पद्म विभूषण | Padma Vibhushan

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पद्म विभूषण भारत सरकार के द्वारा दिया जाने वाला दूसरा सबसे बड़ा सम्मान है। यह पुरस्कार देश के लिये किसी नागरिक के बहुमूल्य योगदानों के लिये दिया जाता है। यह सम्मान भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।  इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में ‘भारत रत्न’ के साथ की गई थी। ‘भारत रत्न’ के बाद यह सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है और ‘पद्म विभूषण’ के बाद तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ है। यह पुरस्कार किसी भी भारतीय व्यक्ति को उसकी विशिष्ट और उल्लेखनीय सेवा के लिए दिया जाता है, इसमें सरकारी कर्मचारियों द्वारा की गई सेवाएं भी शामिल हैं। 2017 तक यह पुरस्कार 300 व्यक्तियों को दिया गया, जिनमें से 12 मरणोपरांत और 19 गैर-नागरिक व्यक्ति हैं।

हर साल 1 मई और 15 सितंबर के दौरान, पुरस्कार के लिए सिफारिशें भारत के प्रधानमंत्री द्वारा बनाई गई ‘पद्म पुरस्कार समिति’ को दी जाती हैं। पद्म पुरस्कारों के लिए सिफारिशें सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों की सरकार की तरफ से आती हैं। बाद में समिति आगे की मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रपति को सबकी सिफारिशें प्रस्तुत करती है। गणतंत्र दिवस पर पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं का नाम घोषित किया जाता है। इस पुरस्कार के पहले प्राप्तकर्ता सत्येंद्र नाथ बोस, नंद लाल बोस, जाकिर हुसैन, बालासाहेब गंगाधर खेर, जिग्मे दोर्जी वांगचुक और वी. के. कृष्ण मेनन थे, जिन्हें 1954 में सम्मानित किया गया था। 1954 के कानूनों में मरणोपरांत पुरस्कारों की अनुमति नहीं थी, लेकिन बाद में जनवरी 1955 के कानून में इसे बदल दिया गया।  इस पुरस्कार को अन्य व्यक्तिगत नागरिक सम्मान के साथ जुलाई 1977 से जनवरी 1980 और अगस्त 1992 से दिसंबर 1995 तक दो बार निलंबित कर दिया गया था।

इतिहास

2 जनवरी 1954 को एक प्रेस कोंफ्रेंस बुलाई गई, जिसमें भारत के राष्ट्रपति ने दो नागरिक पुरस्कारों की रचना की घोषणा की थी। पहला भारत रत्न, जो सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है, और दूसरा पद्म विभूषण। 15 जनवरी 1955 को, पद्म विभूषण को तीन अलग-अलग पुरस्कारों में बंटा गया। पहला पुरस्कार पद्म विभूषण जो तीनों में से सबसे ज्यादा मान्यता वाला पुरस्कार है, दूसरा पद्म भूषण और तीसरा पद्मश्री है।

यह पुरस्कार अपने इतिहास में 2 बार निलंबित किया गया है। 1977 में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद पहला निलंबन हुआ। मोरारजी देसाई सरकार ने 13 जुलाई 1977 को सभी व्यक्तिगत नागरिक सम्मान वापस ले लिए थे। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 25 जनवरी 1980 को निलंबन रद्द कर दिया गया था 1992 के मध्य में नागरिक पुरस्कार फिर से निलंबित किए गए, जब भारत के उच्च न्यायालयों में दो पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दायर किए गए

पहला पी.आई.एल (PIL) केरल उच्च न्यायालय में 13 फरवरी 1992 को बालाजी राघवन द्वारा डाली गई और दूसरी पी.आई.एल (PIL) मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर बेंच) में सत्यपाल आनंद द्वारा 24 अगस्त 1992 को डाली गई। 25 अगस्त 1992 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सभी नागरिक पुरस्कारों को कुछ समय के लिए निलंबित करने का नोटिस जारी किया। भारत के सुप्रीम कोर्ट का एक विशेष डिवीजन बेंच बनाया गया, जिसमें पांच न्यायाधीश शामिल थे। 15 दिसंबर 1995 को, विशेष डिवीजन बेंच ने पुरस्कार बहाल किए और एक निर्णय दिया- “भारत रत्न और पद्म पुरस्कार भारत के संविधान के आर्टिकल 18 के तहत नहीं आते।”