NRC क्या है?

NRC का पूरा नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (National Register of Citizens) है|

सन 1955 के नागरिकता अधिनियम (citizenship Act) के तहत केंद्र सरकार पर देश में हर परिवार और व्यक्ति की जानकारी जुटाने की ज़िम्मेदारी है| नागरिकता अधिनियम 1955  के section 14A में 2004 में संशोधन किया गया था, जिसके तहत भारत देश के हर नागरिक के लिए अपने आप को National register of citizens यानि NRC में पंजीकृत(register) कराना अनिवार्य  बनाया गया था| 

असम और मेघालय को छोड़ कर पूरे देश के लिए जनसंख्या पंजीकरण(population registration) को 2015 और 2016 में update किया गया था, इसके लिए आंकड़े 2011 के sensors के अनुसार जुटाए गये थे|

NRC का इतिहास

1905 में, जब अंग्रजो ने बंगाल का विभाजन किया था, तो पूरे बंगाल और असम के बीच में नये प्रांत बनाए गये, और उस वक़्त असम को बंगाल के साथ जोड़ा गया था| लेकिन 1947 में, जब भारत का विभाजन हुआ, तो उस वक़्त कुछ लोग भारत से पाकिस्तान गये थे और कुछ लोग पाकिस्तान  से भारत आये थे| उस वक़्त यह डर पैदा होने लगा था कि कही ऐसा ना हो की इन प्रांतों को भारत से अलग करके पूर्वी पाकिस्तान यानि की बांग्लादेश से जोड़ दिया जाये| उस वक़्त गोपीनाथ बोर्डोली (Gopinath Bardoloi) के समय ही एक विद्रोह हुआ, और यह विद्रोह सफल रहा एवं असम अपनी रक्षा कर पाया, 1950 में वह भारत का राज्य बना|

NRC, 1951 की जनगणना के बाद लागू हुआ था, तब तक असम में जो भी लोग रहते थे उन्हें नागरिकता दी गयी और तब तक सब कुछ ठीक था| अब बात करते हैं समस्या  की –

1.अंग्रजो के समय में, बिहार और बंगाल से बहुत सारे लोग असम के चाय के बाग़वानी में मजदूरी करने, खाली पड़ी हुई जमीन में खेती करने आते थे, जिसका वहाँ के स्थानीय लोगो विरोध करते थे| उनका कहना था कि अगर बाहर से इतने लोग आते है, तो हम लोग परेशान होते हैं, क्योंकि जनसंख्या बढती जाती है और जगह छोटी है|

2. आजादी के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान यानि की अभी के बंग्लादेश वहाँ से भी लोग आते जाते रहे| जो लोग किसी कारण वश, भारत आजाद हुआ था तब नहीं आ पाए थे, और बाद में उन्होंने निश्चय किया कि भारत वापस जायेंगे, ऐसे ही सिलसिला  जारी रहा| इससे असम के लोगों की समस्या बढ़ती जा रही थी, और ऐसे में विरोध होता रहा| हालात ज्यादा ख़राब तब हो गए जब पूर्वी पाकिस्तान यानि बंग्लादेश में भाषा के नाम पर विरोध होने लगा और अन्दर ही अंदर संघर्ष होने लगा, हिंसा होने लगी,  और 1971 में, पाकिस्तान की सेना की शक्ति बहुत ही बढ़ गयी तब हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने भारत का रुख किया| माना जाता हैं कि तक़रीबन 10 लाख लोगो ने भारत की शरण ली थी|

3. 16 दिसम्बर 1971 को, जब पूर्वी पाकिस्तान को बंग्लादेश नाम के अलग देश के रूप में घोषित किया गया, उसके बाद वहाँ पर हिंसा थम गयी और सबकुछ नियंत्रण में हो गया| तब उस वक़्त बहुत सारे लोग अपने देश वापस चले गये, लेकिन बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो अपने देश वापस नहीं गये यहाँ पर ही रुक गये| लेकिन अभी भी बात पूरी नहीं हुई, 1971 के बाद भी बंग्लादेश से लोगो का असम में आना चालू रहा|

अब ये जो बदलाव हो रहे थे इसके चलते मामले और बढ़ रहे थे और आंदोलन शुरू हो गया| इन आंदोलनों से 2 बड़े संगठन उभर कर आये, अखिल असम छात्र संघ(All Assam Students’ Union(AASU)) और क्षेत्रीय राजनीतिक साहित्यिक और  सांस्कृतिक संगठनों से मिलकर बनी असमगण संग्राम परिषद ने बहिरागतो के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया|

1978 में, असम के मंगोलोडी लोकसभा क्षेत्र के सांसद का निधन हुआ उसके बाद उप चुनाव की घोषणा की गयी, चुनाव के द्वारा अधिकारियों ने देखा की मतदाताओं की संख्या में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुए हैं ,इस बात से स्थानीय लोग बहुत गुस्सा हुए, और उनका कहना था की ये सारे लोग बाहरी लोग हैं, लेकिन फिर भी सरकार ने सबको मतदाता सूची में शामिल कर लिया ,और इस बात का स्थानीय लोगो ने बहुत ज्यादा विरोध किया| दोनों संगठनों के लोग सड़कों पर उतर गये और फिर से आन्दोलन शुरू हो गया| इस आन्दोलन के नेताओं का दावा था की हमारे राज्य में 31-34 % लोग बाहर के हैं, तो कृपा करके असम की सीमाओं को बंद किया जाये और बाहरी लोगों की पहचान की जाये, और उनको वापिस निकाल दिया जाये| उनकी ये भी मांग थी, जब तक ये सबकुछ सही नहीं हो जाता, तब तक यहाँ पर कोई चुनाव नहीं होगा| उनका ये भी कहना था कि1971 के बाद जो भी लोग आये हैं उन सब को वापिस अपने देश भेज दिया जाये| उसके बाद भी ये आंदोलन चलता रहा, काफी हिंसा भी हुई| 

उसके बाद इस मसले को लेकर, आंदोलनकारियों और सरकार के बीच में बातचीत चलती रही| आखिरकार, उसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1985 को उस वक्त की सरकार यानि राजीव गाँधी  जी की सरकार और आंदोलन के नेताओं के बीच एक समझौता हुआ,  जिसे असम समझौता कहा जाता है| इस समझौते के अनुसार, 1966 से पहले जिस भी धर्म के लोग हो यहाँ पर आये थे, उन सब को भारत की पूर्ण नागरिक का अधिकार दिया जाये| 1966-1971 के बीच में जो भी लोग आये हैं उनको 10 साल बिना मताधिकार भारत देश में रहने की इजाज़त है और 10 साल के बाद उनको भी भारत की पूर्ण नागरिकता दे दी जाएगी, और 1971  के बाद जो भी लोग आये हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों उन्हें अपने देश वापिस जाना होगा|

 1985 में हुए इस असम समझौते की समीक्षा का काम 1999 में तत्कालीन केंद्र सरकार (भाजपा सरकार) ने शुरू किया|

17 नवम्बर 1999, को केंद्र सरकार ने तय किया की NRC अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए लेकिन इसपर कोई ध्यान नहीं दिया और वक़्त बीतता गया| 

सन 2005 में, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने तय किया कि NRC अपडेट तो होना चाहिए और इसकी प्रक्रिया शुरू भी हुई|  गोगोई सरकार ने असम के बारपेटा और चायगाव जैसे कुछ जिलो में पायलट परियोजना के रूप में NRC update शुरू कर दिया था, लेकिन राज्य के कुछ हिस्सों में हिंसा के बाद यह रोक दिया गया|

इसके बाद राज्य की गोगोई सरकार ने मंत्रियों के एक समूह का गठन किया, जिसकी ज़िम्मेदारी थी कि असम के सारे संगठनों से बातचीत करके NRC को update करने में मदद करें, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ और प्रक्रिया ठंडी हो गयी|

बाद में असम पब्लिक वर्क(Assam Public Work) नाम के NGO तथा कई अन्य संगठनों ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में  याचिका दायर की|

2013-2017, अर्थात  4 साल तक असम के नागरिकों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 40  सुनवाइया हुईं, जिसके बाद नवम्बर 2017 में, असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह 31 दिसम्बर 2017 तक NRC को update कर देंगे, लेकिन बाद में इसमें और समय की मांग की गयी| 

2015 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह काम शुरू हुआ, और 2018 जुलाई में, final draft  पेश किया गया| सुप्रीम कोर्ट ने, जिन लोगो का नाम, सूची में नहीं था, उनपर सख्ती बरतने पर फ़िलहाल के लिए रोक लगायी थी|

2019 में भाजपा सरकार ने NRC की प्रक्रिया शुरू भी की और पूरी भी की| NRC की प्रक्रिया पूरी करने के बाद एक लंबी सूची बनी, जिसमे पाया गया कि 19 लाख लोगो ऐसे हैं जो NRC के सूची से बाहर हैं, मतलब 19 लाख लोग ऐसे हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं और दूसरे देश के हैं|

असम के लिए NRC इतना आवश्यक क्यों हैं?

असम में गैर कानूनी तरीके से रह रहे लोगो को रोकने के लिए सरकार ने National Register of Citizens(NRC) अभियान चलाया था| दुनिया के सबसे बड़ी अभियानों में गिना जाने वाला ये प्रोग्राम  Detect, Delete, और Depot के आधार पर है| इसके तहत कोई नागरिक भारत का है या नहीं ये पता लगाया जायेगा और जो भारत का नहीं होगा उनकी पहचान पता क़रके उसको उसके देश में भेज दिया जायेगा\

जुलाई 2018 को NRC का draft प्रकाशित हुआ था, इसमें कुल 3.29 करोड़ में से  2.9 करोड़ लोगो का नाम  शामिल था| जबकि 40 लाख लोगो को छोड़ दिया गया था, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने draft से बाहर रहे 10 प्रतिशत लोगो का दोबारा सत्यापन करने का आदेश दिया था|हालाँकि, कोर्ट ने उन मीडिया रिपोर्ट को मंडली में लिया था जिसमे एक पूर्व सैनिक को भी सूची से बाहर कर दिया गया था|  

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में असम में एक NRC तैयार करने का काम चल रहा था, पहले ये 31 जुलाई 2019 तक published होना था, लेकिन काम पूरा ना हो पाने के कारण इसकी तारीख को बढ़ा कर 31 अगस्त कर दिया गया|

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की 5 महत्वपूर्ण बातें

1.देश में असम इकलौता राज्य है जहाँ नागरिकता रजिस्टर की व्याख्या लागू है| असम में नागरिकता रजिस्टर, देश में लागू नागरिकता कानून से अलग है| यहाँ असम समझौता 1985  से लागू हैं और इस समझौते के मुताबिक 24 मार्च 1971 के आधी रात तक असम  राज्य में आने वाले लोगो को भारतीय नागरिक माना जायेगा|

2.जिस व्यक्ति का नाम NRC में नहीं होता है, उसे अवैध नागरिक माना जाता है| इसे 1951 के sensors के अनुसार तैयार किया गया है, और इसमें यहाँ के हर गाँव के हर घर में रहने वाले लोगो के नाम और संख्या दर्ज की गयी है|

3.NRC की रिपोर्ट से ही पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक(indian citizen) है और कौन नहीं है| साल 1947 में, भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के बाद कुछ लोग असम से पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन उनकी जमीनें असम में थीं, इस चलते आना-जाना बँटवारे के बाद भी जारी रहा| इसके बाद 1951 में NRC के आँकड़े को पहली बार अपडेट किया गया था|

4. इसके बाद भी भारत में घुसपैठ लगातार जारी रही, असम में साल 1971 में बंग्लादेश बनने के बाद भारी संख्या में शरणार्थियों का पहुँचना जारी  रहा| इससे राज्य की आबादी बहुत ज्यादा बढ़ गयी| 80 के दशक में ‘ऑल असम छात्र यूनिट’ एक आंदोलन शुरू किया गया, इस आन्दोलन के 6 साल के संघर्ष के बाद सन 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किये गये थे | इस समझौते में अवैध यानि की illegal immigrants की पहचान के लिए NRC को update करने का प्रावधान था लेकिन किसी न किसी कारण से ये मामला लम्बे समय तक चलता  रहा|

5.इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उसकी देखरेख में 2015 से जनगणना का काम शुरू किया गया| इस साल जनवरी में असम के citizen register में 1.9 करोड़ लोगो के नाम दर्ज किये गये थे,जबकि 3.29 करोड़ लोगो ने आवेदन किया था| आज के समय में NRC सिर्फ असम में लागू है|

NRC में पंजीकृत कराने के लिए वैध दस्तावेज(Documents)

NRC के एक रिपोर्ट में कहा गया कि सिर्फ 10 दस्तावेज़ ऐसे हैं जिन्हें वैध माना जायेगा| जोकि इस प्रकार हैं:

1. जमीन के दस्तावेज़ जैसे की बैनामा या जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज़

2. असम के बाहर से जारी किया गया स्थायी निवास प्रमाण पत्र

3. भारतीय सरकार की ओर से जारी किया गया पासपोर्ट

4.  LIC की बीमा पालिसी जोकि 24  मार्च  1971 तक वैध हो

5. किसी भी शासकीय प्राधिकार(government authority) के द्वारा जारी किया गया लाइसेंस(license) या प्रमाणपत्र(certificate) जैसे मतदाता पहचान पत्र(Voter Id Card)

6.सरकार या सरकारी उपकरण के द्वारा नियुक्ति को प्रमाणित करने वाला दस्तावेज

7. बैंक या डाक घर(post office) में खाता

8. सक्षम प्राधिकारी(authority) के द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र

9. बोर्ड या  किसी भी महाविश्वविद्यालय के द्वारा जारी किया गया कोई भी शैक्षिक प्रमाणपत्र

10. न्यायालय की सुनवाई से जुड़ा कोई भी दस्तावेज

नोटNRC में पंजीकरण कराने के लिए ये 10 दस्तावेज़ ही वैध हैं, इसके अलावा कोई भी दस्तावेज को मान्यता नहीं दिया गया है| NRC अभी सिर्फ असम में लागू है, असम में रहने वाले लोगों को इसमें अपना नाम पंजीकृत कराना होगा और उनको साबित करना होगा कि वे 1971 से पहले से वहाँ रह रहे हैं| इसके लिए उनको 10 दस्तावेज़ में से कोई भी एक दस्तावेज जमा कराना होगा| अगर कोई यह साबित नहीं क़र पाता है, कि वह 1971 के पहले से वहाँ रह रहा है तो उस व्यक्ति को भारतीय नागरिक नहीं माना जायेगा और उनके देश में वापस भेज दिया जायेगा|

पहली बार NRC draft को जुलाई 2018 में प्रकाशित किया गया था, जिसमे 40 लाख लोगो के नाम नहीं थे, मामला इतना बढ़ा की सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया था| तब सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया था कि इन 40 लाख लोगो को सत्यापन का समय दिया जाना चाहिए, जिसके लिए 1 साल का समय दिया गया| 31 जुलाई 2019  को NRC ड्राफ्ट को प्रकाशित किया जाना था, लेकिन 31 जुलाई 2019 तक ये तैयार नहीं हो पाया इसलिए एक महीने की समय और बढ़ा  दी गयी|

NRC में नाम नहीं आने वाले लोगो का भविष्य काफी मुश्किलों भरा हो सकता हैं और उन्हें कोर्ट की एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है|