कूका विद्रोह कब हुआ था (Kooka Vidroh kab hua tha)?

कूका सिखो के नामधारी संप्रदाय के लोगों को भी कहते हैं। इनके सशस्त्र विद्रोह को ही कूका नाम दिया गया है । कूका विद्रोह राम सिंह जी के नेतृत्व में ही पूरा हुआ था । कूका के विद्रोहियों ने पूरे पंजाब को 22 जिलों में बांट कर अपनी एक अलग सरकार बना ली थी । कूका विद्रोहियों की संख्या सात लाख से भी ऊपर थी । इस विद्रोह मे लगभग 66 नामधारी सिख शहीद हुए थे । और इन नामधारी सिखों की कुर्बानी को जंग-ए-आज़ादी के नाम से ऐतिहासिक पन्नों पर दर्ज किया गया है और इसे कूका लहर नाम दिया गया है ।

 सतगुरु राम सिंह जी ने विश्व में पहली बार शान्ति और आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए इस  सहयोग और संवेदनशील आंदोलन की शुरुआत की थी । इस आन्दोलन की शुरुआत तब हुई जब अंग्रेजों ने धर्म के नाम पर लोगों को गुलामी और आपस में झगड़ने का अहसास कराया । और झगड़ा कराने के लिए पंजाब में जगह-जगह पर गौ वध करने हेतु बूचड़खानों को खोला गया । इसका सिखों ने बहुत विरोध किया और 100 नामधारी सिखों ने मिलकर 15 जून 1871 में अमृतसर, रायकोट, के सभी बूचड़खानों पर धावा बोलकर सभी गायों को मुक्त करवाया। इस आन्दोलन के चलते 5 अगस्त 1871 में 3 नामधारी सिखों ने रायकोट, 4 नामधारी सिखों ने 26 नबम्बर 1871 में अमृतसर और 2 नामधारी सिखों ने लुधियाना में 26 नबम्बर 1871 में वट वृक्ष से बांध कर फांसी देकर शहीद कर दिया था ।

कूका विद्रोहियों का उद्देश्य –

कूका सिखों का उद्देश्य था धर्म के प्रति प्रचलित बुराइयों को खत्म करना । जैसे कि मांस, मदिरा, भेदभाव और अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन करने से रोकना, महिलाओं में पर्दा प्रथा दूर करने हेतु और अंतरजातीय विवाह के प्रोत्साहन हेतु । परन्तु ये आन्दोलन धार्मिक आंदोलन और राजनीतिक आंदोलन मे बदल गया था ।और इस विद्रोह से अंग्रेजों को बहुत चिंता होने लगी और वो इस आन्दोलन को खत्म करने का प्रयास करने लगें । सन् 1882 में आंदोलन के प्रमुख नेता राम सिंह को रंगून निर्वासित कर दिया गया था जिसके बाद उनकी मृत्यु 1885 में हो गयी थी । और बिना किसी नेतृत्वकर्ता के यह आंदोलन कमजोर पड़ गया और धीरे-धीरे यह आन्दोलन खत्म होता गया ।

17-18 जनवरी 1857 को मोलेरकोटला की जमीन पर अंग्रेजों ने 66 नामधारी सिखों को तोपों से उड़ा दिया गया था । देश-विदेश से शहीदों को श्रद्धांजलि के लिए मालेरकोटला में पहुंकर वित्त मंत्री ढींडसा ने सभी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि सच्चाई और ईमानदारी पर आधारित कुका आन्दोलन की आजादी का यह ऐसा पहला आंदोलन है जिसमें शांतिपूर्ण तरीके से अंग्रेजों की जड़ों को हिलाकर रख दिया था । और इस आन्दोलन के दौरान हुई कुर्बानी ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन, गदर लहर तथा अकाली लहर की सबसे बड़ी प्राप्ति दी । और इन्हीं प्रयासों की वजह से भारत आजाद हुआ। सतगुरु उदय सिंह की छत्र छाया तथा माता चंद कौर के सामने वित्त मंत्री ढींडसा ने कहा था कि आज भले ही मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और राज्यसभा के सदस्य सुखदेव सिंह ढींडसा आज हमारे साथ नहीं हैं । परंतु उन्होंने कहा कि सतगुरु और संगतों की स्मारक स्थल और जो भी शहीदों के बाबत की मांगों को पूरा करने का आश्वासन भी दिया गया । और जो भी मांगों से संबंधित नामधारी ट्रस्ट के ट्रस्टीयों के द्वारा एक मांग पत्र भी परमिंदर सिंह ढींडसा के द्वारा पेश किया गया था ।

Kooka Vidroh kab hua tha I कूका विद्रोह कब हुआ था

इस आन्दोलन के बाद सिख पुरूषों की तरह ही स्त्रियों को भी अमृत छका कर सिखी प्रदान की गई । इसी के साथ बिना ठाका , बारात , मिलनी , डोली , शगुन और बिना दहेथ के सवा रुपए लेकर विवाह करने की एक नयी रीति का आरम्भ किया । और पहली बार 3 जून 1863 को गांव खोटे जिले में फिरोजपुर में 6 अंतर्जातीय विवाह कराकर समाज में एक नई नीति की शुरुआत की गई । सतगुरु नाम सिंह के प्रचार के लिए प्रेरणा से थोड़े समय में ही लाखों लोगों नामधारी सिख बने जो निर्भय और निशंक होकर अंग्रेजी साम्राज्य के विरूद्ध कूका मारने लगे जिसकी वजह से इतिहास में इस आंदोलन का नाम कूका पड़ गया ।

मालेर कोटला का खूनी कांड –

मलौद में एक हलकी मुठभेड़ हुई जिसके 15 जनवरी 1872 में हीरा सिंह और लहिणा सिंह के जत्थे पर मालेर कोटला ने धावा बोल दिया था । मालेर कोटला के परेड ग्राउंड में अंग्रेजी रियासत के द्वारा नौ तोपों से सात बार हमला किया जिसमें 49 नामधारी सिखों की आजादी के लिए हजारों टुकड़े कर दिए गए थे ।