महाशिवरात्रि | Maha Shivaratri in Hindi

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‘महाशिवरात्रि’ हिन्दुओं का एक श्रेष्ठ त्यौहार है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा होती है और इस दिन भगवान शिव का जन्म दिवस भी मनाया जाता है। फरवरी महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव के भक्त उपवास रखते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं।

ऐसा माना जाता है, कि सृष्टि के शुरू में महाशिवरात्रि की अर्धरात्रि को ब्रह्मा जी के शरीर से भगवान शिव रूद्र के रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने तांडव नृत्य करते हुए अपनी तीसरी आँख महाशिवरात्रि के दिन ही खोली थी और अपनी तीसरी आँख की ज्वाला से ब्रह्मांड को भस्म किया था। इस दिन को भगवान शिव के विवाह से भी जोड़ा गया है, अर्थात महाशिवरात्रि के ही दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।

महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों में सुबह से ही पूजा करने के लिए भक्तों की बड़ी संख्या में भीड़ लगी रहती है। भक्त दर्शन पाकर खुद को सैभाग्शाली मानते हैं। इस दिन भगवान शिव की अनेक प्रकार की पवित्र समिग्रियों से जैसे- बेर, धतूरा, अंजीर, बैलपत्तर, गुलाल, दूध आदि से पूजा की जाती है। भगवान शिव को भांग बहुत पसंद है, कुछ लोग भगवान शिव पर भांग भी चढ़ाते हैं और दिनभर व्रत रखने के बाद में पूजा करके शाम को फलाहार करते हैं।

भगवान शिव से माता पार्वती से पूछा- “ऐसा कौन सा सहज उपवास है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।” भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘महाशिवरात्रि’ उपवास को बताया और उसके बारे में यह कथा सुनाई-

कथा

चित्रभानु नाम का एक शिकारी था, वह शिकारी पशु-पक्षियों को मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। शिकारी किसी अमीर व्यक्ति का कर्जदार था, लेकिन शिकारी उसको समय से धन वापस नही देता था। एक दिन अमीर व्यक्ति को गुस्सा आया और उसने चित्रभानु नाम के शिकारी को शिव मन्दिर में कैद कर लिया, संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि थी। शिकारी ध्यान से भगवान शिव से जुड़ी हुए धार्मिक कथाएं सुनता रहा, चतुर्दशी को शिवरात्रि उपवास की कथा भी सुनी। अमीर व्यक्ति ने शाम होते ही शिकारी को बुलाया और उससे कर्ज चुकाने के बारे में बात कही, शिकारी ने अगले दिन सारा कर्ज चुका देने का झूठा वादा किया और वहां से मुक्त हो गया।

शिकारी हर दिन की तरह फिर से शिकार करने के लिए जंगल में निकला। शिकारी बंदी गृह में दिनभर कैद रहने की वजह से वह भूख-प्यास से बेचैन था। शिकार करने के लिए शिकारी एक तालाब के किनारे बेल के पेड़ पर जाकर बैठ गया। उस बेल पेड़ के नीचे शिवलिंग घास-फूस या नीचे पड़े हुए पत्तों से ढका हुआ था। शिकारी को शिवलिंग के बारे में पता नही था। शिकारी ने पेड़ पर बैठने के लिए जो टहनियां तोड़ीं वे संयोग से शिवलिंग पर जा गिरीं।

इस प्रकार से दिनभर भूखे शिकारी का उपवास भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। कुछ रात बीत जाने के बाद एक गर्भवती हिरनी तालाब के किनारे पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर रस्सी को अपनी ओर खींचा, तभी हिरनी ने कहा” मेरे पेट में बच्चा है, तुम एक साथ दो जोवों की हत्या करोगे वो सही नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देते ही आपके पास आ जाउंगी, तब मुझे अपना शिकार बना लेना”, शिकारी ने धनुष की रस्सी ढीली की और हिरनी जंगली झाड़ियों में छुप गई।

थोड़ी देर बाद एक और हिरनी वहां आयी, शिकारी बहुत खुश हुआ। हिरनी के नजदीक आने पर शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया, तब उसे देख हिरनी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- “हे शिकारी में बहुत ही परेशान हूँ, मेरा पति मुझसे बिछुड़ गया है, मैं अपने पति को खोज रही हूँ। मुझे अपना पति मिलने के बाद में आपके पास खुद ही आ जाउंगी।” शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया।

दो बार शिकार छोड़ने के बाद शिकारी को गुस्सा आया और वह सोच में पड़ गया, रात बीती जा रही थी। तभी एक अन्य हिरनी अपने बच्चों के साथ झाडियों में से निकली, शिकारी के लिए यह सुनहरा मौका था। शिकारी ने अपने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं की और तीर छोड़ने वाला ही था, तभी हिरनी बोली- “हे शिकारी, मैं इन बच्चों को इन के पिता के पास छोड़कर अभी वापस आ रही हूँ, अभी मुझे मत मारों।”

शिकारी को हँसी आई और कहने लगा- “सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा पागल नही हूँ, मेरे बच्चे भूखे-प्यासे तड़प रहे होंगे।” हिरनी ने जबाब दिया- “जैसे तुम्हें अपने बच्चों पर तरस आ रही है, वैसे ही मुझे भी। मैं बच्चों के नाम पर थोड़ी देर के लिए जीवन दान मांग रही हूं। हे शिकारी मुझ पर भरोसा करों, मैं बच्चों को इनके पिता के पास छोड़कर, अभी  वापस पास लौटने का वादा करती हूं।”

हिरनी की बात सुनकर शिकारी को रहम आ गया और उसे भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल के पेड़ पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। सुबह होने को आ रही थी, उसी समय एक तन्दरुस्त हिरन उसी रास्ते पर आयी।  शिकारी ने सोचा कि इसका शिकार जरुर करूंगा। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाया, तभी हिरन बोली- “हे शिकारी भाई, यदि तुमने मुझसे पहले आने वाले तीन हिरनियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में देरी मत करना, ताकि मुझे उनके अभाव में एक क्षण भी दर्द नहीं झेलना पड़े। मैं उन हिरनियों का पति हूं, यदि तुमने उनको छोड़ दिया है, तो मुझे भी कुछ पल का जीवनदान देने की कृपा करें, मैं उनसे मिलने के बाद आपके पास वापस आ जाऊंगा।”

हिरन की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाक्रम घूम गया और शिकारी ने पूरी बातें हिरन को बता दी। तब हिरन बोला- “जिस तरह मेरी तीनों पत्नियां वचन भरकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी, जैसे आपने उन पर विश्वास किया है, वैसे ही मुझ पर भी भरोसा करो, मैं उन सभी को लेकर आपके पास तुरंत वापस आ रहा हूं ।” रात भर जगना व्रत, तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी की हत्या करने वाला मन पवित्र हो गया। शिकारी में भक्ति एवं दया वाली सोच वापस आ गई, अचानक ही उसके हाथ से धुनष और बाण छूट गये और भगवन शिव की कृपा से उसका हिंसक (दुःख देने वाला) दिमाग दया के भावों से भर गया।

कुछ समय बाद हिरन अपने पूरे परिवार के साथ शिकारी के पास आया, ताकि शिकारी उनका शिकार कर सके, परन्तु पशुओं की ऐसी सच्चाई और समूह में प्रेम भावना देखकर शिकारी को बड़ा पश्चात्ताप हुआ और आँखों से आँसू बहनें लगे। उस हिरन परिवार की हत्या न करके शिकारी ने अपने कठोर मन को जीव हत्या के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से सभी देवी-देवता इस घटना को देख रहे थे, घटना को समाप्त होते ही सभी देवी-देवताओं ने फूलों की वर्षा की। तब हिरन परिवार तथा शिकारी मोक्ष को प्राप्त हुए।