पद्म भूषण | Padma Bhushan

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‘पद्म भूषण’ भारत का तीसरा सबसे बड़ा सम्मान है, जो किसी आम नागरिक को दिया जाता है। यह पुरस्कार नागरिकों को उनके बहुमूल्य योगदान के लिए दिया जाता है। आम नागरिकों को मिलने वाले पुरस्कारों में सबसे बड़े कुछ पुरस्कार जैसे- भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्मश्री हैं। पद्म भूषण पुरस्कार किसी को भी उसके कार्यों के लिए दिया जा सकता है, चाहे वे किसी भी लिंग, जाति या समुदाय का हो। इस पुरस्कार को सार्वजनिक क्षेत्र के लोगों को छोड़कर कोई भी ले सकता है, चाहे वह डॉक्टर या फिर वैज्ञानिक हो। साल 2018 तक, पद्म भूषण पुरस्कार 1240 व्यक्तियों को दिया गया है, जिनमें 20 लोगों को उनके देहांत के बाद यह सम्मान प्राप्त हुआ और 94 गैर-नागरिक प्राप्तकर्ता शामिल हैं।

पद्म पुरस्कार समिति हर साल भारत के प्रधानमंत्री द्वारा बनाई जाती है और पुरस्कार के लिए लोगों की सिफारिशें 1 मई से 15 सितंबर के बीच जमा की जाती हैं। सिफारिशें सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश की सरकारों के साथ-साथ भारत सरकार के मंत्रालयों, मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य के गवर्नर, संसद के सदस्यों और अलग-अलग व्यक्तियों से प्राप्त की जाती हैं। बाद में समिति आगे की मंजूरी के लिए सब की सिफारिशों को प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रपति तक पहुंचती है। पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की घोषणा 26 जनवरी यानी भारत गणतंत्र दिवस पर की जाती है।

1954 में स्थापित होने पर, पद्म भूषण पुरस्कार से 23 प्राप्तकर्ताओं को सम्मानित किया गया। आगे चलकर अन्य व्यक्तिगत नागरिक सम्मान के साथ पद्म भूषण को जुलाई 1977 से जनवरी 1980 और अगस्त 1992 से दिसंबर 1995 तक दो बार निलंबित कर दिया गया था। कुछ प्राप्तकर्ताओं ने इसे वापस कर दिया था।

इतिहास

2 जनवरी 1954 को एक प्रेस कोंफ्रेंस बुलाई गई, जिसमें भारत के राष्ट्रपति ने दो नागरिक पुरस्कारों की रचना की घोषणा की थी। पहला भारत रत्न, जो सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है, और दूसरा पद्म विभूषण। 15 जनवरी 1955 को, पद्म विभूषण को तीन अलग-अलग पुरस्कारों में बंटा गया। पहला पुरस्कार पद्म विभूषण, जो तीनों में से सबसे ज्यादा मान्यता वाला पुरस्कार है, दूसरा पद्म भूषण और तीसरा पद्मश्री है।

पद्म भूषण पुरस्कार, बाकी व्यक्तिगत नागरिक सम्मानों के साथ, अपने इतिहास में दो बार निलंबित हो चुका है। पहली बार जब जुलाई 1977 में मोरारजी देसाई ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। वह निलंबन 25 जनवरी 1980 को रद्द कर दिया गया था, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी।1992 के मध्य में नागरिक पुरस्कार फिर से निलंबित किए गए, जब भारत के उच्च न्यायालयों में दो पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL-Public Interest Litigation) दायर किए गए।

पहला पी.आई.एल (PIL) केरल उच्च न्यायालय में 13 फरवरी 1992 को बालाजी राघवन द्वारा डाली गई और दूसरी पी.आई.एल (PIL) मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर बेंच) में सत्यपाल आनंद द्वारा 24 अगस्त 1992 को डाली गई। 25 अगस्त 1992 को, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने सभी नागरिक पुरस्कारों को कुछ समय के लिए निलंबित करने का नोटिस जारी किया। भारत के सुप्रीम कोर्ट का एक विशेष डिवीजन बेंच बनाया गया, जिसमें पांच न्यायाधीश शामिल थे। 15 दिसंबर 1995 को, विशेष डिवीजन बेंच ने पुरस्कार बहाल किए और एक निर्णय दिया- “भारत रत्न और पद्म पुरस्कार भारत के संविधान के आर्टिकल 18 के तहत नहीं आते।”