प्रमुख श्लोक | Pramukh Shlok in Hindi

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प्रमुख श्लोक में विभिन्न संस्कृत ग्रंथों और पुस्तकों से कुछ लोकप्रिय श्लोकों का संग्रह किया गया है। इनमें से अधिकतर श्लोक जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षाओं से संबंधित हैं। इन श्लोकों को हम अपने जीवन में लागू कर सकते हैं।

संस्कृत के प्रमुख श्लोक निम्नलिखित हैं।

श्लोक 1

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।

अर्थ- मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसमे बसने वाला आलस्य है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र उसका परिश्रम है, जो हमेशा उसके साथ रहता है। इसलिए मनुष्य दुखी नहीं रहता है।

श्लोक 2

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ॥

अर्थ- रथ कभी एक पहिये पर नहीं चल सकता है। उसी प्रकार पुरुषार्थ विहीन व्यक्ति का भाग्य सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 3

जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं , मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति ।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं , सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥

अर्थ- अच्छी संगति जीवन का आधार हैं, अगर अच्छे मित्र साथ हैं, तो मुर्ख भी ज्ञानी बन जाता हैं। झूठ बोलने वाला सच बोलने लगता हैं, अच्छी संगति से मान प्रतिष्ठा बढ़ती हैं, पापी दोषमुक्त हो जाता हैं। मिजाज खुश रहने लगता हैं और यश सभी दिशाओं में फैलता हैं, मनुष्य का कौन सा भला नहीं होता।

श्लोक 4

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थ- तेरा-मेरा करने वाले लोगो की सोच उन्हें बहुत कम देती हैं। उन्हें छोटा बना देती हैं, जबकि जो व्यक्ति सभी का हित सोचते हैं, उदार चरित्र के हैं। पूरा संसार ही उसका परिवार होता हैं।

श्लोक 5

पुस्तकस्था तु या विद्या ,परहस्तगतं च धनम् ।
कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम् ॥

अर्थ- किताबों मे छपा अक्षर ज्ञान एवम दूसरों को दिया धन, ये दोनों मुसीबत में कभी काम नहीं आते।

श्लोक 6

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

अर्थ- महर्षि वेदव्यास ने अपने पुराण में दो बातें कही हैं, जिनमें पहली हैं- “दूसरों का भला करना पुण्य हैं” और दूसरी “दूसरो को अपनी वजह से दु:खी करना ही पाप है।”

श्लोक 7

चन्दनं शीतलं लोके ,चन्दनादपि चन्द्रमाः ।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः ॥

अर्थ- चन्दन को संसार में सबसे शीतल लेप माना गया है, लेकिन कहते हैं ‘चंद्रमा’ उससे भी ज्यादा शीतलता देता हैं, लेकिन इन सबके अलावा अच्छे मित्रों का साथ सबसे अधिक शीतलता एवम शांति देता है।

श्लोक 8

बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः ।
श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः ॥

अर्थ- जो व्यक्ति कर्मठ नहीं है, अपना धर्म नहीं निभाता- वो शक्तिशाली होते हुए भी निर्बल है, धनी होते हुए भी गरीब है और पढ़े-लिखे होते हुए भी अज्ञानी है ।

श्लोक 9

वयसि गते कः कामविकारः,शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः,ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥

अर्थ- आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता।

श्लोक 10

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः,शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥

अर्थ- दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते है। काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है, पर इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है।

श्लोक 11

मा कुरु धनजनयौवनगर्वं,हरति निमेषात्कालः सर्वं।
मायामयमिदमखिलम् हित्वा,ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥

अर्थ- धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है। इस विश्व को माया से घिरा हुआ जानकर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो।

श्लोक 12

सत्संगत्वे निस्संगत्वं,निस्संगत्वे निर्मोहत्वं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं,निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥

अर्थ- सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्लोक 13

विद्या मित्रं प्रवासेषु ,भार्या मित्रं गृहेषु च ।
व्याधितस्यौषधं मित्रं , धर्मो मित्रं मृतस्य च ॥

अर्थ- यात्रा के समय ज्ञान एक मित्र की तरह साथ देता है, घर में पत्नी एक मित्र की तरह साथ देती है, बीमारी के समय दवाएँ साथ निभाती है। अंत समय में धर्म सबसे बड़ा मित्र होता है।

श्लोक 14

क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुघा धेनु सन्तोषो नन्दनं वनम्॥

अर्थ- क्रोध यमराज के समान है और तृष्णा नरक की वैतरणी नदी के समान। विद्या सभी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु है और संतोष स्वर्ग का नंदन वन है।

श्लोक 15

लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च।
लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति॥

अर्थ- लोभ- पाप और सभी संकटों का मूल कारण है, लोभ शत्रुता में वृद्धि करता है, अधिक लोभ करने वाला विनाश को प्राप्त होता है।

श्लोक 16

बालस्तावत् क्रीडासक्त तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्त परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥

अर्थ- बचपन में खेल में रूचि होती है, युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है।

श्लोक 17

अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविन:।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

अर्थ- विनम्र और नित्य अनुभवियों की सेवा करने वालों में चार गुणों का विकास होता है- आयु, विद्या, यश और बल।

श्लोक 18

धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

अर्थ- धर्म के दस लक्षण हैं- धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना।

श्लोक 19

दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।
यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥

अर्थ- यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है।

श्लोक 20

नारिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः।
अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥

अर्थ- सज्जन व्यक्ति नारियल के समान होते हैं, अन्य तो बदरी फल के समान केवल बाहर से ही अच्छे लगते हैं।

श्लोक 21

न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥

अर्थ- कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है, इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है।

श्लोक 22

अतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत्।
शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ॥

अर्थ- अधिक इच्छाएं नहीं करनी चाहिए, पर इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाये हुए धन का धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिये।

श्लोक 23

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

अर्थ- जिस कुल में स्त्रिीयाँ पूजित होती हैं, उस कुल से देवता प्रसन्न होते हैं। जहाँ स्त्रीयों का अपमान होता है, वहाँ सभी ज्ञानदि कर्म निष्फल होते हैं।

श्लोक 24

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति नु यत्रता वर्धते तद्धि सर्वदा॥

अर्थ- जिस कुल में बहू-बेटियां क्लेश भोगती हैं, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है। किन्तु जहाँ उन्हें किसी तरह का दुःख नहीं होता वह कुल सर्वदा बढ़ता ही रहता है।

श्लोक 25

दानं भोगं नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतिया गतिर्भवति ॥

अर्थ- धन की संभव नियति तीन प्रकार की होती है। पहली है उसका दान, दूसरी उसका भोग, और तीसरी है उसका नाश। जो व्यक्ति उसे न किसी को देता है और न ही उसका स्वयं भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति होती है, अर्थात् उसका नाश होना है।

श्लोक 26

लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥

अर्थ- लोभ से क्रोध का भाव उपजता है, लोभ से कामना या इच्छा जागृत होती है, लोभ से ही व्यक्ति मोहित हो जाता है, यानी विवेक खो बैठता है, और वही व्यक्ति के नाश का कारण बनता है। वस्तुतः लोभ समस्त पाप का कारण है।