5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग | Kedarnath Jyotirlinga in Hindi

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केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। केदारनाथ मंदिर एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। हिमालय पर्वत की गोद में बसा यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिगों में सम्मलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु होने के कारण यह मंदिर अप्रैल से नवंबर मास के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। इसका निर्माण पाण्डव वंश के राजा जनमेजय ने करवाया था तथा इस मंदिर का जीर्णोद्धार  आदिगुरु शंकराचार्य ने करवाया था। यहाँ स्थित स्वंयभू शिवलिंग अति प्राचीन है। 16 जून सन. 2013 के दौरान उत्तराखण्ड में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिरकर बाढ़ में बह गयीं। इस ऐतिहासिक मंदिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद ही सुरक्षित रहा, लेकिन मंदिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का क्षेत्र पूरी तरह से तबाह हो गया।

निर्माण

मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। यह मंदिर 6 फुट ऊँचे एक चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मंदिर के मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों तरफ परिक्रमा मार्ग है। बाहर प्रांगण में नंदी विराजमान हैं।

इतिहास

इस मंदिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन 1000 वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मंदिर 400 वर्ष तक बर्फ में दबा रहा था, लेकिन फिर भी इस मंदिर को कोई भी हानि नहीं हुई। सन. 1076 से सन. 1099 तक शासन करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर को बनवाया था, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार इस मंदिर को 8वीं शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने बनवाया था।

श्री केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी का लेप किया जाता है। उसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है। इस समय यात्रीगण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं और शाम के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विभिन्न प्रकार के चित्ताकर्षक तरीके से सजाया जाता है। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

शिव पुराण में वर्णित कथानुसार हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदैव निवास के लिए वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर स्थित है।

महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसलिए वे भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन भगवान शिव उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शिव के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहाँ पर नहीं मिले। पांडव शिवजी को खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शिव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहाँ से अंतध्र्यान होकर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार भी पहुंच गए। भगवान शिव ने तब एक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शिवजी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शिव पांडवों की भक्ति व दृढ संकल्प को देखकर प्रसन्न हो गए।

भगवान शिवजी ने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहाँ पर पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।

दर्शन का समय

केदारनाथ मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर को 3 बजे तक खुलता है, शाम को 5 बजे पुनः खुलता है और रात्रि को 8:30 बजे बंद हो जाता है। शीतकालीन समय में केदारघाटी बर्फ़ से ढँक जाती है। इसलिए यह मंदिर सामान्यत: नवंबर माह की 15 तारीख से पूर्व बंद हो जाता है और 6 माह पश्चात 14 अप्रैल के बाद खुलता है। ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को “उखीमठ” में लाया जाता है।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हे। यह ज्योतिर्लिंग समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इसका वर्णन सकन्द पुराण और शिव पुराण में भी मिलता है। जिस प्रकार का महत्व भगवान शिव ने कैलाश को दिया है, ठीक उसी प्रकार का महत्व केदारनाथ को भी दिया है। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार हर रोज प्रातःकाल और संध्या के समय इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम जपने से या दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप या कष्ट दूर हो जाते हैं।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के संबंध में श्लोक निम्नलिखित है-

श्लोक- 
हिमाद्रीपार्श्वे च समुल्लसंतम् सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैरू।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै: केदारसंज्ञं शिवमीशमीडे।।

ज्योतिर्लिंगों की तालिका

क्रम. संख्या ज्योतिर्लिंग का नाम ज्योतिर्लिंग का स्थान ज्योतिर्लिंग का संक्षिप्त वर्णन
1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे 17 बार नष्ट किया। सबसे अधिक नुकसान महमूद गजनवी के हमले से हुआ था। हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर, कुर्नूल, आन्ध्र प्रदेश मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है।
3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग क्षिप्रा नदी के तट पर, महाकाल, उज्जैन, मध्य प्रदेश महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आकार औंकार अर्थात ऊं जैसा है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है।
5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर, केदारनाथ, उत्तराखंड केदारनाथ ज्योतिर्लिंग समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है।
6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मुंबई से पूर्व दिशा में और पुणे से उत्तर दिशा में भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर, भीमाशंकर, महाराष्ट्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को ‘मोटेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान शिव ने भीमासुर राक्षस का वध किया था।
7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा तट पर, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश काशी विश्वनाथ में भगवान शिव का वास है, जो व्‍यक्ति इस पवित्र स्‍थान पर मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है, वह इस संसार के क्लेश से मुक्त हो जाता है।
8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे, नासिक, महाराष्ट्र ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में रहना पड़ा।
9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर, झारखंड लंकापति रावण ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर एक शिवलिंग प्राप्त किया, जिसे वह लंका में स्थापित करना चाहता था, परंतु ईश्वर की लीला से वह शिवलिंग वैद्यनाथ धाम में ‍ही स्थापित हो गया।
10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दारुकावन, द्वारका, गुजरात भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। धार्मिक शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता माने गए हैं, नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है।
11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम, रामनाड, तमिलनाडु इस ज्योतिर्लिंग के विषय में मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। यहां पर श्रीराम ने बालू का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की और रावण पर विजय हेतु भगवान शिव से वरदान मांगा।
12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग एल्लोरा के पास, औरंगाबाद, महाराष्ट्र ऐसी मान्यता है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से वंशवृद्धि होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका निर्माण अहिल्‍याबाई होल्‍कर के द्वारा करवाया गया था।