नानाजी देशमुख की जीवनी | Nanaji Deshmukh Biography in Hindi

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परिचय

नानाजी देशमुख को लोग ‘चंडिकादास अमृतराव देशमुख’ के नाम से भी जानते हैं। वे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के मज़बूत स्तंभ थे। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण लोगों के बीच स्वावलंबन के कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाता है। नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने 60 साल की उम्र के बाद राजनीति से सन्न्यास लिया। नानाजी देशमुख को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

शुरूआती जीवन

नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्टूबर, 1916 ई. को महाराष्ट्र राज्य के परभनी ज़िले में एक छोटे से गाँव ‘कदोली’ में हुआ। उनके पिता का नाम ‘अमृतराव देशमुख’ तथा माता का नाम ‘राजाबाई अमृतराव देशमुख’ था। नानाजी देशमुख का अधिकतर समय संघर्षों में ही बीता। छोटी उम्र में उनके माता-पिता का देहान्त हो गया, जिसके चलते उनके मामा ने उनका पालन-पोषण किया।

शिक्षा

अपनी स्कूल की शिक्षा के दौरान नानाजी देशमुख के पास किताबें आदि ख़रीदने के लिए पैसे नहीं होते थे, लेकिन उनके अन्दर शिक्षा प्राप्त करने की अभिलाषा थी। अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने सब्ज़ी बेचकर पैसे कमाए। उन्होंने ‘बिरला इंस्टीट्यूट’, पिलानी से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।

राजनीतिक जीवन

नानाजी देशमुख ‘लोकमान्य तिलक’ के विचारों से बहुत प्रभावित थे। ‘डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार’ (संघ संस्थापक) ने ही उन्हें संघ से जोड़ा था। नानाजी देशमुख के विलक्षण संगठन कौशल ने 1950 से 1977 तक भारतीय राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी। उत्तर प्रदेश में संघ प्रचारक के रूप में उन्हें पहले आगरा और फिर गोरखपुर भेजा गया।

उन दिनों संघ की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। नानाजी देशमुख एक धर्मशाला में रहते थे। उनके परिश्रम से 3 साल में गोरखपुर के आस-पास लगभग 250 शाखाएँ खोली गयीं। उन्होंने गोरखपुर में 1950 में पहला ‘सरस्वती शिशु मन्दिर’ नामक स्कूल स्थापित किया। आज सरस्वती शिशु मन्दिरों की संख्या देश में लगभग 50 हजार से भी ज्यादा है।

प्रबन्धक का पद

‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की स्थापना 1947 में रक्षा बन्धन के अवसर पर लखनऊ में हुई, इसके प्रबन्धक नानाजी देशमुख बनाये गए। वहाँ से मासिक ‘राष्ट्रधर्म’, ‘साप्ताहिक पांचजन्य’ तथा ‘दैनिक स्वदेश’ अख़बार निकाले गये। 1952 में जनसंघ की स्थापना होने पर उत्तर प्रदेश में उसका कार्य नानाजी देशमुख को सौंपा गया।

महामन्त्री के रूप में

नानाजी देशमुख आपातकाल के विरुद्ध बनी ‘लोक संघर्ष समिति’ के मन्त्री थे। उस काल में हुए देशव्यापी सत्याग्रह में एक लाख से भी अधिक व्यक्तियों ने गिरफ़्तारी दी थी। इन्दिरा गांधी 1977 के चुनाव में हार गयीं और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार बनी।

नानाजी देशमुख उस समय सत्ता या दल में बड़े से बड़ा पद ले सकते थे; लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़कर ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ के माध्यम से गोंडा और चित्रकूट में ग्राम विकास का कार्य शुरू किया।

संन्यास राजनीति से

60 साल की उम्र पूरी होते ही नानाजी देशमुख ने राजनीति से संन्यास ले लिया था। राजनीति में वे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे भाजपा (BJP) के नेताओं से वरिष्ठ थे और भाजपा के गठन के काफ़ी पहले राजनीति छोड़ चुके थे।

अपने जीवनकाल में नानाजी देशमुख ने सामाजिक संगठनों जैसे- ‘दीनदयाल शोध संस्थान’, ‘ग्रामोदय विश्वविद्यालय’ और ‘बाल जगत’ की स्थापना की। उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में भी उन्होंने अभूतपूर्व सामाजिक कार्य किया। 1999 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। उन्हें इसी साल राज्यसभा के लिए भी नामांकित किया गया। लोकसभा के लिये वे बलरामपुर से चुने गये थे।

निधन एवं देह दान

27 फ़रवरी, 2010 को नानाजी देशमुख का चित्रकूट में निधन हो गया । देह दान का संकल्प पत्र उन्होंने बहुत पहले भर दिया था, इसलिए निधन के बाद उनका शरीर आयुर्विज्ञान संस्थान को दान दे दिया गया।

प्रेरणा स्रोत

नानाजी देशमुख ने दिल्ली की ‘दधीचि देहदान समिति’ को अपने देहदान सम्बन्धी शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए कहा था- “मैंने जीवन भर संघ शाखा में प्रार्थना में बोला है ‘पत्तवेष कायो नमस्ते नमस्ते।’ अतः मृत्यु के बाद भी यह शरीर समाज के लिए उपयोग में आना उचित है।“