लालबहादुर शास्त्री की जीवनी | Lal Bahadur Shastri Biography in Hindi

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परिचय

लालबहादुर शास्त्री स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। वे महान साहस और इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति थे। भारत की स्वतन्त्रता के बाद लालबहादुर शास्त्री को उत्तरप्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविन्द बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मंत्रालय भी सैंपा गया। परिवहन मंत्री के कार्यकाल में लालबहादुर शास्त्री ने पहली बार महिला संवाहक (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मंत्री बनने के बाद उन्होंने लोगों की भीड़ को काबू में रखने के लिये लाठियों के स्थान पर पानी के फुब्बारों का प्रयोग शुरू कराया। सन. 1951 में पं जवाहरलाल नेहरु के मार्गदर्शन में लालबहादुर शास्त्री को अखिल भारतीय काँग्रेस समिति में शामिल किया गया।

पं जवाहरलाल नेहरु का स्वर्गवास 27 मई सन. 1964 को अपने प्रधानमंत्री शासनकाल में हो जाने के कारण 9 जून सन. 1964 में लालबहादुर शास्त्री को देश के प्रधानमंत्री पद पर मनोनीत किया गया।

लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री शासनकाल में सन. 1965 को भारत और पाकिस्तान में लड़ाई छिड गयी। इस युद्ध से 3 वर्ष पहले भारत चीन से युद्ध हार चुका था। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारा जबाब दिया और भारत ने जीत हासिल की। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं सोची थी।

जन्म व बचपन

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर सन. 1904 में मुगलसराय, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम मुंशी शारदा श्रीवास्तव था और इनकी माता का नाम राम दुलारी था। मुंशी शारदा श्रीवास्तव प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक थे और इन्हें सभी लोग ‘मुंशी जी’ कहकर बुलाते थे।

लालबहादुर शास्त्री अपने परिवार में सबसे छोटे थे, इसलिए परिवार वाले इन्हें बचपन में प्यार से नन्हें कहकर बुलाया करते थे। जब लालबहादुर शास्त्री (नन्हें) 18 माह के थे, तभी इनके पिता का देहांत हो गया और लालबहादुर शास्त्री की माता इन्हें लेकर अपने पिता हजारी लाल के घर मिर्जापुर चली गयीं।

विवाह

लालबहादुर शास्त्री का विवाह सन. 1928 में मिर्जापुर निवासी गणेश प्रसाद की बेटी ललिता से हुआ। इन्हें अपने पत्नी से 6 सन्तानें प्राप्त हुई, जिनमें 2 पुत्रियाँ कुसम व सुमन और 4 पुत्र हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक। इनके चार पुत्रो में से दो परलोक वासी हो गये और दो पुत्र राजनीति करने लगे। अनिल शास्त्री कांग्रेस पार्टी में एक वरिष्ठ नेता रहे और सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गये।

राजनैतिक जीवन

भारतीय स्वधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और आन्दोलन में लालबहादुर शास्त्री की पूर्ण रूप से साझेदारी रही और इसके परिणामस्वरूप इन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। स्वतन्त्रता संग्राम के आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, उनमें सन. 1921 का असहयोग आन्दोलन, सन. 1930 का ‘दांडी मार्च’ तथा सन. 1942 का ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन महत्वपूर्ण है। दूसरे विश्व-युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया और उसी वक्त गान्धी जी ने 8 अगस्त सन. 1942 की रात में ही मुंबई से अंग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का नारा देकर पुणे में स्थित आगा खान पैलेस चले गये। 9 अगस्त सन. 1942 को लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद में इस नारे में परिवर्तन कर इसे “मरो नही मारो” कर देश वासियों का आव्हान किया। इस आन्दोलन के समय लालबहादुर शास्त्री 11 दिन तक भूमिगत रहे और 19 अगस्त सन. 1942 को गिरफ्तार कर लिए गये।

प्रधानमंत्री पद

लालबहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री शासन काल यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो बहुत कठिनाईयों से गुजरा। दुश्मन देश पर आक्रमण करने की फ़िराक में थे और पूँजीपति भी हावी होना चाहते थे। पाकिस्तान ने भारत पर अचानक सन. 1965 में हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपातकाल बैठक बुला ली, जिसमें तीनों रक्षा अंगो के प्रमुख मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल थे। कुछ कारण प्रधानमंत्री उस बैठक में देरी से पहुंचे, उनके आते ही विचार-विमर्श शुरू हुआ। तीनों प्रमुखों ने उन्हें सारी स्थिति समझाते हुए पूछा सर क्या हुक्म है। लालबहादुर शास्त्री ने एक वाक्य में तुरंत उत्तर दिया “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है”।

लालबहादुर शास्त्री ने इस युद्ध में नेहरु के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम मार्गदर्शन किया और “जय जवान जय किसान” का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सभी देशवासी एक जुट हो गये।

मृत्यु

लालबहादुर शास्त्री रूस और अमेरिका के दबाव में शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए रूस की राजधानी ताशकंद गए। उसी रात 11 जनवरी सन. 1966 को रहस्यपूर्ण तरीके से लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु ही गई। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था और लालबहादुर शास्त्री का पोस्टमार्टम भी नहीं किया गया, क्योंकि उन्हें जहर दिया गया था। ये एक षड्यंत्र था। इस तरह लालबहादुर शास्त्री ने केवल 18 महीने तक भारत प्रधानमंत्री पद पर कार्य किया। लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद गुलजारीलाल नंदा को कार्यकालीन प्रधानमंत्री नियुक्त गया। इनकी अंत्येष्टि यमुना नदी के किनारे की गई एवं उस स्थान को “विजय घाट” का नाम दिया।