जयानन्द भारती की जीवनी | Jayanand Bharti Biography in Hindi

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परिचय

जयानन्द भारती भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं सामाजिक चेतना के अग्रदूत थे। उन्होंने ‘डोला-पालकी आन्दोलन’ चलाया तथा आर्य समाज के विचारों को गढ़वाल में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रारंभिक जीवन

जयानन्द भारती का जन्म पौड़ी जनपद के अरकंडाई गांव के शिल्पकार परिवार में 17 अक्टूबर 1881 को हुआ। रोजगार की तलाश में भटकते हुए उनका परिचय मुसलमान और ईसाई धर्म के लोगों से हुआ। उन्हें मुसलमानों और ईसाईयों द्वारा धर्म-परिवर्तन के लिए अनेक प्रलोभन दिये गये, किन्तु उन्होंने प्रलोभनों को ठुकराकर स्पष्ट कहा- ”मैं हिन्दू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म स्वीकार नहीं कर सकता हूँ। मेरे इस अटल विश्वास के आगे दुनिया का बड़े से बड़ा सम्मान एवं वैभव भी तुच्छ है।”

जयानन्द भारती समाज में व्याप्त अंधविश्वास एवं बुराइयों से बहुत दुःखी थे। इन्हीं समस्याओं के समाधान तथा वेदों के अध्ययन की इच्छा से उन्होंने गुरूकुल-कांगड़ी के संस्थापक ‘स्वामी श्रद्धानन्द’ से भेंट की। आर्य समाज का प्रचार-प्रसार करते हुए उन्होंने अपना धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने वाले कई शिल्पकारों को शुध्दिकरण द्वारा पुनः हिन्दू धर्म में सम्मिलित किया।

‘डोला-पालकी आन्दोलन’

सामाजिक चेतना की एक और कड़ी में ‘डोला-पालकी आन्दोलन’ का श्रेय जयानन्द भारती को जाता है। यह वह आन्दोलन था, जिसमें शिल्पकारों के दूल्हे-दुल्हनों को ‘डोला-पालकी’ में बैठने नहीं दिया जाता था। लगभग 20 वर्षों तक चलने वाले इस आन्दोलन के समाधान के लिए उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसका निर्णय शिल्पकारों के पक्ष में हुआ।

जयानन्द भारती के स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। 28 अगस्त 1930 को उन्होंने राजकीय विद्यालय जयहरीखाल की इमारत पर तिरंगा झंडा फहराकर ब्रिटिश शासन के विरोध में भाषण देकर छात्रों को स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए प्रेरित किया। 30 अगस्त 1930 को लैंसडाउन न्यायालय द्वारा उन्हे 3 माह का कठोर कारावास दिया गया। धारा 144 का उल्लंघन करते हुए, जब उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध दुगड्डा में जनसभा की तो इन्हें 6 माह के कठोर कारावास की सजा हुई।

‘ऐतिहासिक पौड़ी कांड’

सविनय अवज्ञा आन्दोनल के दूसरे दौर से पहले कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका था। नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के कारण पौड़ी की जनता में असाधारण चुप्पी थी। इन दिनों संयुक्त प्रांत के लाट मैलकम का पौड़ी आगमन तय हुआ। पौड़ी का प्रशासन लाट मैलकम को दिखाना चाहता था कि कांग्रेस इस पूरे क्षेत्र में समाप्त हो चुकी है। इसके लिये प्रशासन ने ‘अमन सभा’, हितैषी पत्र और हितैषी प्रेस की सहायता ली।

प्रशासन के सहयोग से नवम्बर 1930 में लैंसडाउन बनी ‘अमन सभा’ की स्थापना की गयी थी, जिसका उदेश्य कांग्रेस का प्रतिपक्ष खड़ा कर छावनी को राष्ट्रवादी आन्दोलन से बचाना था। अमन सभा में राय साहब, रायबहादुर, अनेक वकील, पेंशनर, ठेकेदार, थोकदार शामिल थे।

जेल से छूटे जयानंद भारती को जब यह बात पता चली तो, उन्होंने निश्चय किया कि लाट मैलकम के दरबार में वह तिरंगा फहरायेंगे। 6 सितम्बर 1932 को पौड़ी में लाट मैलकम का दरबार लगाने वाला था। लाट मैलकम के दरबार में तिरंगा फहराने के उदेश्य से जयानंद भारती ने सकलानंद भारती से बात की। जयानंद भारती पहले दुगड्डा पहुंचे और फिर वेश बदल कर 5 सितम्बर 1932 को पौड़ी पहुंचे तथा रात को कोतवाल सिंह नेगी वकील के घर रुके।

उनके साथ उनके दो मित्र थे, जिन्होंने उन्हें तिरंगे के दो और टुकड़े दिये थे। तिरंगे का तीसरा टुकड़ा जयानन्द भारती ने अपने पास रखा था। पौड़ी पहुँच कर तिरंगा कोतवाल सिंह नेगी वकील के घर पर सिलकर एक कर लिया गया।

6 सितम्बर के दिन जयानंद भारती वेश बदल कर सभा में मंच के ठीक आगे बैठ गये। जयानंद भारती ने अपने कुर्ते की आस्तीन में तिरंगा छुपाकर रखा था। सभा में बैठे उनके साथियों में झंडे का डंडा सरकाना शुरू किया। इस बीच लाट मैलकम का अभिनंदन पत्र पढ़ा जा चुका था और इसी बीच झंडे का डंडा जयानंद भारती के पास पहुँच चुका था।

इधर लाट मैलकम का स्वागत के प्रत्युत्तर में बोलने के लिये खड़ा होना था, उधर जयानंद भारती का डंडे पर तिरंगा चढ़ाना। लाट मैलकम बोलने ही वाला था कि फुर्ती से उठकर जयानन्द भारती तिरंगा लहराते हुये मंच की ओर बढ़ने लगे और नारा लगाने लगे ‘गो बैक मैलकम हेली’ ‘भारत माता की जय’ ‘अमन सभा मुर्दाबाद’ कांग्रेस जिंदाबाद’।

जयानंद भारती का एक पैर मंच पर था, दूसरा नीचे तभी पुलिस और अन्य अधिकारियों ने उन्हें दबोच लिया। जयानंद भारती को मार पड़ती रही और हाथ से तिरंगा छीनकर फाड़ दिया गया, लेकिन उन्होंने नारे लगाना नहीं छोड़ा। इलाका हाकिम ने उनके मुंह में रुमाल ठुस दिया, लेकिन तब भी वे नारा लगाते रहे। इस बीच मैलकम हेली पुलिस पहरे में डाक बंगले की तरफ भाग चुका था।

जयानंद भारती को तत्काल हथकड़ी पहनाकर पौड़ी जेल ले जाया गया। जनता उनके पीछे हो ली। जयानंद भारती के अनुरोध पर ही जनता अपने-अपने घरों को लौट गई। इस गिरफ्तारी के बाद 28 सितम्बर 1933 को भारती जेल से छूटे। यह घटना ‘ऐतिहासिक पौड़ी कांड’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो जनपद के मुख्यालय के गजट में भी अंकित है।

निधन

अंतिम दिनों में गंभीर रोग से ग्रस्त जयानंद भारती ने अपने ग्राम अरकंडाई में 71 वर्ष की आयु में 9 सितम्बर 1952 को आखिरी सांस ली।