भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता | Nobel Winners of India

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भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता

भारत में सबसे पहले नोबेल पुरस्कार वर्ष 1913 में गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य (गीतांजली) के लिए मिला था। नोबेल पुरस्कार विजेताओं की सूची नीचे दी गई हैं-

भारत के नोबेल पुरस्कार विजेताओं की सूची-

सं॰ नाम वर्ष कार्यक्षेत्र
01 रबीन्द्रनाथ टैगोर 1913 साहित्य
02 चंद्रशेखर वेंकट रमन 1930 भौतिकी
03 हरगोविन्द खुराना 1968 भौतिकी
04 मदर टेरेसा 1979 शान्ति
05 सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर 1983 भौतिकी
06 अमर्त्य सेन   1998 अर्थशास्त्र
07 वेंकटरामन रामकृष्णन 2009 रसायन शास्त्र
08 कैलाश सत्यार्थी 2014 शान्ति

 

रबीन्द्रनाथ टैगोर

रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ ठाकुर और उनकी माता का नाम शारदा देवी था। 1883 में उनकी शादी मृणालिनी देवी से हुई। रबीन्द्रनाथ टैगोर की माता का निधन उनके बचपन में ही हो गया था। उनके पिता व्यापक रूप से यात्रा करने वाले व्यक्ति थे, इसी वजह से उनका ज्यादातर लालन-पालन नौकरों ने था किया। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रकाशित किया। रबीन्द्रनाथ टैगोर के पिता ने बहुत सारे अच्छे संगीतकारों को अपने घर में रहने और बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत पढ़ने के लिए आमंत्रित किया था।

रबीन्द्रनाथ टैगोर के सबसे बड़े भाई का नाम द्विजेंद्रनाथ टैगोर था जो एक कवि थे, दूसरे भाई का नाम सत्येंद्रनाथ टैगोर था जो यूरोपीय सिविल सेवा के लिए नियुक्त किये गए पहले भारतीय व्यक्ति थे, एक भाई ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर एक  संगीतकार व नाटककार थे और इनकी एक बहिन भी थी जिनका नाम  स्वर्णकुमारी था, वह एक उपन्यासकार थी। ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर की पत्नी का नाम कादंबरी देवी था। वह टैगोर से थोड़ी ही बड़ी थी और उनकी अच्छी मित्र थी, साथ ही शक्तिशाली स्वभाव वाली महिला थी। 1884 में उन्होंने अचानक से आत्महत्या कर ली, इस वजह से रबीन्द्रनाथ टैगोर और उनका परिवार कुछ समय तक काफ़ी समस्याओं में फंसा रहा।

चंद्रशेखर वेंकट रमन

चंद्रशेखर वेंकट रमन (C. V. Raman) भारतीय भौतिक विज्ञानी (वैज्ञानिक) थे। इन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन की खोज की और इस खोज का नाम उनके ही नाम पर “रमन प्रभाव” रखा गया। इस खोज के लिये सन. 1930 में उनको नोबेल पुरस्कार दिया गया। सी. वी. रमन पहले भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में भारत को प्रसिद्धि दिलाई। प्राचीन भारत में विज्ञान की कई उपलब्धियाँ थीं, जैसे- प्रथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के बारे में, शून्य और दशमलव प्रणाली की खोज तथा आयुर्वेद के सूत्र इत्यादि। सी. वी. रमन को नाइट बैचलर पुरस्कारह्यूज पुरस्कारनोबेल पुरस्कारभारत रत्नऔर लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

हरगोविन्द खुराना

हरगोविन्द खुराना एक भारतीय वैज्ञानिक थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला था। हरगोविंद खुराना एक भारतीय अमेरिकी बायोकेमिस्ट थे। 1968 में जब वे ‘विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय’, अमरीका में अनुसन्धान करते थे, तब उन्हें  ‘मार्शल डब्ल्यू निरेनबर्ग’ और ‘रॉबर्ट डब्ल्यू होली’ के साथ फिजियोलॉजी और मेडिसिन के लिए नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया, हरगोविन्द खुराना ने ही ‘न्यूक्लिक एसिड’ में ‘न्यूक्लियोटाइड’ (Nucleotide) का क्रम खोजा, जिसमें सेल के जेनेटिक कोड होते हैं।

हरगोविन्द खुराना ब्रिटिश भारत में पैदा हुए थे। हरगोविंद खुराना ने उत्तरी अमेरिका में कुल 3 विश्वविद्यालयों में कार्य किया था। उन्होंने 1966 में संयुक्त राज्य अमेरिका की  नागरिकता हासिल की थी और 1987  में उन्हें विज्ञान का ‘राष्ट्रीय पदक’ भी मिला था।

मदर टेरेसा

मदर टेरेसा को रोमन कैथोलिक चर्च द्वारा कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से नवाज़ा गया। मदर टेरेसा ने अपने जीवन में लोगों के लिए कई काम किए। मदर टेरेसा ने 1950 में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की स्थापना  कोलकाता में की थी। 45 सालों तक मदर टेरेसा ने गरीब, बीमारों और अनाथ लोगों की मदद की।

1970 तक मदर टेरेसा अपने कार्यों के लिए लोगों के बीच बहुत प्रसिद्द हो गईं थीं। ‘माल्कोम मुगेरिज’ की कई डाक्यूमेंट्रियों और पुस्तकों जैसे ‘समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गॉड’ में इसका उल्लेख किया गया है। मदर टेरेसा को कई पुरस्कार भी मिले हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

  • 1979 में उन्हें शांति के लिए ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला था।
  • 1980 में उन्हें ‘ भारत रत्न’ दिया गया।

मदर टेरेसा का अपने पूरे जीवन भर ‘मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी’ का कार्य चलता रहा और मृत्यु तक वे 123 देशों में 610 मिशन नियंत्रित कर रही थीं।

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर

19 अक्टूबर 1910 को लाहौर (पाकिस्तान) में डॉ. सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर का जन्म हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर जब 18 वर्ष के थे तब उनका पहला शोध पत्र `इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स’ में छपा था। सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर की प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास से ग्रेजुएशन पूरी होने तक उनके कई  शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे। उन सभी शोध पत्रों में से एक शोध पत्र `प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ था, जो इनके लिए काफी सम्मान की बात थी, क्योंकि इतनी कम उम्र में ही इनका शोध पत्र ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ था।

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर के मन में तारे (Star) के गिरने और लुप्त होने के प्रति कुछ जिज्ञासाएँ थी, जो इन्होंने केवल 24 वर्ष की छोटी सी उम्र में सुलझा ली थीं। 11 जनवरी 1935 को लंदन में ‘रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ की एक बैठक थी, वहां पर उन्होंने अपना मौलिक शोध पत्र भी प्रस्तुत कर दिया था उस शोध में यह बताया गया कि कोई ‘व्हाइट ड्वार्फ’ तारे अपने एक निश्चित मास पाने के बाद अपने भार को और वृद्धि नहीं कर सकते, अंतत वे ‘ब्लैक होल’ बन जाते हैं।

अमर्त्य सेन

अमर्त्य सेन एक ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जिन्हें सन 1998 में अर्थशास्त्र नोबल पुरस्कार दिया गया था। वे ‘हार्वड विश्वविद्यालय’ जो अमरीका स्थित है, उसमें प्राध्यापक हैं। अमर्त्य सेन जादवपुर विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकानामिक्स और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी पढ़ा चुके हैं। उन्होंने एम.आई. टी, स्टैनफोर्ड, बर्कली और कॉरनेल विश्वविद्यालयों जैसे विश्वविद्यालयों में अतिथि अध्यापक के रूप में भी पढ़ाया है।

वेंकटरामन रामकृष्णन

वेंकटरामन रामकृष्णन जीवों के वैज्ञानिक हैं। 2009 में इन्हें रसायन विज्ञान का ‘नोबेल पुरस्कार’ दिया गया था। वेंकटरामन रामकृष्णन को यह पुरस्कार, कोशिका के अंदर प्रोटीन का निर्माण करने वाले ‘राइबोसोम’ की बनावट और उसके काम करने के तरीके के गहरे अध्ययन के लिए दिया गया।

वेंकटरामन रामकृष्णन की इस खोज के कारण प्रति-जैविकों (Antibiotics) को और विकसित करने में बहुत मदद मिलेगी। वेंकटरामन रामकृष्णन को यह सम्मान इजराइली महिला वैज्ञानिक ‘अदा योनोथ’ और अमरीका के ‘थॉमस स्टीज़’ के साथ संयुक्त रूप से मिला था। इन तीनों वैज्ञानिकों ने त्रि-आयामी (3-dimensional) चित्रों के ज़रिए दुनिया को समझाया कि किस तरह ‘राइबोसोम’ अलग-अलग रसायनों के साथ अलग-अलग प्रतिक्रिया करते हैं।

वेंकटरामन रामकृष्णन को इस काम के लिए ‘राइबोसोम्ज़’ की हज़ारों गुना बड़ी छवि की जरुरत थी, इसलिए वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफ़ी (X Ray Crystallography) का सहारा लिया। वर्तमान समय में श्री वेंकटरामन् रामकृष्णन् ब्रिटेन के मशहूर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े हैं एवं विश्वविद्यालय की ‘एमआरसी लेबोरेट्रीज़ ऑफ़ म्यलूकुलर बायोलोजी’ के स्ट्रक्चरल स्टडीज (संरचनात्मक अध्ययन) विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक हैं।

वेंकटरामन रामकृष्णन भारत के 7वें और तमिल मूल के तीसरे व्यक्ति हैं, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

कैलाश सत्यार्थी

कैलाश सत्यार्थी एक भारतीय हैं, जो बच्चों के अधिकारों के लिए काम करते हैं। कैलाश सत्यार्थी बाल-श्रम के खिलाफ आन्दोलन भी कर चुके हैं। इन्होंने ही ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ की शुरुआत 1980 में की थी, जिसके बाद से वे दुनिया के 144 देशों के 83 हजार बच्चों के अधिकारों को बचाने के लिए काम कर चुके हैं। कैलाश सत्यार्थी के द्वारा किये गए कार्यों की वजह से ही 1999 में ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ’ ने बाल श्रम की निकृष्टतम श्रेणियों पर संधि नंबर 182 को अपनाया, जिसे अब दुनियाभर की सरकारें मार्गदर्शक के तौर पर देखती हैं।

कैलाश सत्यार्थी को उनके कार्यों के लिए कई  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान व पुरस्कार भी मिले हैं। इन्हें मिले कई पुरुस्कारों में ‘नोबेल शान्ति पुरस्कार’ भी शामिल है, जो इन्हें 2014 में पाकिस्तान की एक कार्यकर्ता  मलाला युसुफ़ज़ई  के साथ सम्मिलित रूप में मिला था।