महाकालेश्वर मंदिर | Mahakaleshwar Mandir in Hindi

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महाकालेश्वर मंदिर मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित है। यह मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे भगवान शिव का सबसे पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है। यह मंदिर “रूद्र सागर” नदी के किनारे स्थित है। यह भारत का एक मात्र ज्योतिर्लिंग है, जो दक्षिणमुखी है। ऐसी मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। कहा जाता है की अधिष्ट देवता, भगवान शिव इस लिंग में स्वयंभू के रूप में बसते हैं, इस लिंग में अपनी ही अपार शक्तियाँ हैं और मंत्र-शक्ति से ही इस लिंग की स्थापना की गयी थी। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की तारीफ की है। सन. 1235 में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहाँ जो भी शासक हुए, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की तरफ विशेष ध्यान दिया। वर्तमान मंदिर को श्रीमान पेशवा बाजी राव और छत्रपति शाहू महाराज के जनरल श्रीमान रानाजिराव शिंदे महाराज ने सन. 1736 में करवाया था।

निर्माण

वर्तमान मंदिर का निर्माण श्रीमान रानाजिराव शिंदे महाराज ने सन. 1736 में करवाया था। इसके बाद श्रीनाथ महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान महारानी बायजाबाई राजे शिंदे ने इसमें अनेक परिवर्तन व मरम्मत करवायी थी। मंदिर का कुल क्षेत्रफल 10.77 × 10.77 वर्गमीटर और ऊंचाई 28.77 मीटर है। महाकालेश्वर मंदिर एक विशाल परिसर में स्थित है, जिसमें अनेक देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं। मंदिर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार से गर्भगृह की दूरी तय करनी पड़ती है। गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए पक्की सीढियाँ बनी हुई हैं।

मंदिर के परिसर में एक प्राचीन कुण्ड है। वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है, वह तीन खण्डों में विभाजित है। इसके नीचे के हिस्से में महाकालेश्वर, मध्य के हिस्से में ओकारेश्वर तथा ऊपरी हिस्से में नागचंद्रेश्वर मंदिर स्थित है। गर्भगृह में विराजित महाकालेश्वर का विशाल दक्षिणमुखी शिवलिंग है, जिसका ज्योतिष में विशेष महत्व है। गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मोहक प्रतिमाएं उपस्थित हैं। गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो हमेशा दहकता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नन्दी की प्रतिमा विराजित है। यह मंदिर पाँच मंजिला है, जिनमें से एक जमीन के नीचे भी है। यह मंदिर एक पवित्र गार्डन में बना हुआ है, जो सरोवर के पास विशाल दीवारों से घिरा हुआ है। इसके साथ ही निचले पवित्र स्थान पर पीतल के लैंप भी लगाये गए हैं। अन्य मंदिरों की भांति यहाँ भी भक्तों को भगवान का प्रसाद दिया जाता है।

इतिहास

महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन किया गया है। स्वंयभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महिमा है। ऐसी मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। महाकवि कालिदास ने मेघधूत में उज्जयिनी का वर्णन करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की गयी है। सन. 1235 में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहाँ पर जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण की तरफ विशेष ध्यान दिया। इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पहले इस मंदिर को शोभायमान किया जाता है। वर्तमान मंदिर का निर्माण श्रीमान पेशवा बाजीराव और छत्रपति शाहू महाराज के जनरल श्रीमान रानाजिराव शिंदे महाराज ने सन. 1736 में करवाया था। इसके बाद श्रीनाथ महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान महारानी बायजाबाई राजे शिंदे ने इसमें अनेक परिवर्तन व मरम्मत करवायी थी।

इसी महाकालेश्वर की नगरी में महाराजा विक्रमादित्य ने 24 स्तंभों का दरबार मण्डप बनवाया था। मंगल ग्रह का जन्म स्थान मंगलेश्वर भी यहीं पर स्थित है। भर्तहरी की गुफा तथा महर्षि सान्दिपनी का आश्रम यहीं पर विराजमान है। श्रीकृष्ण और बलराम जी ने इसी सान्दिपनी आश्रम से विद्या ग्रहण् की थी। जब सिंह राशि पर ब्रहस्पति गृह का आगमन होता है, तो यहाँ पर प्रत्येक 12 वर्ष पश्चात महाकुम्भ का स्नान और मेला लगता है।

शिव पुराण में वर्णित कथा

शिव पुराण की ‘कोटिरुद्र संहिता’ के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण रहा करते थे। वे अपने घर में अग्नि की स्थापना कर प्रतिदिन अग्निहोत्र करते थे और वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे रहते थे। भगवान शंकर के परम भक्त वह ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव लिंग का निर्माण कर शास्त्र विधि से उसकी पूजा करते थे। हमेशा उत्तम ज्ञान को प्राप्त करने में तत्पर उस ब्राह्मण देवता का नाम ‘वेदप्रिय’ था। वेदप्रिय स्वयं ही शिवजी के अनन्य भक्त थे, जिसके फलस्वरूप उनके चार पुत्र हुए। वे तेजस्वी तथा माता-पिता के सद्गुणों के अनुरूप थे। उन चारों पुत्रों के नाम ‘देवप्रिय’, ‘प्रियमेधा’, ‘संस्कृत’ और ‘सुवृत’ थे।

उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर “दूषण” नाम के धर्म विरोधी एक असुर ने वेद, धर्म तथा धर्मात्माओं पर आक्रमण कर दिया। उस असुर को ब्रह्मा से अजेयता का वर मिला था। सबको सताने के बाद अन्त में उस असुर ने भारी सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के उन पवित्र और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों पर भी चढ़ाई कर दी। उस असुर की आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलयकाल की आग के समान प्रकट हो गये। उनके भयंकर उपद्रव से भी शिवजी पर विश्वास करने वाले वे ब्राह्मण बन्धु भयभीत नहीं हुए। अवन्ति नगर के निवासी सभी ब्राह्मण जब उस संकट में घबराने लगे, तब उन चारों शिवभक्त भाइयों ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- “आप लोग भक्तों के हितकारी भगवान शिव पर भरोसा रखें।” उसके बाद वे चारों ब्राह्मण-बन्धु शिवजी का पूजन कर उनके ही ध्यान में मग्न हो गये। सेना सहित “दूषण” ध्यान मग्न उन ब्राह्मणों के पास पहुँच गया। उन ब्राह्मणों को देखते ही ललकारते हुए बोला कि इन्हें बाँधकर मार डालो। वेदप्रिय के उन ब्राह्मण पुत्रों ने उस दैत्य के द्वारा कही गई बातों पर ध्यान नहीं दिया और भगवान शिव के ध्यान में मग्न रहे। जब उस दुष्ट दैत्य ने यह समझ लिया कि हमारे डाँट-डपट से कुछ भी परिणाम निकलने वाला नहीं है, तब उसने ब्राह्मणों को मार डालने का निश्चय किया।

जैसे ही उसने उन शिव भक्तों के प्राण लेने हेतु शस्त्र उठाया, वैसे ही उनके द्वारा पूजित उस पार्थिव लिंग की जगह गम्भीर आवाल के साथ एक गडढा प्रकट हो गया और तत्काल उस गड्ढे से विकट और भयंकर रूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये। दुष्टों का विनाश करने वाले तथा सज्जन पुरुषों के कल्याणकर्ता वे भगवान शिव ही महाकाल के रूप में इस पृथ्वी पर विख्यात हुए। उन्होंने दैत्यों से कहा- “अरे दुष्टों! तुझ जैसे हत्यारों के लिए ही मैं ‘महाकाल” प्रकट हुआ हूँ।’

इस प्रकार धमकाते हुए महाकाल भगवान शिव ने अपने हुँकार मात्र से ही उन दैत्यों को भस्म कर डाला। दूषण की कुछ सेना को उन्होंने मार गिराया और कुछ स्वयं ही भाग गयी। इस प्रकार परमात्मा शिव ने दूषण नामक दैत्य का वध कर दिया। जिस प्रकार सूर्य के निकलते ही अन्धकार छँट जाता है, उसी प्रकार भगवान आशुतोष शिव को देखते ही सभी दैत्य सैनिक पलायन कर गये। देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी दन्दुभियाँ बजायीं और आकाश से फूलों की वर्षा की। उन शिवभक्त ब्राह्मणों पर अति प्रसन्न भगवान शंकर ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि “मै महाकाल महेश्वर तुम लोगों पर प्रसन्न हूँ, तुम लोग वर मांगो।” महाकालेश्वर की वाणी सुनकर भक्ति भाव से पूर्ण उन ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहा- “दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भो! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभो! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।” भगवान शंकर ने उन ब्राह्माणों को सद्गति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गये। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिवजी की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

मंदिरों की तालिका-

क्र. सं. मंदिर का नाम मंदिर का स्थान देवी / देवता का नाम
1 बांके बिहारी मंदिर मथुरा-वृन्दावन, उत्तर प्रदेश बांके बिहारी (श्री कृष्ण)
2 भोजेश्वर मंदिर भोपाल, मध्यप्रदेश भगवान शिव
3 दाऊजी मंदिर बलदेव, मथुरा, उत्तर प्रदेश भगवान बलराम
4 द्वारकाधीश मंदिर मथुरा, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण
5 गोवर्धन पर्वत गोवर्धन, मथुरा, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण
6 इस्कॉन मंदिर मथुरा-वृन्दावन, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण, भगवान बलराम
7 काल भैरव मंदिर भैरवगढ़, उज्जैन, मध्यप्रदेश भगवान काल भैरव
8 केदारनाथ मंदिर रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड भगवान शिव
9 महाकालेश्वर मंदिर जयसिंहपुरा, उज्जैन, मध्यप्रदेश भगवान शिव
10 नन्द जी मंदिर नन्दगाँव, मथुरा नन्द बाबा
11 निधिवन मंदिर मथुरा-वृन्दावन, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण, राधा रानी
12 ओमकारेश्वर मंदिर खंडवा, मध्यप्रदेश भगवान शिव
13 प्रेम मंदिर मथुरा-वृन्दावन, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण, राधा रानी
14 राधा रानी मंदिर बरसाना, मथुरा, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण, राधा रानी
15 श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा, उत्तर प्रदेश श्री कृष्ण, राधा रानी
16 बृजेश्वरी देवी मंदिर नगरकोट, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश माँ ब्रजेश्वरी
17 चामुंडा देवी मंदिर कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश माँ काली
18 चिंतपूर्णी मंदिर ऊना, हिमाचल प्रदेश चिंतपूर्णी देवी
19 ज्वालामुखी मंदिर कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश ज्वाला देवी
20 नैना देवी मंदिर बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश नैना देवी
21 बाबा बालकनाथ मंदिर हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश बाबा बालकनाथ
22 बिजली महादेव मंदिर कुल्लू, हिमाचल प्रदेश भगवान शिव
23 साईं बाबा मंदिर शिर्डी, महाराष्ट्र साईं बाबा
24 कैला देवी मंदिर करौली, राजस्थान कैला देवी (माँ दुर्गा की अवतार)
25 ब्रह्माजी का मंदिर पुष्कर, राजस्थान ब्रह्माजी
26 बिरला मंदिर दिल्ली भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी देवी
27 वैष्णों देवी मंदिर कटरा, जम्मू माता वैष्णो देवी
28 तिरुपति बालाजी मंदिर तिरुपति, आंध्रप्रदेश भगवान विष्णु
29 सोमनाथ मंदिर वेरावल, गुजरात भगवान शिव
30 सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई, महाराष्ट्र श्री गणेश
31 पद्मनाभस्वामी मंदिर (त्रिवेन्द्रम) तिरुवनंतपुरम्, केरल भगवान विष्णु
32 मीनाक्षी अम्मन मंदिर मदुरै या मदुरई, तमिलनाडु माता पार्वती देवी
33 काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, उत्तर प्रदेश भगवान शिव
34 जगन्नाथ मंदिर पुरी, उड़ीसा श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा
35 गुरुवायुर मंदिर गुरुवायुर, त्रिशूर, केरल श्री कृष्ण
36 कन्याकुमारी मंदिर कन्याकुमारी, तमिलनाडु माँ भगवती
37 अक्षरधाम मंदिर दिल्ली भगवान विष्णु