मूर्ख बगुला और नेवला | Murkh Bagula aur Nevla in Hindi

1914

एक जंगल में बरगद के पेड़ के नीचे बहुत से बगुले रहते थे। उसी पेड़ की जड़ में एक साँप भी रहता था। साँप बगुलों के छोटे-छोटो बच्चों को खा जाता था। साँप के द्वारा बार-बार बच्चों के खाये जाने पर बगुला बहुत ही उदास होकर नदी के किनारे आ बैठा और उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे। बगुले को दु:खी देखते हुए एक केकड़े ने पानी से बाहर निकलकर उसे कहा- “बगुला मामा क्या बात है? आज क्यों रो रहे हो।”

बगुले ने कहा- “भैया बात यह है कि साँप मेरे छोटे-छोटे बच्चों को बार-बार खा जाता है। तुम्हीं कोई उपाय बताओ, किस प्रकार साँप से बदला किया जाये।” केकड़े मन ही मन सोचने लगा, यह बगुला मेरा भी जन्म वैरी है। इसे ऐसा उपाय बताऊंगा जिससे साँप के नाश के साथ-साथ इसका भी नाश हो जाये।

यह सोचकर केकड़ा बोला- “मामा एक काम करो, मांस के कुछ टुकड़े लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो। इसके बाद छोटे-छोटे टुकड़े नेवले के बिल से लेकर साँप के बिल तक बिखेर दो। नेवला उन टुकड़ों को खाता-खाता साँप के बिल तक आ जायेगा और वहाँ साँप को देखकर उसे मार डालेगा।” बगुले ने ऐसा ही किया। नेवले ने साँप को तो खा लिया, लेकिन पेड़ पर रहने वाले बगुलों को भी खा लिया। बगुले ने उपाय तो सोचा, किन्तु उसके अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे। अपनी मुर्खता का फल उसे मिल गया।