पांडुरंग शास्त्री आठवले की जीवनी | Pandurang Shastri Athavale Biography in Hindi

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परिचय

भारत के प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु, समाज सुधारक तथा दार्शनिक पाण्डुरंग शास्त्री अठावले को लोग ‘दादा’ के नाम से भी जानते हैं। उन्होंने आधुनिक भारत के सामाजिक रूपांतरण में उस ज्ञान तथा विवेक का प्रयोग सम्भव बनाया। भारत सरकार ने सन 1999 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से विभूषित किया।

प्रारंभिक जीवन

पांडुरंग शास्त्री आठवले का जन्म 19 अक्टूबर 1920 को मुम्बई के पास रोहा में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘वैजनाथशास्त्री आठवले’, माता का नाम ‘पार्वती आठवले’ तथा पत्नी का नाम ‘निर्मलाताई आठवले’ था। पिता वैजनाथशास्त्री आठवले संस्कृत के अध्यापक थे।

पांडुरंग शास्त्री आठवले ने धार्मिक प्रवृत्तियों से पूर्ण अपने परिवार की परम्परा को आगे बढ़ाया और संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अपनी स्व-प्रेरणा से भगवद्गीता पर आधारित ‘स्वाध्याय आंदोलन’ चलाया था। इसी स्वाध्याय आंदोलन के आधार पर सामाजिक, आर्थिक व्यवस्थाओं का समुचित समाधान करने की युक्ति निकाली थी। उन्होंने स्वाध्याय से अनुभव और परिपक्वता का सम्बन्ध जोड़ते हुए समाज में इसके महत्त्व का प्रचार कर बहुत सी समस्याओं का हल किया।

द्वितीय विश्व धर्म सम्मेलन

पांडुरंग शास्त्री आठवले को सन 1954 में शिम्त्सु जापान में ‘द्वितीय विश्व धर्म सम्मेलन’ में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहाँ इस सम्मेलन में उन्होंने वैदिक ज्ञान तथा जीवन दर्शन के महत्त्व पर भाषण दिया तथा उसे अपनाने की वकालत की। उसी दौरान सभा में मौजूद एक श्रोता ने उनसे पूछा- “क्या आपके देश में कोई एक भी सम्प्रदाय ऐसा है, जो इन आदर्शों तथा जीवन-दर्शन को जीवन व्यवहार में अपनाए हुए है….?”

पांडुरंग शास्त्री आठवले को इस प्रश्न ने परेशान कर दिया। वे चुपचाप वहाँ से लौट आए और भारत आकर भारतीय जीवन की वर्तमान तथा प्रासंगिक स्थिति पर विचार किया।

स्कूल की स्थापना

सन 1956 में पांडुरंग शास्त्री आठवले ने एक स्कूल की स्थापना की, जिसका नाम, ‘तत्व ज्ञान विद्यापीठ’ रखा। उन्होंने इस स्कूल में भारत के आदिकालीन ज्ञान तथा पाश्चात्य ज्ञान, दोनों का सामंजस्य रखा। वे लगातार भ्रमण करते हुए जन संपर्क में जुट गए। डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों, तथा उद्योगपतियों से उन्होंने बात की तथा उन्हें स्वाध्याय के जरिए आत्मा चेतना जगाने का विचार दिया। उन्होंने समाज में यह आदर्श स्थापित करने की कोशिश की, कि लोग अपने व्यस्त जीवन से कुछ समय निकाल कर भगवान का ध्यान कर भक्ति भाव अपनाएँ।

सामाजिक सुधार आंदोलन

पांडुरंग शास्त्री आठवले के आंदोलन में सामाजिक सुधार की बड़ी शक्ति देखने को मिली। कई लोगों ने शराब पीना, जुआ खेलना बंद कर दिया, इससे घर-परिवार में औरतों का सम्मान बढ़ा। अपराधी व्यक्ति समाज की भलाई के कार्यों में भाग लेने लगे। गाँव के लोगों ने बड़े स्तर में वृक्षारोपण किया, इससे बंजर धरती कुछ समय में हरी-भरी हो गई तथा स्वाध्याय व्यवहार से गाँवों में सफाई की चेतना आई।

पुरस्कार ओर सम्मान

  • पांडुरंग शास्त्री आठवले को वर्ष 1988 में ‘महात्मा गाँधी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गयां।
  • पांडुरंग शास्त्री आठवले को सामुदायिक नेतृत्व के लिए 1999 के ‘मैग्सेसे पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।
  • सन 1999 में ही भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।
  • सन 1997 में उन्हें धर्म के क्षेत्र में उन्नति के लिये ‘टेम्पल्टन पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

निधन

पांडुरंग शास्त्री आठवले का निधन 83 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने के कारण 25 अक्टूबर, 2003 को मुम्बई में हुआ।