एम. जी. रामचंद्रन की जीवनी | M. G. Ramachandran Biography in Hindi

112

परिचय

एम.जी. रामचंद्रन का पूरा नाम ‘मरुथुर गोपालन रामचंद्रन’ है। वे भारतीय मशहूर अभिनेता, फिल्म निर्माता और राजनेता थे। वे युवा अवस्था में नाट्य समूहों के साथ नाटकों के मंचन में व्यस्त रहे। एम.जी. रामचंद्रन अपनी जवानी के दिनों में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने लगभग 30 साल तक के समय में तमिल सिनेमा में 100 से अधिक फिल्मों में काम किया। उसके बाद सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व वाली ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (DMK) पार्टी से हाथ मिलाया।

एम.जी. रामचंद्रन के पास राजनीति में सफल होने का बहुत बढ़िया अवसर था, क्योंकि वे पहले ही तमिल फिल्म अभिनेता के रूप में विख्यात हो चुके थे। आगे चलकर एम.जी. रामचंद्रन ने अपनी स्वयं की राजनीतिक पार्टी की स्थापना की, जिसे अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम नाम दिया गया। इसके बाद उन्होंने तमिलनाडु राज्य का मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचा। एम.जी. रामचंद्रन भारत की ऐसी पहली फिल्मी हस्ती हैं, जो किसी राज्य के मुख्यमंत्री बने।

एम.जी. रामचंद्रन का जन्म 17 जनवरी 1917 को एक केरलाई परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘मेलाक्कथ गोपाला मेनन’ तथा उनकी माता का नाम ‘मरुथुर सत्यभामा’ था। उनकी माता केरल के पलक्कड़ प्रांत में बड़ावन्नूर के रहने वाले थे, लेकिन उनके पिता पर लगे कई आरोपों की वजह से केरल में अपना घर छोड़ना पड़ा। वे सेलन आ गए और इसी स्थान पर एम.जी. रामचंद्रन का जन्म हुआ। सेलन में मेलाक्कथ गोपाला मेनन ने ‘मरुथुर सत्यभामा’ से विवाह किया। सेलन वर्तमान में श्रीलंका में है। बचपन से ही एम.जी. रामचंद्रन एक कट्टर हिंदू थे और भगवान मुरुगन की आराधना में उनका दृढ़ विश्वास था। भगवान मुरुगन तमिल हिंदू समाज के सबसे पूज्यनीय देवता हैं।

तमिल फिल्मों में करियर

एम.जी. रामचंद्रन युवा अवस्था से ही अभियन से जुड़ गए। वे जवान ही हुए थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। उनकी पैसा कमाना मजबूरी थी, जिसके चलते हुए उन्होंने अपना नाम नाटक कंपनी ‘ओरिजिनल बॉयज’ में दर्ज करा दिया। उनका भाई भी इस नाटक समूह का सदस्य था। नाटकों में कुछ वर्षों तक काम करने के बाद एम.जी. रामचंद्रन इसे छोड़कर सन 1935 में तमिल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ गए। कॉलीवुड में बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म “साथी लीलावती” सन 1936 में आई, इस फिल्म में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। इस एकमात्र फिल्म के बाद उन्हें 1940 के दशक में फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने का प्रस्ताव मिला।

एम.जी. रामचंद्रन को तमिल फिल्म उद्योग में एक कॉमर्शियल रोमेंटिक और एक्शन हीरो के तौर पर स्थापित करने वाली फिल्म एम. करुणानिधि द्वारा लिखित “राजकुमारी” थी। सन 1947 में सिनेमाघर में इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ और इसके बाद एम.जी. रामचंद्रन ने 3 दशक तक तमिल फिल्म उद्योग में काम किया।

सन 1956 में एम.जी. रामचंद्रन ने फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा। उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म “नाबूदी मन्नान” थी, जो बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई और इसे देखने के लिए तमिलनाडु के सिनेमा घरों में दर्शकों की अधिक संख्या में भीड़ उमड़ी। बतौर डायरेक्टर पहली फिल्म सफल होने के बाद उन्होंने “उलागम सूट्रम वालीबान” और “मधुरई मीठा सुंधरापंदियन” नाम की 2 अन्य फिल्में बनाईं, जिसमें उन्होंने निर्देशक और अभिनेता की भूमिका निभाई। सन 1971 में आई “रिक्शाकरण” नाम की फिल्म में शानदार मुख्य भूमिका निभाकर उन्होंने बेस्ट एक्टर का नेशनल अवार्ड जीता।

राजनीतिक करियर

एम.जी. रामचंद्रन युवा अवस्था से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। वे सन 1953 तक पार्टी के सदस्य बने रहे। एम.जी. रामचंद्रन ‘महात्मा गांधी’ के सिद्धांतों के बड़े प्रशंसक थे और इसलिए वे खादी के ही कपड़े पहना पसंद करते थे। सन 1953 में एम.जी. रामचंद्रन ने एम. करुणानिधि के अनुरोध पर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) पार्टी ज्वाइन कर ली। एम.जी. रामचंद्रन की प्रसिद्धि को भुनाते हुए द्रविड़ आंदोलन में DMK मुख्य चेहरा बन गई। यह आंदोलन तमिलनाडु में सन 1950 के दशक के सबसे मुख्य राजनीतिक आंदोलनों में से एक था।

सन 1962 में एम.जी. रामचंद्रन तमिलनाडु राज्य विधान परिषद के सदस्य बने। सन  1967 में उन्हें तमिलनाडु विधानसभा का सदस्य चुना गया। 12 जनवरी 1967 को एम.जी. रामचंद्रन को गोली लगी, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। उनके साथी अभिनेता और राजनेता एम. राधा ने उन्हें गर्दन के पास गोली मारी थी। उन्हें कई महीनों के लिए अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। लोगों को उनकी अपार लोकप्रियता का एहसास इसी समय हुआ। हजारों लोग अस्पताल के बाहर इकट्ठे होकर उनके लिए घंटों प्रार्थना करते और उनके सुधार की प्रत्येक हलचल पर निगाह रखते। हालांकि वे बीमार थे, लेकिन एम.जी. रामचंद्रन ने आस नहीं छोड़ी और अस्पताल में भर्ती रहते हुए मद्रास विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया।

इस चुनाव में न सिर्फ एम.जी. रामचंद्रन जीते, बल्कि उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी से दोगुने से अधिक मत प्राप्त किए। उन्हें विधानसभा के इतिहास में सबसे अधिक वोट मिले। सन 1969 में अभिनेता और राजनेता सी.एन. अन्नादुरई की मृत्यु के बाद उन्हें DMK पार्टी में कोषाध्यक्ष बनाया गया। अन्नादुरई राजनीति के क्षेत्र में एम.जी. रामचंद्रन के गुरु भी थे। अन्नादुरई की मृत्यु के साथ ही DMK पार्टी में एम.जी. रामचंद्रन की मौजूदगी का अंत भी हो गया। अन्नादुरई की उपस्थिति में पार्टी के अधिकारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के पूर्व आरोप के बाद एम.जी. रामचंद्रन का DMK पार्टी प्रमुख एम. करुणानिधि से झगड़ा हो गया। करुणानिधि पहले से ही अपने बेटे को पार्टी की कमान सौंपना चाहते थे और इस बहस ने एम.जी. रामचंद्रन को पार्टी से बाहर करने का उनका रास्ता आसान कर दिया। एम.जी. रामचंद्रन ने DMK को छोड़कर सन 1972 में अपनी स्वयं की नई पार्टी अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की स्थापना की। अपने गुरु से प्रेरित होकर एम.जी. रामचंद्रन ने अपनी नवगठित पार्टी के प्रचार के लिए तमिल फिल्मों का इस्तेमाल भी किया।

एम.जी. रामचंद्रन की प्रसिद्धि ने तमिलनाडु के राजनीतिक जगत में पार्टी को उठाने और चमकाने में मदद की। एम.जी. रामचंद्रन राज्य का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचने वाले वह पहले फिल्म अभिनेता बने। एम.जी. रामचंद्रन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 30 जुलाई 1977 को विराजमान हुए, और सन 1987 तक मुख्यमंत्री रहे। DMK को फिर ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम’ कहा गया।

पुरस्कार

सन 1960 में एम.जी. रामचंद्रन को ‘पद्म श्री’ पुरस्कार के लिए नामित किया गया, लेकिन उन्होंने यह पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया। वे पारंपरिक हिंदी के बजाए अपनी मातृ भाषा तमिल में बोलना चाहते थे। इस पर उनके और सरकार के बीच असहमति थी।

  • एम.जी. रामचंद्रन ने सन 1972 में फिल्म “रिक्शाकरण” में अपनी भूमिका निभाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
  • उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय और विश्व विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि मिली।
  • तमिलनाडु समाज के बेहतरी में योगदान देने के लिए उन्हें सन 1988 में मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

मृत्यु

एम.जी. रामचंद्रन किडनी की परेशानी से बीमार थे। अक्टूबर 1984 में उनकी किडनी फेल होने की वजह से यू.एस के ब्रूकलेन में डाउनस्टेट मेडिकल सेंटर में भर्ती किया गया। इसी वर्ष उन्हें किडनी प्रत्यारोपण कराना पड़ा। सन 1987 में उन्होंने बीमारी से हार मान ली और 24 दिसंबर 1987 को एम.जी. रामचंद्रन की मृत्यु हो गई, जिसकी खबर फैलते ही तमिलनाडु में अशांति फैल गई।

सरकार और पुलिस अधिकारियों के लिए जनता के बीच भड़के उन्माद और भावुक तमिलों को रोकना मुश्किल साबित हो रहा था, लोग एक दूसरे से झगड़ा करके बड़ी संख्या में लड़ मर गए। उनकी मृत्यु के बाद ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम’ दो गुटों में बंट गई। एक तरफ उनकी पत्नी ‘जानकी रामचंद्रन’ थी और दूसरी तरफ ‘जयललिता’। उनका सथ्या फिल्म स्टूडियो अब एक महिला महाविद्यालय में तब्दील हो चुका है। मद्रास के टी नगर क्षेत्र में स्थित उनका घर वर्तमान में एक स्मारक घर है, जहां पर्यटक आते जाते हैं।