2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग | Mallikarjuna Jyotirlinga in Hindi

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शिव पुराण में वर्णित कथानुसार मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश राज्य के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग को ‘दक्षिण का कैलाश’ भी कहा जाता है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की पुष्टि करते हैं। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से ही मनुष्य को उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा

भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय जी और गणेश जी दोनों भाई विवाह के लिए आपस में झगड़ा कर रहे थे। कार्तिकेय जी का कहना था कि वे बड़े हैं, इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए, लेकिन गणेश जी अपना विवाह कार्तिकेय जी से पहले कराना चाहते थे, इसलिए फैसले के लिए दोनों भगवान शिव और माता पार्वती के पास जा पहुँचे। भगवान शिव और माता पार्वती ने कहा कि दोनों में से जो भी इस धरती की परिक्रमा करके पहले यहाँ आ जाएगा, उसका विवाह पहले होगा। इस शर्त को सुनकर कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए चल पड़े। दूसरी तरफ गणेश जी का शरीर स्थूलकाय था और उनका वाहन भी चूहा था, उनके सामने बड़ी गंभीर समस्या पैदा हो गई। इतनी जल्दी से वे परिक्रमा नहीं कर सकते थे। गणेश जी ने कुछ सोच-विचार कर भगवान शिव और माता पार्वती से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। भगवान शिव और माता पार्वती के आसन पर बैठने के पश्चात गणेश जी ने दोनों की सात बार परिक्रमा की और बाद में विधिवत रूप से उनका पूजन भी किया, जो इस प्रकार से है-

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यं फलं भवति निश्चितम्।।

इस तरह गणेश जी को माता-पिता की परिक्रमा से प्रथ्वी की परिक्रमा का फल प्राप्त हुआ। गणेश जी की चतुर बुद्धि को देखकर भगवान शिव और माता पार्वती ने उनका विवाह विश्वरूप प्रजापति की पुत्रियों ‘सिद्धि’ और ‘बुद्धि’ के साथ संपन्न करा दिया। गणेश जी को ‘सिद्धि’ नामक पत्नी से ‘क्षेम’ तथा ‘बुद्धि’ नामक पत्नी से ‘लाभ’, ये दो पुत्र प्राप्त हुए। जब देवर्षि नारद ने कार्तिकेय जी को यह वृत्तांत सुनाया तो कार्तिकेय जी क्रोध में आ गए। इस बात से नाराज कार्तिकेय जी ने शिष्टाचार का पालन करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती के पैर छुए और वहाँ से चले गए।

भगवान शिव और माता पार्वती से अलग होकर कार्तिकेय जी क्रौंच पर्वत पर निवास करने लगे। भगवान शिव और माता पार्वती ने देवर्षि नारद को क्रौंच पर्वत पर भेजा। देवर्षि नारद ने हर तरह से कार्तिकेय जी को मनाने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। बाद में माता पार्वती पुत्र स्नेह में व्याकुल होकर भगवान शिव को साथ लेकर क्रौंच पर्वत पर जा पहुँचीं। कार्तिकेय जी को क्रौंच पर्वत पर अपने माता-पिता के आने की खबर मिली तो वे वहाँ से लगभग 36 किलोमीटर दूर चले गए। कार्तिकेय जी के चले जाने पर भगवान शिव उसी क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए और तभी से वे ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए। यहाँ ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है और ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हे। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार हर रोज प्रातःकाल और संध्या के समय इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम जपने से या दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप या कष्ट दूर हो जाते हैं। एक पौराणिक कथानुसार जहाँ पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, वहाँ पर भगवान शिव का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के संबंध में श्लोक निम्नलिखित है-

श्लोक-

श्री शैलश्रृंगे विव‍धी प्रसंगे, शेषाद्रीश्रृंगेपि सदावसंततम्।
तमर्जुनं मल्लिकार्जुनं पूर्वमेकम, नमामि संसारसमुद्रसेतुम्।।

यहां दिए गए निम्नलिखित श्लोकों को पढ़ते हुए जो व्यक्ति सभी 12 ज्योतिर्लिंगों का मन से ध्यान करता है, उसके सातों जन्म के पाप या कष्ट नष्ट हो जाते हैं। वास्तव में 64 ज्योतिर्लिंगों को माना जाता है, लेकिन इनमें से 12 ज्योतिर्लिंगों को ही सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है।

 ज्योतिर्लिंगों की तालिका

क्रम. संख्या ज्योतिर्लिंग का नाम ज्योतिर्लिंग का स्थान ज्योतिर्लिंग का संक्षिप्त वर्णन
1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे 17 बार नष्ट किया। सबसे अधिक नुकसान महमूद गजनवी के हमले से हुआ था। हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर, कुर्नूल, आन्ध्र प्रदेश मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है।
3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग क्षिप्रा नदी के तट पर, महाकाल, उज्जैन, मध्य प्रदेश महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आकार औंकार अर्थात ऊं जैसा है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है।
5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर, केदारनाथ, उत्तराखंड केदारनाथ ज्योतिर्लिंग समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है।
6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मुंबई से पूर्व दिशा में और पुणे से उत्तर दिशा में भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर, भीमाशंकर, महाराष्ट्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को ‘मोटेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान शिव ने भीमासुर राक्षस का वध किया था।
7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा तट पर, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश काशी विश्वनाथ में भगवान शिव का वास है, जो व्‍यक्ति इस पवित्र स्‍थान पर मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है, वह इस संसार के क्लेश से मुक्त हो जाता है।
8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे, नासिक, महाराष्ट्र ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में रहना पड़ा।
9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर, झारखंड लंकापति रावण ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर एक शिवलिंग प्राप्त किया, जिसे वह लंका में स्थापित करना चाहता था, परंतु ईश्वर की लीला से वह शिवलिंग वैद्यनाथ धाम में ‍ही स्थापित हो गया।
10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दारुकावन, द्वारका, गुजरात भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। धार्मिक शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता माने गए हैं, नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है।
11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम, रामनाड, तमिलनाडु इस ज्योतिर्लिंग के विषय में मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। यहां पर श्रीराम ने बालू का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की और रावण पर विजय हेतु भगवान शिव से वरदान मांगा।
12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग एल्लोरा के पास, औरंगाबाद, महाराष्ट्र ऐसी मान्यता है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से वंशवृद्धि होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका निर्माण अहिल्‍याबाई होल्‍कर के द्वारा करवाया गया था।