गए तो गंगादास, जमना गए तो जमनादास (परिस्थिति के अनुसार विचार बदलने वाला अस्थिर व्यक्ति) आजकल के नेताओं का कोई सिद्धान्त नहीं है। वे निपट अवसरवादी हैं। गंगा गए तो गंगादास, जमना गए तो जमनादास।
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए (बहुत कंजूस होना) भला यह सेठ मन्दिर के निमार्ण के लिए क्या दान देगा? इसका तो यह हाल है, चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए ।
चोर के पैर नहीं होते (पापी सदा भयभीत रहता है) चोरी के संबंध में पूछताछ करने पर मोहन का मुँह पीला पड़ गया। ठीक कहा गया है- चोर के पैर नहीं होते।
जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई (जिसने दुःख नहीं भोगा, वह दुःखी जनों का कष्ट नहीं समझ सकता) आलीशान कोठियों में रहने वाले सफेदपोश लोग गरीबों के कष्टों को क्या समझें? जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई।
जाको राखे साइयाँ मार सकै ना कोय (जिसका भगवान रक्षक है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता) बच्चा चलती रेलगाड़ी से गिरने के बाद भी बच गया। सच है, जाको राखे साइयाँ मार सकै ना कोय।
जैसी करनी वैसी भरनी (किये का फल भोगना पड़ता है) उसने जीवन भर काले धन्धे किए। अब बेटे ऐसे बदमाश हैं कि उसकी नाक में दम किए रहते हैं। हम तो कहेंगे, जैसी करनी वैसी भरनी।
जैसा देश वैसा भेष (जहाँ रहो, वहाँ के रीति-रिवाजों के अनुसार रहो) अगर गाँव में रहना है तो अपने शहरी नाज-नखरे छोड़ो और यहाँ के रंग में रम जाओ। जैसा देश वैसा भेष।
थोथा चना बाजे घना (ओछा व्यक्ति सदा दिखावा करता है) शर्मा जी दिन भर मेहनत करने की जितनी बातें करते हैं, ये उतने ही निकम्मे हैं। जानते नहीं, थोथा चना बाजे घना।
बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया (रूपया ही सब कुछ है) समाज में आज सबसे ज्यादा कद्र रूपये की है। तभी तो बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया।
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का (अस्थिरता के कारण कहीं का न बन पाना) माँ से बात करता हूँ तो पत्नी ताने देती है। पत्नी के साथ सुखी रहता हूँ तो माँ जल-भुन जाती है। अपनी तो वह हालत है- धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी (विवाद को जड़ से नष्ट कर देना) यदि नौकर के कारण घर में क्लेश है तो इसे ही हटा दो। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
नाँच न जाने आँगन टेढ़ा (स्वयं अयोग्य होना, दोष दूसरों को देना) गीता को कपड़े सीना तो आता नहीं, दोष मशीन को देती है। इसे कहते हैं- नाँच न जाने आँगन टेढ़ा।
नौ दिन चले अढ़ाई कोस (कार्य की बहुत धीमी गति होना) भाई, सरकारी कार्यालयों में काम तो होते-होते ही होता है। यहाँ चुटकी बजाने से कुछ नहीं होता। यहाँ तो वही बात है- नौ दिन चले अढ़ाई कोस।
बेकार से बेगार भली (निकम्मा बैठने से कुछ करना अच्छा है) इस कंपनी का मालिक मजदूरी तो बहुत कम देता है। फिर भी मैंने इसके यहाँ यह सोचकर नौकरी कर ली कि बेकार से बेगार भली।
मन चंगा तो कठौती में गंगा (मन शुद्ध है तो सब ठीक है) संत रविदास न मन्दिर जाते थे, न तीर्थ। उनका दृढ़ विश्वास था कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
मुँह में राम बगल में छुरी (ऊपर से मित्रता, मन में शत्रुता) रामपाल की मीठी-मीठी बातों में न आना। वह कभी भी दुश्मनी का व्यवहार कर सकता है। उसका यही व्यवहार है- मुँह में राम बगल में छुरी।
लातों के भूत बातों से नहीं मानते (दुष्ट व्यक्ति दण्ड से ही भयभीत होते हैं) रमेश, यह चोर अपना अपराध आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। यह आसानी से मानने वाला नहीं है। लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
सिर मुँडाते ही ओले पड़े (काम आरम्भ करते ही विघ्न का पड़ना) श्याम ने कपड़े का व्यापार आरम्भ ही किया था कि अगली रात को चोर अधिकांश कपड़ा चुरा ले गए। बेचारे श्याम पर सिर मुँडाते ही ओले पड़ गए।
हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा (बिना खर्च किए अच्छा काम करना) कुछ ऐसा करो कि बिना कुछ बाजार से मँगाए मेहमान की अच्छी सेवा हो जाए। हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा हो जाए।
हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यक्ता नहीं) इस दवाई का असर देखना है तो इसका प्रयोग करके देख लीजिए। हाथ कंगन को आरसी क्या।
हमारी बिल्ली और हमीं से म्याऊँ (आश्रयदाता पर रौब जमाना) कल मेरी सिफारिश पर नौकरी लगी, आज मुझे ही आँखें दिखाता है। हमारी बिल्ली और हमीं से म्याऊँ।lokoktiyan