कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe in Hindi

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बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।

अर्थ- जब में इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

अर्थ- संत कबीर दास जी कहते हैं कि बड़ी-बड़ी किताबें पढ़कर कितने लोग दुनियाँ से चले गये, लेकिन सभी विद्वान नहीं बन सके। कोई भी व्यक्ति प्यार को अच्छी तरह समझ ले तो वही दुनियाँ का सबसे बड़ा ज्ञानी होगा।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।

अर्थ- धीरज ही जीवन का आधार है। जीवन के हर दौर में धीरज का होना बहुत जरूरी है। जैसे कोई आम के पेड़ को हर रोज बहुत सारे पानी से सींचे और उसके नीचे आम आने की राह में बैठा रहे तो भी आम ऋतु में ही आयेंगे। वैसे ही धीरज रखने से सब काम हो जाते हैं।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

अर्थ- किसी से उसकी जाति पूछना व्यर्थ है, उसका ज्ञान और व्यवहार ही अनमोल है। जैसे किसी तलवार का अपना महत्व है पर म्यान का कोई महत्व नहीं, म्यान सिर्फ उसका ऊपरी आवरण (खौल) है।

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

अर्थ- जिसे बोल का महत्व पता है वह बिना शब्दों को तौले नहीं बोलता। कमान से छुटा तीर और मुंह से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते। इसलिए इन्हें बिना सोचे-समझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह।।

अर्थ- इस दुनियाँ में जिस व्यक्ति को पाने की इच्छा है, उसे उस चीज को पाने की ही चिंता है, मिल जाने पर उसे खो देने की चिंता है। वो हर पल बैचेन है, जिसके पास खोने को कुछ है। इस दुनियाँ में वही खुश है जिसके पास कुछ नहीं, उसे खोने का डर नहीं, उसे पाने की चिंता नहीं, ऐसा व्यक्ति ही इस दुनियाँ का राजा है।

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।।

अर्थ- कबीर दास जी ने बड़ी सहजता से कुम्हार और उसकी कला को लेकर कहा है। मिट्टी एक दिन कुम्हार से कहती है कि तू क्या मुझे कूट-कूट कर आकार दे रहा है, एक दिन आएगा जब तू खुद मुझ में मिलकर निराकार हो जायेगा। अर्थात कितना भी कर्मकांड कर लो एक दिन मिट्टी में ही समाना है।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर।।

अर्थ- लोग सदियों तक मन की शांति के लिए माला हाथ में लेकर ईश्वर की भक्ति करते हैं लेकिन फिर भी उनका मन शांत नहीं होता। इसलिए कबीर दास जी कहते हैं- हे मनुष्य इस माला को जप कर मन की शांति ढूंढने के बजाय तू दो पल अपने मन को टटौल, उसकी सुन। देख तुझे अपने आप ही शांति महसूस होने लगेगी।

तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय।।

अर्थ- जैसे धरती पर पड़ा तिनका आपको कभी कोई कष्ट नहीं पहुँचाता लेकिन जब वही तिनका उड़कर आँख में चला जाए तो बहुत कष्टदायी हो जाता है। अर्थात जीवन के क्षेत्र में कभी किसी को तुच्छ अथवा कमजोर समझने की गलती ना करें, इस क्षेत्र में कब कौन क्या कर जाये कहा नहीं जा सकता।

गुरू गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरू आपनो, गोविंद दियो मिलाय।।

अर्थ- कबीर दास जी कहते हैं कि जब गुरू और स्वयं ईश्वर एक साथ हो, तब किसका पहले अभिवादन करें अर्थात दोनों में से किसे पहला स्थान दें? इस पर कबीर कहते हैं कि जिस गुरू ने ईश्वर का महत्व सिखाया है, जिसने ईश्वर से मिलाया है वही श्रेष्ठ है, क्योंकि उसने ही तुम्हें ईश्वर क्या है बताया है। उसने ही तुम्हें इस लायक बनाया है कि आज तुम ईश्वर के सामने खड़े हो।

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोई।
जो दुःख में सुमिरन करै, तो दुःख काहे होई।।

अर्थ- जब मनुष्य के जीवन में सुख आता है, तब वो ईश्वर को याद नहीं करता लेकिन जैसे ही दुःख आता है वो दौड़ा-दौड़ा ईश्वर के चरणों में आ जाता है। अगर मनुष्य सुख में भी प्रभु का चिंतन करे तो उसे कभी दुःख की प्राप्ति नहीं होगी।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।

अर्थ- आप इस दुनियाँ में जो भी करना चाहते हो वो धीरे-धीरे होता है, अर्थात कर्म के बाद फल क्षणों में नहीं मिलता। जैसे एक माली किसी पौधे को जब तक सौ घड़े पानी नहीं देता तब तक ऋतु में फल नहीं आता।

साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय।।

अर्थ- अर्थात प्रभु इतनी कृपा करना कि जिसमें मेरा परिवार सुखी रहे और न मैं भूखा रहू, न ही कोई सदाचारी मनुष्य भूखा सोये। यहाँ कबीर दास जी ने परिवार में संसार की इच्छा रखी है।

कबीरा ते नर अँध है, गुरू को कहते और।
हरि रूठे गुरू ठौर है, गुरू रूठे नहीं ठौर।।

अर्थ- कबीर दास जी ने इस दोहे में जीवन में गुरू के महत्व को बताया है। मनुष्य तो अँधा है, सब कुछ गुरू ही बताता है। अगर ईश्वर नाराज हो जाए तो गुरू एक डोर है जो ईश्वर से मिला देती है, लेकिन अगर गुरू ही नाराज हो जाए तो कोई डोर नहीं होती जो सहारा दे सके।

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।।

अर्थ- इस दोहे में कबीर दास जी कहते है कि मनुष्य की इच्छा, उसका एश्वर्य अर्थात धन सब कुछ नष्ट होता है। यहाँ तक कि शरीर भी नष्ट हो जाता है, लेकिन फिर भी आशा और भोग की आस नहीं मरती।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।

अर्थ- कबीर दास जी ने बहुत ही सुन्दर शब्द कहे हैं कि यूँही बड़ा कद होने से कुछ नहीं होता क्योंकि बड़ा तो खजूर का पेड़ भी है, लेकिन उसकी छाया राहगीर को दो पल का सुकून नहीं दे सकती है और उसके फल इतने दूर हैं कि उन तक आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता। इसलिए कबीर दास जी कहते हैं ऐसे बड़े होने का कोई फायदा नहीं, दिल से और कर्मों से जो बड़ा होता है वही सच्चा बड़प्पन कहलाता है।

जिन खोजा तिन पाइयाए गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डराए रहा किनारे बैठ।।

अर्थ- जो प्रयत्न करते हैंए वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं। जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है, लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

कबीरा खड़ा बाज़ार मेंए मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्तीएन काहू से बैर।।

अर्थ- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो।

रात गंवाई सोय केए दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल साए कोड़ी बदले जाय ॥

अर्थ- रात नींद में नष्ट कर दी, सोते रहे। दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली। यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया। कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचाघ् एक कौड़ी!

हिन्दू कहें मोहि राम पियाराए तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी.लड़ी मुएए मरम न कोउ जाना।।

अर्थ- कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क ;मुस्लिमद्ध को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़.लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचेए तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।