जाति व्यवस्था | Jati Vyavastha | Caste System

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जाति व्यवस्था जन्म के समय से व्यक्तियों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटने की एक प्रणाली है। भारत में जाति व्यवस्था मुख्य रूप से काम पर आधारित है। भारत काफी समय से जाति व्यवस्था का शिकार रहा है।

भारत की इस जाति व्यवस्था ने जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया है। आजादी के बाद भी भारत में जाति पर आधारित सीमांकन आज भी होता है, हालांकि यह समय के साथ बदलता जा रहा है।

कभी-कभी जाति पर आधारित अंतर एक हिंसक रूप ले लेता है और जाति के आधार पर अलग-अलग जातियों के बीच हिंसा भड़क उठती है। विरोधी सामाजिक तत्व अपने लिए भी इस जाति व्यस्था और जाति हिंसा को बढ़ाते हैं, ताकि इससे उनका कुछ मुनाफा हो सके।

इससे पहले हर व्यक्ति की जाति उसके व्यवसाय से दी जाती थी। उस व्यक्ति को अपनी मृत्यु तक उसी व्यवसाय को करना पड़ता था और उसका पूरा परिवार जीवनभर यही व्यवसाय करता था। ‘नीची जाति’ वाले व्यक्तियों को ‘उच्च जाति’ वाले व्यक्तियों से मिलने की भी मनाही थी। कोई भी व्यक्ति अपनी जाति से अलग दूसरी जाति में शादी नहीं कर सकता था।

इसके अलावा विरोधी सामाजिक तत्व अपने निहित स्वार्थ को बढ़ावा देने के लिए जाति व्यवस्था का उपयोग करते हैं। इसी तरह जाति प्रथा भारत में समाज को अलग-अलग हिस्सों में बाँट रही है।

कारण

भारत में जाति व्यवस्था के फलने-फूलने की वजह लोग को उनके काम के आधार पर जाति में बाँटना था। भारत में ऐसे कई काम थे, जिनको कुछ लोग ही कर सकते थे। इसी वजह से उनको अलग जाति का नाम देना शुरू हो गया और जाति व्यवस्था का जन्म हुआ।

जाति

  • ब्राह्मण– पंडित, शिक्षक जैसे- लोग होते थे, जो ब्राह्मण होने के लिए शिक्षा, दीक्षा और कठिन तप करते थे और वह सभी जातियों में सबसे उपर होते थे। धार्मिक अनुष्ठान से संबंधित सभी काम यही किया करते थे।
  • क्षत्रिय– क्षत्रिय वे लोग वह होते हैं, जो या तो योद्धा हों या फिर राजा हों, एक क्षत्रिय का धर्म प्रजा की रक्षा करना होता है।
  • वैश्य– हिन्दू जाति व्यस्था के हिसाब से इस वर्ग में मुख्य रूप से भारतीय समाज का ‘व्यापारी समुदाय’ शामिल है। यह शब्द ‘संस्कृत भाषा’ से लिया गया है जिसका अर्थ “बसना” होता है।
  • शूद्र– आधुनिक और सामान्य अर्थ में, लोकविधान के अनुसार, सनातन धर्म के चार वर्णों में से चौथा और अंतिम वर्ण‘शूद्र’ कहलाता है। इनका कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना और शिल्प-कला का काम करना माना गया है। ‘यजुर्वेद’ में शूद्रों की उपमा समाजरूपी शरीर के ‘पैरों’ से दी गई है, इसीलिये कुछ लोग इनकी उत्पत्ति ‘ब्रह्मा’ के पैरों से मानते हैं।

जाति व्यवस्था के नुकसान

  • असमानता को बढ़ावा देता है।
  • प्रकृति में लोकतांत्रिक।
  • श्रेष्ठता और न्यूनता में नकली भेदभाव।
  • ऊपरी और निचली जाति के लोगों के बीच अंतर बढ़ाता है।
  • जाति व्यवस्था ‘देश के राष्ट्रीय एकीकरण की ओर’ भी खतरा है।
  • जाति व्यवस्था कई अमानवीय और अनैतिक सामाजिक प्रथाओं जैसे- अस्पृश्यता, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति आदि के लिए एक प्रमुख कारण है।

हल

शिक्षा से ही लोगों को जाति व्यवस्था के नुकसानों के बारे में पता चलेगा और लोग इसके खिलाफ आवाज उठाना शुरू करेंगे। इसीलिए हमें हर जगह इससे जुडी शिक्षा पहुंचानी चाहिये। इस विषय पर स्कूलों में खास कक्षाएं (क्लास) होनी चाहिये, ताकि बच्चे इसे अच्छी तरह से समझ सकें। अच्छी शिक्षा और आर्थिक प्रगति की वजह से छोटी जाति वाले लोगों को भी बराबर का आगे बढने का प्रोत्साहन मिलेगा और इसी तरह जाति व्यवस्था का अंत हो सकता है।