प्रार्थना श्लोक | Prarthana Shlok in Hindi

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प्रार्थना किसी भी धर्म के प्रति आस्था और विश्वास का प्रतीक है। प्रार्थना एक अभिवादन है, यह व्यक्ति द्वारा अपने मन के भाव प्रकट करने के लिए की जाती है।

कुछ लोकप्रिय प्रार्थना के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।

श्लोक 1

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ: ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

अर्थ- हे हाथी के जैसे विशालकाय, जिसका तेज सूर्य की सहस्त्र किरणों के समान हैं। बिना विघ्न के मेरा कार्य पूर्ण हो और सदा ही मेरे लिए शुभ हो ऐसी कामना करते हैं।

श्लोक 2

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपद: ।
शत्रुबुध्दिविनाशाय दीपजोतिर्नामोस्तुते ॥

अर्थ- ऐसे देवता को प्रणाम करता हूँ, जो कल्याण करता है, रोग मुक्त रखता है, धन सम्पदा देता हैं, जो विपरीत बुध्दि का नाश करके मुझे सद मार्ग दिखाता हैं, ऐसी दीव्य ज्योति को मेरा परम नम:।

श्लोक 3

आदित्यनमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने दीर्घ आयुर्बलं वीर्य तेजस तेषां च जायत।
अकालमृत्युहरणम सर्वव्याधिविनाशम सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धरायाम्यहम ॥

अर्थ- भगवान सूर्य को नमस्कार, जिस तरह वह बढ़ रहे हैं दिन का आरम्भ हो रहा है, जिसका तेज, शक्ति को दीर्घ आयु प्राप्त है, जिसे मृत्यु पर विजय प्राप्त है, जो सभी की रक्षा करता है, ऐसे सूर्य देवता के चरणों में समस्त तीर्थ का सुख है।

श्लोक 4

सूर्य संवेदना पुष्पे:, दीप्ति कारुण्यगंधने ।
लब्ध्वा शुभम् नववर्षेअस्मिन् कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ॥

अर्थ- जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, पुष्प देता है, संवेदना देता है और हमें दया भाव सिखाता है उसी तरह यह नव वर्ष हमें हर पल ज्ञान दे और हमारा हर दिन, हर पल मंगलमय हो।

श्लोक 5

सरस्वती नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणी ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥

अर्थ-ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को मेरा नमस्कार, वर दायिनी माँ भगवती को मेरा प्रणाम। अपनी विद्या आरम्भ करने से पूर्व आपका नमन करती हूँ, मुझ पर अपनी सिद्धि की कृपा बनाये रखें।

श्लोक 6

या देवी सर्वभूतेशु, शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तसयै, नमस्तसयै, नमस्तसयै नमो नम: ॥

अर्थ- देवी सभी जगह व्याप्त है, जिसमें सम्पूर्ण जगत की शक्ति निहित है। ऐसी माँ भगवती को मेरा प्रणाम, मेरा प्रणाम, मेरा प्रणाम।

श्लोक 7

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्म्बकें गौरी नारायणि नमोस्तुते ॥

अर्थ- जो सभी में श्रेष्ठ है, मंगलमय हैं, जो भगवान शिव की अर्धाग्नी हैं, जो सभी की इच्छाओं को पूरा करती हैं। ऐसी माँ भगवती को नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 8

या देवी स्तुयते नित्यं विबुधैर्वेदपरागै: ।
सा मे वसतु जिह्रारो ब्रह्मरूपा सरस्वती ॥

अर्थ- ज्ञान की देवी माँ सरस्वती जिसकी जिव्हा पर सारे श्लोकों का सार है, जो बुद्धि की देवी कही जाती है और जो ब्रह्म देव की पत्नी है। ऐसी माँ का वास मेरे अन्दर सदैव रहे ऐसी कामना है।

श्लोक 9

नमस्तेस्तु महामायें श्रीपीठे सुरपूजिते ।
शंख्चक्ररादाह्स्ते महालक्ष्मी नमस्तु ते ॥

अर्थ- माँ लक्ष्मी जो शक्ति की देवी है, जो धन की देवी है, जो समस्त देवताओं द्वारा पूजी जाती है, जिनके हाथो में शंख और चक्र है। ऐसी माँ लक्ष्मी को मेरा प्रणाम है।

श्लोक 10

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥

अर्थ- जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पूरे संसार के परे हैं, उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ।

श्लोक 11

या कुंदेंदुतुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ॥

अर्थ- जो विद्या देवी कुंद के पुष्प, शीतल चन्द्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह श्वेत वर्ण की हैं और जिन्होंने श्वेत वर्ण के वस्त्र धारण किये हुए हैं, जिनके हाथ में वीणा शोभायमान है और जो श्वेत कमल पर विराजित हैं तथा ब्रह्मा,विष्णु और महेश, सभी देवता जिनकी नित्य वन्दना करते हैं, वही अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाली माँ भगवती हमारी रक्षा करें।

श्लोक 12

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं ।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धाकारापाहां ॥
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम ।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदां ॥

अर्थ- शुक्ल वर्ण वाली, सम्पूर्ण जगत में व्याप्त, महाशक्ति ब्रह्मस्वरूपीणी, आदिशक्ति परब्रहम के विषय में किये गये विचार एवम चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से मुक्त करने वाली, अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाली, हाथो में वीणा, स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजित बुध्दि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, माँ भगवती शारदा को मैं वंदन करता हूँ।

श्लोक 13

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।
मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥

अर्थ- अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों, और मङ्गलों की करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की में वन्दना करता हूँ।

श्लोक 14

ॐ असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय, मॄत्योर्मा अमॄतं गमय ॥

अर्थ- हे प्रभु! असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता की ओर मेरी गति हो।