ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की जीवनी | Khan Abdul Ghaffar Khan Biography in Hindi

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परिचय

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को लोग ‘सीमान्त गांधी’, ‘बच्चा खाँ’ और ‘बादशाह खान’ के नाम से भी जानते हैं। वे एक भारतीय राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें गाँधी जी की ही तरह उनके अहिंसात्मक आन्दोलनों के लिए जाना जाता है। वे गाँधी जी के बहुत अच्छे दोस्त थे और ब्रिटिश इंडिया में उन्हें लोग ‘फ्रंटियर गाँधी’ के उपनाम से भी संबोधित किया करते थे।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने ‘खुदाई खिदमतगार’ नाम का एक सामाजिक संगठन बनाया और उस संगठन की सफलता ने अंग्रेजी हुकुमत को परेशान कर रख दिया था। उन्होंने सरहद पर रहने वाले पठानों को अहिंसा का मार्ग दिखाया, जिन्हें इतिहास में हमेशा लड़ने के लिए जाना जाता था।

नमक आन्दोलन के चलते 23 अप्रैल 1930 को ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसकी वजह से खुदाई खिदमतगारों ने पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में एक जुलूस निकाला। तब अंग्रेजी हुकूमत ने उन लोगों पर गोलियां चलाने का हुक्म दे दिया और कुछ ही समय में 200 से 250 लोग मारे गए, मगर प्रति हिंसा नहीं हुई। इसकी वजह ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का नेतृत्व था। वे हमेशा मुस्लिम लीग द्वारा देश के बंटवारे के प्रस्ताव के खिलाफ खड़े रहे और अंत में जब कांग्रेस ने देश के बंटवारे के प्रस्ताव को मान लिया, तब वे बहुत निराश हुए और कहा कि ‘आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फ़ेंक दिया’।

बंटवारे के बाद ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने पाकिस्तान में रहने का फैसला लिया और पाकिस्तान के अंदर ही ‘पख्तूनिस्तान’ नाम की एक स्वायत्त प्रशासनिक इकाई की मांग करते रहे। पाकिस्तानी सरकार उन पर हमेशा शक करती रही, जिस वजह से उन्हें पाकिस्तान में कई बार जेल में जीवन बिताना पड़ा।

शुरूआती जीवन

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म 6 फरवरी 1890 को ब्रिटिश इंडिया में पेशावर घाटी के ‘उत्मान जई’ में हुआ था। वे एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता बहराम इलाके के एक बड़े ज़मींदार थे। स्थानीय पठानों के खिलाफ जाकर उनके पिता ने उन्हें और उनके भाई को अंग्रेजों द्वारा चलाए जाते ‘मिशन स्कूल’ में पढ़ाया।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान पढ़ाई में काफी अच्छे थे, जब वे हाई स्कूल के आखिरी साल में थे, तब उन्हें अंग्रेजी सरकार में पश्तून सैनिकों के एक विशेष दस्ते में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था, मगर उन्होंने इस प्रस्ताव को मना कर दिया, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि विशेष दस्ते के अधिकारियों को भी उनके देश में दूसरी श्रेणी का नागरिक समझा जाता था।

उसके बाद आगे की पढाई ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से की और फिर वे अपने भाई की तरह लंदन जाकर पढ़ना चाहते थे, मगर उनकी माँ इसके खिलाफ थी। इस वजह से उन्होंने लंदन जाने का इरादा छोड़ दिया और अपने पिता की जमीन पर काम करना शुरू कर दिया।

सन् 1910 में जब वे 20 साल के थे, उन्होंने अपने होमटाउन ‘उत्मान जई’ में एक स्कूल की स्थापना की, जो काफी कामयाब साबित हुआ। सन् 1915 में अंग्रेजी सरकार ने उनके स्कूल पर प्रतिबंध लगा दिया था। सन् 1915 से 1918 तक उन्होंने लगभग 500 गांवों की यात्रा की, ताकि वे पश्तूनों को जागृत कर सके। इसके बाद ही उन्हें ‘बादशाह खान’ का नाम मिला।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान ने अंग्रेजों के खिलाफ लगभग सारे विद्रोहों को नाकामयाब होते देखा, इस वजह से उन्हें लगा कि सामाजिक चेतना के जरिये ही पश्तूनों में बदलाव लाया जा सकता है। उसके बाद इन्होंने एक के बाद एक कई संगठनों को स्थापित किया। जिनमें से एक था, नवम्बर 1929 को स्थापित किया गया ‘खुदाई खिदमतगार’।

कांग्रेस के साथ

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और गाँधी जी के बीच आध्यात्मिक स्तर की दोस्ती थी। वे दोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे और दोनों ने सन् 1947 तक साथ में काम किया। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का संगठन ‘खुदाई खिदमतगार’ और कांग्रेस दोनों स्वाधीनता की लड़ाई में एक दूसरे का साथ दे रही थे। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान खुद कांग्रेस के एक सदस्य बन गये थे। कई बार जब कांग्रेस गाँधी जी के साथ नहीं होती थी तब ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान उनके साथ खड़े होते थे। वे कई सालों तक कांग्रेस में कार्य समिति के सदस्य बने रहे और उन्होंने अध्यक्ष बनने से भी इंकार कर दिया था।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान अहिंसा के काफी बड़े समर्थक थे। उन्हें एक लड़ाकू समाज से भी बहुत सम्मान और इज्जत मिली। वे अपने पूरे जीवन भर अहिंसा के रास्ते पर चलते रहे। उनके इन्हीं सिद्धांतों की वजह से उन्हें भारत में ‘फ्रंटियर गाँधी’ के नाम से भी जाना जाता है।

देश का बंटवारा

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे, इस वजह से वे हमेशा ही देश के बंटवारे के खिलाफ खड़े रहे, जिसकी वजह से लोगों ने उन्हें मुस्लिम विरोधी भी कहा। सन् 1946 में जब वे पेशावर में थे, तब उन पर एक जानलेवा हमला भी हुआ था। कांग्रेस के भारत का बंटवारा न रोक पाने पर ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान बहुत हताश हुए। उन्होंने गाँधी जी सहित कांग्रेस के बाकी नेताओ से कहा- ‘आप लोगों ने हमे भेड़ियों के सामने फेंक दिया।’

सन् 1947 में जब ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ को पाकिस्तान में शामिल करने के मामले में मत संग्रह कराया गया, तब कांग्रेस और ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान इसके खिलाफ थे और उन्होंने मत संग्रह में हिस्सा लेने से मना कर दिया। जिसकी वजह से ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ ने बहुमत से जीत हासिल की।

पाकिस्तान में जीवन

वैसे तो ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान देश के बंटवारे से सहमत नहीं थे, मगर बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान में रहने का फैसला किया। उन्होंने पाकिस्तान के प्रति अपनी निष्ठा भी दखाई, मगर पाकिस्तानी हुकूमत को हमेशा ही उन पर शक रहा। हालात ऐसे हुए कि इस महान देशभक्त और स्वतंत्राता सेनानी की इच्छाओं को पाकिस्तान की सरकार ने सुनने से मना कर दिया और सरकार ने ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और उनके समर्थकों को पाकिस्तान के विकास के लिए खतरा समझा।

पाकिस्तान में कई सरकारों ने उन्हें या तो घर में नजरबन्द रखा या फिर उन्हें जेल में रखा। धीरे-धीरे उनक स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, जिसकी वजह से वे अपना इलाज करने के लिए इंग्लैंड चले गये और फिर वहाँ से वे अफगानिस्तान चले गये। लगभग 8 सालों तक देश के बाहर जीवन बिताने के बाद 1972 में वे वापस आ गये और बेनजीर भुट्टो सरकार ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया।

सन् 1987 में भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

मृत्यु

सन् 1988 में पेशावर में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का देहांत हो गया था। उनकी इच्छा के हिसाब से उनके देहांत के बाद उन्हें उनके जलालाबाद वाले घर में दफनाया गया था। उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए थे।