7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग | Kashi Vishwanath Jyotirlinga in Hindi

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काशी विश्वनाथ मंदिर प्रसिद्ध हिन्दू मंदिरों में से एक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। काशी विश्वनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिले में स्थित है। यह मंदिर पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर बना हुआ है। काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर के प्रमुख देवता विश्वनाथ और विश्वेश्वरा के नाम से जाने जाते हैं, जिसका अर्थ ब्रह्माण्ड के शासक से होता है। वाराणसी शहर को काशी के नाम से भी जाना जाता है, इसलिए यह मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ वाम रूप में स्थापित विश्वनाथ शक्ति की देवी माँ भगवती के साथ विराजते हैं, यह अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है। इस मंदिर में आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास जैसे बड़े महापुरुष दर्शन करने आ चुके हैं।

मंदिर के वर्तमान आकार को इंदौर की मराठा शासक अहिल्याबाई होलकर ने सन. 1780 में बनवाया था। मंदिर का शिखर सोने का है, जिसे महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा बनवाया गया था। हिंदू धर्म में काशी विश्वनाथ मंदिर का अत्यधिक महत्व है। कहते हैं काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है।

मंदिर की संरचना 

मंदिर परिसर में कई छोटे-छोटे मंदिरों का समूह है, जिसे विश्वनाथ गली के नाम से जाना जाता है। ये गंगा नदी के किनारे स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अन्दर एक मंडप व गर्भगृह उपस्थित है। गर्भगृह के अन्दर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग उपस्थित है। यह शिवलिंग काले पत्थर से बना हुआ है। विश्वनाथ मंदिर का एक चौकोर आँगन है, जिसके चारों ओर मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों में काल भैरव, अविमुख्तेश्वर, विष्णु, गणेश, सनीश्वर, विरूपाक्ष और विरूपाक्ष गौरी हैं। मंदिर के अन्दर एक कुआँ स्थित है, जो “ज्ञानवापी” कुआँ के नाम से जाना जाता है। ज्ञानवापी कुआ मंदिर के उत्तरी क्षेत्र  में स्थित है।

मंदिर की संरचना को तीन भागों में बाँटा गया है। पहले भाग में भगवान शिव व विश्वनाथ का शिखर है, दूसरे भाग में सुनहरा गुंबद है और तीसरे भाग में विश्वनाथ के शीर्ष पर स्थित सुनहरा शिखर है, जिसके उपर एक त्रिशूल व ध्वज है। मंदिर में कुल तीन गुंबद हैं, जिन्हें पूर्ण रूप से सोने से बनाया गया है।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग के सम्बंध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक प्राचीन कथा के अनुसार जब भगवान शिव पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत पर रहने लगे, तब पार्वती जी इस बात से नाराज रहने लगीं। पार्वती ने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। अपनी प्रिय की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहे। काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहाँ ज्योतिर्लिग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिग भगवान शिव का निवास स्थान बन गया।

माना यह भी जाता है कि काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या से प्रकट नही हुए, बल्कि यहाँ पर स्वंय निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए।

महिमा और मुख्य मंदिर 

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहाँ प्राणत्याग करने से मुक्ति मिलती है। भगवान भोलेनाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मन्त्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिए काशीपुरी ही एकमात्र गति का स्थान है। विश्वेश्वर के काशी में पांच प्रमुख तीर्थ हैं-

  1. दशाश्वेमघ
  2. लोलार्ककुण्ड
  3. बिंदुमाधव
  4. केशव
  5. मणिकर्णिका

ये पांच प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जिसके कारण इसे “अविमुक्त क्षेत्र” कहा जाता है। काशी के उत्तर में ओंकारखण्ड, दक्षिण में केदारखण्ड मध्य में विश्वेश्वरखण्ड में ही बाबा विश्वनाथ का प्रसिद्ध हैं।

श्री काशी विश्वनाथजी के मंदिर में पाँच आरतियाँ होती हैं:

1. मंगला आरती: 3.00 से 4.00 (सुबह)
2. भोग आरती : 11.15 से 12.20 (दिन)
3. संध्या आरती : 7.00 से 8.15 (शाम)
4. श्रृंगार आरती : 9.00 से 10.15 (रात्रि)
5. शयन आरती : 10.30 से 11.00 (रात्रि)

सुरक्षा के द्रष्टिकोण से मंदिर में मोबाइल फ़ोन, कैमरा, बेल्ट और किसी भी इलेक्ट्रोनिक धातु की सामग्री के साथ प्रवेश करना मना है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

इस मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण में काशी खण्ड के नाम से किया गया है। वास्तविक विश्वनाथ मंदिर को सन. 1194 में कुतबुउद्दीन ऐबक ने ध्वस्त किया था, जब उसने मोहम्मद गौरी का कमांडर रहते हुए कन्नौज के राजा को पराजित किया था। इसके बाद गुजराती व्यापारी ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुमिश (1211-1266) के शासनकाल में इसका पुनर्निर्माण करवाया था, लेकिन फिर दोबारा हुसैन शाह शर्की (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) के शासनकाल में इसे ध्वस्त किया गया।

इसके बाद अकबर के शासनकाल में राजा मान सिंह ने पुनः मंदिर का निर्माण करवाया, लेकिन अकबर के हिन्दुओं का विरोध करने की वजह से उन्हें मुग़ल परिवार में शादी करनी पड़ी थी। इसके बाद सन. 1585 में राजा टोडरमल ने अकबर से पैसे लेकर इसके वास्तविक रूप में पुनः इसका निर्माण करवाया था।

सन. 1669 में औरंगजेब ने इस मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया था और इस जगह पर उसने ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई। तत्कालीन मंदिर में आज भी मस्जिद की नींव के अवशेष दिखाई देते हैं, जिनमें स्तम्भ और मस्जिद के पीछे का भाग सम्मलित है।

सन. 1742 में मराठा शासक मल्हार राव होलकर ने मस्जिद को गिराने की योजना बनाई और उसी जगह पर पुनः विश्वेश्वर मंदिर को स्थापित करने की ठान ली। उनकी यह योजना पूरी तरह से सफल नही हो सकी क्योंकि बीच में ही लखनऊ के नवाब ने इसमें हस्तक्षेप कर दिया था, जो उस समय उस क्षेत्र का नियंत्रण करता था। सन. 1750 के लगभग जयपुर के महाराज ने मंदिर के आस-पास की जगह का सर्वेक्षण किया और उस समय पर पुनः मंदिर बनवाने के इरादे से पूरी जमीन खरीद ली थी, लेकिन अंत में उनकी यह योजना पूरी तरह से सफल नही हो पायी थी।

इसके बाद सन. 1780 में मल्हार होल्कर की पुत्रबधु अहिल्याबाई होल्कर ने सफलतापूर्वक मस्जिद को हटवाकर वहाँ पुराने विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। सन. 1841 में नागपुर के भोसलों ने मंदिर के लिए चाँदी का दान दिया। सन. 1859 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद के निर्माण के लिए 1 टन सोना दान में दिया था।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हे। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार हर रोज प्रातःकाल और संध्या के समय इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम जपने से या दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप या कष्ट दूर हो जाते हैं। काशी विश्वनाथ में भगवान शिव का वास है, जो व्‍यक्ति इस पवित्र स्‍थान पर मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है, वह इस संसार के क्लेश से मुक्त हो जाता है।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के संबंध में श्लोक निम्नलिखित है-

श्लोक-
सानंदमानंदवने वसंतमानंदकंद हतपापवृंदम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथम्, श्री विश्वनाथं शरणं प्रपद्ये।।

ज्योतिर्लिंगों की तालिका

क्रम. संख्या ज्योतिर्लिंग का नाम ज्योतिर्लिंग का स्थान ज्योतिर्लिंग का संक्षिप्त वर्णन
1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग प्रभास पाटन, सौराष्ट्र, गुजरात विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे 17 बार नष्ट किया। सबसे अधिक नुकसान महमूद गजनवी के हमले से हुआ था। हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया है।
2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर, कुर्नूल, आन्ध्र प्रदेश मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहा जाता है।
3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग क्षिप्रा नदी के तट पर, महाकाल, उज्जैन, मध्य प्रदेश महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है।
4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर, मध्य प्रदेश ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का आकार औंकार अर्थात ऊं जैसा है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर के नाम से जाना जाता है।
5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर, केदारनाथ, उत्तराखंड केदारनाथ ज्योतिर्लिंग समुद्र तल से लगभग 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है।
6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मुंबई से पूर्व दिशा में और पुणे से उत्तर दिशा में भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर, भीमाशंकर, महाराष्ट्र भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को ‘मोटेश्वर महादेव’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर भगवान शिव ने भीमासुर राक्षस का वध किया था।
7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा तट पर, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश काशी विश्वनाथ में भगवान शिव का वास है, जो व्‍यक्ति इस पवित्र स्‍थान पर मृत्‍यु को प्राप्‍त होता है, वह इस संसार के क्लेश से मुक्त हो जाता है।
8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे, नासिक, महाराष्ट्र ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में रहना पड़ा।
9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर, झारखंड लंकापति रावण ने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर एक शिवलिंग प्राप्त किया, जिसे वह लंका में स्थापित करना चाहता था, परंतु ईश्वर की लीला से वह शिवलिंग वैद्यनाथ धाम में ‍ही स्थापित हो गया।
10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दारुकावन, द्वारका, गुजरात भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। धार्मिक शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता माने गए हैं, नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है।
11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम, रामनाड, तमिलनाडु इस ज्योतिर्लिंग के विषय में मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। यहां पर श्रीराम ने बालू का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना की और रावण पर विजय हेतु भगवान शिव से वरदान मांगा।
12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग एल्लोरा के पास, औरंगाबाद, महाराष्ट्र ऐसी मान्यता है कि घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से वंशवृद्धि होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका निर्माण अहिल्‍याबाई होल्‍कर के द्वारा करवाया गया था।