महादेव गोविन्द रानाडे की जीवनी | Mahadev Govind Ranade Biography in Hindi

928

परिचय

महादेव गोविन्द रानाडे भारत के प्रसिद्ध समाज सुधारक, राष्ट्रवादी, विद्वान तथा न्यायविद थे। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों तथा अंधविश्वासों का कड़ा विरोधकर समाज सुधार के कार्यों में हिस्सा लिया था। आर्य समाज, ब्रहमा समाज तथा प्रार्थना समाज जैसे सामाजिक सुधार संगठनों ने महादेव गोविन्द रानाडे को बहुत अधिक प्रभावित किया था। वे ‘दक्कन एजुकेशनल सोसायटी’ के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। महादेव गोविन्द रानाडे एक राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ स्वदेशी के समर्थक भी थे, उन्होंने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना का भी समर्थन किया था।

महादेव गोविन्द रानाडे कई प्रतिष्ठित पदों पर आसीन रहे, जिनमें केन्द्र सरकार के वित समिति का सदस्य, बाॅम्बे विधान परिषद का सदस्य तथा बाॅम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे पद मुख्य थे। उन्होंने अपने जीवन में कई सार्वजनिक संगठनों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें प्रार्थना समाज, पूना सार्वजनिक सभा तथा वक्तृत्व तेजक सभा प्रमुख थे। उन्होंने ‘इन्दुप्रकाश’ नामक एंग्लो-मराठी पत्र का भी सम्पादन किया था।

शुरूआती जीवन

महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म ‘चिंतपावन ब्राह्मण’ परिवार में नाशिक जिले के निंफाड कस्बे में 18 जनवरी 1842 को हुआ था। उनके बचपन का ज्यादातर समय कोल्हापुर में बीता था, वहां उनके पिता मंत्री थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कोल्हापुर के एक मराठी स्कूल से प्रारंभ हुई तथा बाद में बाॅम्बे के ‘बाॅम्बे विश्वविद्यालय’ से सम्बद्ध- ‘एल्फिन्सटन काॅलेज’ से 14 वर्ष की आयु में शिक्षा ग्रहण की। महादेव गोविन्द रानाडे ने B.A. 1862 में तथा L.L.B. 1866 में प्रथम श्रेणी से पास की। बाद में उन्होंने उसी संस्थान से प्रथम श्रेणी में M.A. की परीक्षा पास ही। उनके सहपाठी प्रसिद्ध समाज सुधारक और विद्धान ‘आर. जी. भंडारकर’ थे।

करियर

प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के तौर पर महादेव गोविन्द रानाडे का चयन हुआ। उन्हें ‘बाॅम्बे स्माल काजेज कोर्ट’ का चौथा न्यायाधीश 1871 में, पूना का प्रथम श्रेणी सह-न्यायाधीश 1873 में, ‘स्माल काजेज कोर्ट’ पूना का न्यायाधीश 1884 में और आखिर में बाॅम्बे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 1893 में बनाया गया। वे बाॅम्बे विधान परिषद में 1885 से लेकर बाॅम्बे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने तक रहे।

ब्रिटिश सरकार ने 1897 में महादेव गोविन्द रानाडे को वित्त समिति का सदस्य बनाया तथा उनकी इस सेवा के लिए ‘कम्पैनियन आॅफ द आर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर’ (companion of the order of the indian empire) से सम्मानित किया। उन्होंने विशेष न्यायाधीश के रूप में ‘डेक्कन एग्रीकल्चरिस्ट ऐक्ट’ (deccan agriculturists act) के अंतर्गत भी कार्य किया। उन्होंने बाॅम्बे विश्वविद्यालय में ‘डीन इन आर्टस’ रहकर विद्यार्थियों की जरूरतों और परेशानियों को अच्छी तरह समझा। उन्होंने अंग्रेजी भाषा की महत्वपूर्ण पुस्तकों को भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने तथा विश्वविद्यालय के पाठयक्रम को भी भारतीय भाषाओं में छापने पर जोर दिया।

मराठी भाषा का विद्वान होने के नाते महादेव गोविन्द रानाडे ने मराठा इतिहास और भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी किताबें लिखीं। उनका मत था कि देश का आर्थिक विकास बड़े उद्योग-धंधों को स्थापित करने से हो सकता है तथा आधुनिक भारत के विकास में पश्चिमी शिक्षा पद्धति जरूरी भूमिका अदा कर सकती है।

धार्मिक दृष्टिकोण

महादेव गोविन्द रानाडे ने आत्माराम पांडुरंग, डाॅ आर जी भंडारकर तथा वी.ए. मोदक के साथ मिलकर ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना में जरूरी भूमिका अदा की। यह संगठन ‘ब्रह्मा समाज’ से प्रेरित था, जिसका उद्देश्य वेदों पर आधारित एक प्रबुद्ध आस्थावाद का विकास करना था। ‘केशव चन्द्र सेन’ ‘प्रार्थना समाज’ के संस्थापक थे, जिनका लक्ष्य महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार लाना था।

राजनीतिक जीवन

महादेव गोविन्द रानाडे ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, पूना सार्वजनिक सभा तथा अहमदनगर शिक्षा समिति को स्थापित करने में जरूरी भूमिका अदा की। उन्हें बाल गंगाधर तिलक की सोच का विरोधी तथा गोपाल कृष्ण गोखले का गुरू भी माना जाता है।

सामाजिक जीवन

महादेव गोविन्द रानाडे ने ‘सोशल कांफ्रेंस मूवमेंट’ को स्थापित किया तथा बाल विवाह, विधवाओं का मुंडन, शादी-विवाह आदि के लिए जातिगत भेदभाव का विरोध किया था। विधवा पुनर्विवाह तथा स्त्री शिक्षा पर भी उन्होंने जोर दिया।

विधवा विवाह संगठन की स्थापना 1861 में हुई, महादेव गोविन्द रानाडे इस संगठन के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। उन्होंने भारत की सभ्यता और इतिहास को बहुत अहमियत दी तथा लोगों से बदलाव को स्वीकारने को कहा।

महादेव गोविन्द रानाडे ने अंधविश्वासों तथा कुरीतियों का विरोध किया, लेकिन निजी जीवन में वे खुद रूढ़िवादी थे। पत्नी के निधन के बाद उन्होंने एक 11 वर्ष की लड़की ‘रमाबाई’ से शादी की और उसे पढ़ाया था।

निधन

महादेव गोविन्द रानाडे का निधन 16 जनवरी 1901 में पूना में हुआ। उनके निधन के बाद पत्नी रमाबाई रानाडे ने ही उनके शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाया।