मंगल पाण्डेय

0
130
जन्म तिथि 19 जुलाई सन. 1827
जन्म स्थान नगवा, उत्तर प्रदेश, भारत
पिता का नाम दिवाकर पाण्डेय
माता का नाम अभय रानी
मृत्यु 8 अप्रैल सन. 1857
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी

परिचय

भारत के प्रथम क्रांतिकारी मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई सन. 1827 को हुआ था। मंगल पाण्डेय को भारत के सर्वप्रथम स्वतंत्र्ता सेनानी के नाम से भी जाना जाता है। इनके द्वारा शुरू किया गया विद्रोह सम्पूर्ण भारत में आग की तरह फैल गया, जिसमें लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस आग को अंग्रेजों ने बुझाने की पूरी कोशिश की, जिसमें अंग्रेजों को कामयाब नहीं मिली। यह आग देश के प्रत्येक नागरिक के अंदर भड़क चुकी थी, जिसके फलस्वरुप सन. 1947 में भारतीयों को स्वतंत्र्ता प्राप्त हुई थी। मंगल पाण्डेय 22 वर्ष की उम्र में सन. 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के सैनिक बन गए थे। उन्होंने अकेले अपने दम पर ब्रिटिश अधिकारी पर सामने से हमला कर दिया था, जिसके कारण उन्हें फांसी की सजा दी गयी थी। मंगल पाण्डेय ने मात्र 30 वर्ष की आयु में अपना जीवन देश के लिए बलिदान कर दिया था। पहली बार मंगल पाण्डेय के नाम के आगे ही “शहीद” लगाया गया था।

जन्म व बचपन

मंगल पाण्डेय का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य में बलिया जिले के नगवा नामक गांव में 19 जुलाई सन. 1827 को एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। मंगल पाण्डेय हिन्दू धर्म को सबसे महान धर्म मानते थे। उनके पिता का नाम दिवाकर पाण्डेय था जोकि एक साधारण किसान थे, उनकी आर्थिक स्थिती अच्छी नहीं थी। बाढ़ के कारण अक्सर उनकी फसल नष्ट हो जाती थी। मंगल पाण्डेय की माता का नाम श्रीमति अभय रानी था। मंगल पाण्डेय एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे, जो काम को पूरी लगन व निष्ठा के साथ करते थे। वे भविष्य में एक बड़ा व्यक्ति बनना चाहते थे।

विद्रोही कैसे बने

यह बात 31 जनवरी सन. 1857 की है, उन दिनों लोग छुआछूत को अत्यधिक मानते थे। उस समय उच्च जाति के लोग अपने आपको उत्तम मानते थे और निम्न वर्ग के लोग दबकर जीवन-यापन करते थे। एक दिन मंगल पाण्डेय अपने जलपात्र में जल लेकर खाना खाने बैठे ही थे कि तभी वहां एक कर्मचारी आया जो वाल्मीकि जाति का था। वह बहुत प्यासा था, उस कर्मचारी ने मंगल पाण्डेय से कहा कि पंडित जी बहुत जोर से प्यास लगी है, जरा अपने जलपात्र से जल पी लेने दीजिये। मंगल पाण्डेय ने उस कर्मचारी को जल पिलाने से मना कर दिया और उसे फटकारा कि तू वाल्मीकि जाति से है, मैं तुझे अपने जलपात्र से जल नहीं पिला सकता। तब उस कर्मचारी ने कहा पण्डित जी मुझको जल पिलाने से तो आपका धर्म भ्रष्ट होता है, लेकिन जब वो अंग्रेज गाय व सूअर की बनी हुई चर्बी का कारतूस आपको देते हैं और जब आप उसको अपने मुँह छीलते हो तब आपका धर्म कहाँ चला जाता है। संयोग से वह वाल्मीकि उस कारतूस के कारखाने में कार्य करता था और उसका यह कथन बिलकुल सही था। मंगल पाण्डेय को इस बात को सुनकर बहुत गुस्सा आया और उनके अंदर की ज्वाला भड़क उठी। उन्होंने अंग्रेजों का विरोध करने का निर्णय कर लिया। मंगल पाण्डेय ने कई लोगों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ खुलेआम विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। मंगल पाण्डेय ने अपने देश और धर्म को बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी, जिसमें उनके कुछ साथियों ने भी उनका साथ दिया था।

आजादी की पहली गोली

मंगल पाण्डेय ने 29 मार्च सन. 1857 को अपने विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। वह सुबह ही अपने हथियार लेकर छावनी पहुंचे और अपने साथियों को आवाज लगायी कि सभी लोग अपनी बैरक से बाहर आ जाओ और इन अंग्रेजों को यहाँ से खदेड़ दो, भारत माता को हमें इन अंग्रेजों से स्वतन्त्र कराना है, लेकिन तभी लेफ्टिनेंट जनरल हडसन की नजर मंगल पाण्डेय पर पड़ी। हडसन ने एक सैनिक से मंगल पाण्डेय को पकड़ने के लिए कहा, लेकिन उस सैनिक ने मंगल पाण्डेय को पकड़ने से इंकार कर दिया क्योकि वह हिन्दू सैनिक था। उसी समय मंगल पाण्डेय को पकड़ने के लिए लेफ्टिनेन्ट बाफ आगे बढ़ा, लेफ्टिनेन्ट बाफ घोड़े पर था। उसे लगा कि मंगल पाण्डेय उसे देखकर घबरा जायेंगे, लेकिन तभी मंगल पाण्डेय ने बंदूक निकाली और लेफ्टिनेन्ट बाफ को गोली मार दी। यह गोली आजादी की पहली गोली थी, जिसकी आवाज से पूरी छावनी गूंज उठी। ये गोली बाफ के घोड़े को लगी, जिससे कि बाफ नीचे गिर पडा, तभी हडसन ने मंगल पाण्ड़ेय पर हमला करने की सोची, लेकिन मंगल पाण्ड़ेय चौंकन्ने थे और उन्होंने हडसन को भी गोली मारकर नीचे गिरा दिया, जिसके बाद उन्होंने बाफ को चाकू से गोदकर मार डाला। तभी जनरल हियर्सी के कहने पर एक मुसलमान सिपाही “शेख पलटू” ने उनको पीछे से धोखे से पकड़ लिया, जिसके कारण अंग्रेज लोग मंगल पाण्डेय पर हावी होते गए। हियर्सी ने आदेश दिया कि जो लोग मंगल पाण्डेय को पकड़वाने में योगदान नहीं देगा, उसे गोली से मार दिया जायेगा। मंगल पाण्डेय को लगने लगा कि वह अब अंग्रेजों की गिरफ़्त से नहीं छूट पाएंगे, इसलिए उन्होंने खुद को गोली मारकर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिसमें वो असफल रहे।

सम्मान

भारतीय सरकार ने मंगल पाण्डेय के मरणोपरांत इनके सम्मान में 5 अक्टूबर सन. 1984 को एक पोस्टेज चालू किया गया, जिसमें उनकी फोटो भी अंकित थी।

मृत्यु

मंगल पाण्डेय पर अदालत में अंग्रेज अफसर की हत्या का मुक़दमा चला, उसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। मंगल पाण्डेय को फाँसी की सजा का एलान 18 अप्रैल सन. 1857 को हुआ। उसी समय मंगल पाण्ड़ेय की वीरता को देखकर देश की जनता का जोश जागृत हो गया, जिसके कारण कोई भी जल्लाद मंगल पाण्डेय को फांसी पर चढ़ाने के सहमत नहीं हुआ। तब अंग्रेजों ने कलकत्ता से जल्लाद बुलाये, जिनको भी यह खबर नहीं थी कि फांसी किसे देनी है। 8 अप्रैल सन. 1857को फाँसी की सजा से दस दिन पहले ही मंगल पाण्डेय को फांसी पर लटका दिया गया और मंगल पाण्डेय शहीद हो गये।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here