परोपकार श्लोक

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‘परोपकार’ शब्द दो शब्दों के योग पर+उपकार से बना है, जिसका अर्थ दूसरों की निःस्वार्थ भाव से सेवा करना है। परोपकार ही एकमात्र ऐसा गुण है जो मानव को पशुओं से अलग कर देवता की श्रेणी में खड़ा कर देता हे। अपनी शरण में आए जीवों के दुःखों का निवारण निष्काम भाव से करना ही परोपकार होता है।

कुछ लोकप्रिय परोपकार के संस्कृत श्लोक निम्नलिखित हैं।


श्लोक 1

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थ मिदं शरीरम् ॥

अर्थ- परोपकार के लिए वृक्ष फल देते हैं, परोपकार के लिए ही नदियाँ बहती हैं और परोपकार के लिए गाय दूध देती हैं। अर्थात् यह शरीर भी परोपकार के लिए ही बना है।

श्लोक 2

रविश्चन्द्रो घना वृक्षा नदी गावश्च सज्जनाः ।
एते परोपकाराय युगे दैवेन निर्मिता ॥

अर्थ- सूर्य, चन्द्र, बादल, नदी, गाय और सज्जन, ये प्रत्येक युग में ब्रह्मा ने परोपकार के लिए निर्माण किये हैं।

श्लोक 3

परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

अर्थ- परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है। वे पशु धन्य है, जिनका मरने के बाद भी चमडा उपयोग में आता है ।

श्लोक 4

परोपकृति कैवल्ये तोलयित्वा जनार्दनः ।
गुर्वीमुपकृतिं मत्वा ह्यवतारान् दशाग्रहीत् ॥

अर्थ- विष्णु भगवान ने परोपकार और मोक्षपद दोनों को तोलकर देखा तो उपकार का पल्लु ज्यादा झुका हुआ दिखाई दिया। इसलिए परोपकारार्थ उन्होंने दस अवतार लिये।

श्लोक 5

पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभृतयः ॥

अर्थ- नदियाँ अपना पानी खुद नहीं पीती, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल (खुद ने उगाया हुआ) अनाज खुद नहीं खाते । सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है ।

श्लोक 6

राहिणि नलिनीलक्ष्मी दिवसो निदधाति दिनकराप्रभवाम् ।
अनपेक्षितगुणदोषः परोपकारः सतां व्यसनम् ॥

अर्थ- दिन में जिसे अनुराग है वैसे कमल को, दिन सूर्य से पैदा हुई शोभा देता है। अर्थात् परोपकार करना तो सज्जनों का व्यसन-आदत है, उन्हें गुण-दोष की परवा नहीं होती।

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