महाराणा प्रताप

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परिचय

महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के एक महान योद्धा थे। महाराणा प्रताप अपने जीवन में कभी भी मुगलों के आगे नहीं झुके और ना ही कभी मुगलों से हार मानी। वे एक पराक्रमी व बहादुर राजपूत थे। महाराणा प्रताप ने हर परिस्थिति में अपनी अंतिम सांस तक अपनी प्रजा की रक्षा की, वे अपनी प्रजा का बहुत सम्मान करते थे। महाराणा प्रताप की वीरता को अकबर भी सलाम करता था। वे भावुक और धर्म परायणता के साथ-साथ युद्ध कौशल में भी निपुण थे। महाराणा प्रताप की माता जयवंता बाई जी उनकी सबसे पहली गुरु थीं। महाराणा प्रताप की पहली रानी का नाम अजबदे पुनवार था, उनसे अमर सिंह और भगवानदास नाम के दो पुत्र थे। महाराणा प्रताप के भाले का भार 81 किलो व कवच का भार 72 किलोथा, उनके कवच, भाला, ढाल और तलवारों का वजन मिलकर 208 किलो था और उनका खुद का भार 110 किलो था।

जन्म व बचपन

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई सन. 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनकी माता का नाम जयवंता बाई और पिता का नाम राणा उदयसिंह था। उनकी माता पाली के सोनगरा अखेराज की पुत्री थीं। इनके पिता उदयपुर शहर के संस्थापक थे। महाराणा प्रताप बचपन से ही वीर, साहसी व निडर थे, उनको अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान भी बचपन में ही प्राप्त हुआ था। महाराणा प्रताप को बचपन से ही घुड़सवारी का शौक था। उनके पिता ने उन्हें बचपन में एक घोडा दिया था, जिसका नाम उन्होंने ”चेतक” रखा। बचपन में महाराणा प्रताप को ”कीका” के नाम से भी पुकारा जाता था।

महाराणा प्रताप की पत्नी

महाराणा प्रताप की प्रथम पत्नि का नाम रानी अजबदे पुनवार था। वह बिजोली की राजकुमारी थी और स्वभाव से बहुत ही शान्त और सुशील थी। अजबदे बाई ने महाराणा प्रताप का कठिन परिस्थतियों में उचित निर्णय लेने में साथ दिया था। अजबदे बाई के अलावा इनके 11 पत्नियां और थीं।

चेतक और महाराणा प्रताप

“चेतक” और महाराणा प्रताप का एक अनूठा सम्बन्ध था। वफादारी और बहादुरी “चेतक” में कूट-कूट कर भरी हुई थी। “चेतक नीलवर्ण का अफगानी अश्व था, जिसको पाकर महाराज बहुत प्रसन्न थे और उसे वह पुत्र की भांति प्रेम करते थे। महाराणा प्रताप की वीरता की कहानियों में “चेतक” का एक अलग स्थान था, इसकी फुर्ती के कारण ही महाराणा प्रताप ने कई युद्धों को बहुत ही आसानी से जीता था।

हल्दी घाटी का युद्ध जो महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुआ था, उस युद्ध के दौरान रास्ते में एक बड़ी नदी आ जाती है, महाराणा प्रताप की रक्षा के लिए “चेतक” उस नदी (जोकि लगभग 21 फ़ीट लम्बी थी) को फलांग जाता है और कुछ दूर चलने के बाद घायल हो जाता है, जिसके कारण “चेतक” अपने प्राण त्याग देता है। 21 जून सन. 1576 को “चेतक” महाराणा प्रताप से अलग हो जाता है। आज भी हल्दी घाटी में चेतक की समाधि है, जिसे लोग देखने के लिए वहां जाते हैं।

हल्दीघाटी का युद्ध

हल्दीघाटी का यह युद्ध इतिहस के पन्नों में महाराणा प्रताप की वीरता के लिए जाना जाता है, जोकि 18 जून सन. 1576 को हुआ था, जिसमें महाराणा प्रताप के केवल बीस हजार सैनिकों ने मिलकर मुगलों के अस्सी हजार सैनिकों का सामना बड़ी वीरता के साथ किया था, यह अपने आप में अविश्वसनीय था। इस युद्ध में मुगलों की सेना की कमान मानसिंह और आसफ खान के हाथों में थी और मेवाड़ के सेना की कमान खुद महाराणा प्रताप और हाकिम खान सूरी के हाथों में थी। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की और से लड़ने वाला केवल एक ही मुस्लिम सरदार था, जिसका नाम हकीम खान सूरी था। वैसे इस युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला था, लेकिन महाराणा प्रताप की वीरता और सैनिकों के साहस ने मुगलों की विशालकाय सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। अपनी जान बचाने के लिए मुगलों की सेना मैदान छोड़कर भाग गयी थी। इस युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि दोनों सेनाओं की आमने-सामने लड़ाई हुई थी, जिसमें महाराणा प्रताप की प्रत्यक्ष रूप से विजय मानी जाती है। इस युद्ध के बाद अकबर महाराणा प्रताप से इतना डर गया था कि वह आगरा से सीधा लाहौर भाग गया था। महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद ही अकबर ने आगरा को दोबारा अपनी राजधानी बनाया था।

मृत्यु

महाराणा प्रताप एक जंगल में दुर्घटना से घायल हो गए थे, उनकी मृत्यु 29 जनवरी सन. 1597 को हुई। उस समय महाराणा प्रताप की आयु 57 साल की थी। महाराणा प्रताप की याद में आज भी राजस्थान में महोत्सव मनाए जाते हैं।

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